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शनिवार, 22 अगस्त 2009

दो दिरहाम और....

( चित्र केवल दिखाने के लिये)



20 साल की एक घटना मुझे याद आ गई, उस वक्त भी रमजान का महिना था. हम लोगो का दुसरा साल था अबु धाबी मे. हमारे एक मित्र दिल्ली जा रहे थे अपने परिवार के साथ. मै और मेरा एक मित्र उनको छोडने अबु धाबी के हवाई अड्डे पर गये. उनको विदा करके हम लोग बहार् आये और समस्या थी वापिस घर आने की. बस का पता किया तो मालूम हुआ कि एक घंटा लगेगा. फिर सोचा कि चलो टैक्सी की जाये. ज्यादातर टैक्सी ड्राईवर पठान थे. उस वक्त जवानी भी थी और पैसे बचाने का जोश भी था. सभी टैक्सी वालो ने 20 दिराहम मांगे जो हम लोग देने के मूड मे नही थे.
एक पाकिस्तानी परिवार छोटे बच्चो के साथ इसी वक्त बहार आया था अये उन्हे भी जल्दी थी घर जाने की. वे हम दोनो दोस्तो को देख रहे थे पूछते हुये.(वहा़ से शेयरिंग टैक्सी भी मिलती थी 5 दिरहाम प्रति वयक्ति) फिर कुछ हिम्मत करके जनाब मेरे पास आये और कहने लगे कि आप को भी अबु धाबी जाना है तो आप हमारे साथ चले और हम 6दिरहाम देगे यानि 12 दिरहाम और आप 4 दिरहाम यानि 8 दिरहाम दे देना. हम लोग बिना झिझक के तैयार हो गये. उन्होने टैक्सी वाले को बुलाया और उसे बताया कि इस तरह से हम लोग पैसे देगे. ड्राईवर भी जवान सा था. हम लोग उसके साथ गये आगे तक ( येसे कानूनी तौर पर अनुमति नही है).
रास्ते भर कुछ बाते हुई और हम उन पाकिस्तानी परिवार को उनके घर पर छोड कर अप्ने घर की तरफ निकले ( हमे नही पता कि उन जनाब ने कितने पैसे दिये उसे..तय हुआ था 12 दिरहाम ). खैर जब हम अपने घर के पास पहुंचे तो मैने 10 दिरहाम का नौट उसे दिया लेकिन उसने 2 दिरहाम वापिस नही दिये.. हम टैक्सी मे ही बैठे रहे उसे बताया कि कैसे उसने हमे 2 दिरहाम देने है लेकिन वो अडा रहा. थोडा गर्मा गर्मी के बाद निर्णय हुआ कि उसी पाकिस्तानी जनाब के घर जाया जाये जिस्के साथ ये बाते तय हुई थी( ये बता दू कि उसका घर 5 किलोमीटर दूर था).
फिर हम उस्के( टैक्सी ड्राईवर) साथ आगे निकले कि अचानक उसने कहा कि पुलिस स्टेशन जायेगे. हम लोग घबरा गये क्योकि यहां पर आकर पहली बार ये नाम सुना था. खैर मेरे दोस्त और मैने कुछ हिम्मत करके हामी भर दी. उस समय अबु धाबी इतना विकास नही था और हमे पता भी नही था कि पुलिस स्टेशन कहा है...कुछ देर बाद हमारी टैक्सी एक अंधेरे सुनसान क्षेत्र से गुजरी तो हम डर गये लेकिन टैक्सी वाला मुस्कराता रहा शायद उसने डर भांप लिया था हमारे चेहरे मे... फिर हम कुछ जोश मे आये और उससे पूछा कि कहा ले जा रहे हो? उसने मुस्कराते हुये कहा बैठो बस आ गया पुलिस स्टेशन. फिर कुछ लाईट नज़र हमे आई तो जान मे जान आई क्योकि उससे पह्ले हमने कई किस्से सुने हुये थे कि कैसे ये लोग लूट लेते है.
हम लोग पुलिस स्टेशन पहुचे वहा गेट पर तैनात लोगो से सलाम दुआ हुई. टैक्सी वाला उनसे कुछ घुल मिल कर बात कर रहा था ( हमे तो परेशानी ये थी कि अरेबिक हमे आती नही थी) खैर पहले उन्को बताया कि क्य हुआ. वे भी अचरज मे थे कि 2 दिरहाम के लिये हम लोग यहा आये है. वे कहने लगे की आपको पैसे दैने होंगे लेकिन हम अडे रहे. क्योकि दो दिरहाम कि बात नही थी हम चाहते थे जो तय हुआ है उस पर अमल होना चाहिये. खैर उन लोगो ने कहा कि अभी आफिसर आ येगा उससे बात करो.
रात के 11 बजे ड्यूटी आफिसर आया उससे बात हुई उन्हे अंग्रेजी आती थी. हमारी बात सुनकर वो भी हंसे. लेकिन उन्होने कहा कि नही हमे देने होन्गे 5 दिरहाम के हिसाब से उसे क्योकि आमतौर पर यही किराया वसूलते है . अचानक मेरे मुह से निकल गया कि ये रमजान के महिने मे वर्त रखता है तो झूठ क्यो बोल रहा है. अगर हम तय करते 20 प्रति वयक्ति तो वो भी हम देते. इस पर उस आफिसर ने हमसे कहा कि मै समझ रहा हूं और ये गरीब आदमी है तो मै आपसे कहता हूं कि इसे भूल जाओ. हमको तसल्ली हो गई कि हमारी बात रखी गई और उन्होने इसे स्वीकारा. फिर हमने उनसे कहा कि हमने आपकी बात रखी है अब ये बताये कि हम घर इतनी दूर कैसे जाये तो उन्होने कहा कि ये ही छोडेगा ( उन्होने उस का टैक्सी न्0 लिखा) उस्को हिदायत दी कि बिना कुच्छ कहे हमे हमारे घर तक छोडे.
टैक्सी वाला थोडा गुस्से मे हो गया और यकीन मानिये 6-7 किलोमीटर उसने गाडी केवल पह्ले/दूसरे गियर मे चलाई. लेकिन उसे ये अहसास नही हुआ कि 2 दिरहाम के च्क्कर मे उसने कितना पैट्रोल व्यर्थ किया समय के साथ. खैर हम लोग 12.30 (रात मे) घर पहुंचे. जब हम उतरे तो कुछ बडब्डाता हुआ वो निकल गया.
कहने का मतलब ये था कि 2 दिरहाम के लिये हमने पुलिस स्टेशन का चक्कर लगा. लेकिन ये सब इस्लिये कि किसी बात को अगर हम कह देते है तो उस पर अमल करना चाहिये. कई दोस्तो ने इस पर खिल्ली भी उडाई हमारी और कुछ ने सराहा भी. लेकिन हम खुश थे कि हम लडना जान्ते है हक के लिये और जुबान से पीछे नही हटना चाहिये. आज भी इस घटना को याद करता हूं तो मै भी मुस्कराये बिना नही रहता...
- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल.

6 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लगा संस्मरण पढ़ के.

    हम लडना जानते है हक के लिये और जुबान से पीछे नही हटना चाहिये.-यही ज़ज्बा होना चाहिये.

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  2. realy good work sir, her ek bande ko apni juban per to rahna hi chahiye, per aaj log iska matlab bhul gaye hai....... parul

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  3. यही जज्बा तो घर के बाहर रहने में मदद करता है।

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  4. रामयुग में "रघुकुल रीत सदा चली आई..प्राण जाई पर वचन न जाई..." इस युग में... सब्दों और वादों की कोई एहमियत नहीं है... :)सब चलता है !!

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  5. अच्छे लगे आपके ज़ज्बात ...डटे रहिये .....!!

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आपकी टिप्पणी/प्रतिक्रिया एवम प्रोत्साहन का शुक्रिया

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