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शनिवार, 1 मई 2010

प्यार की राह में


प्रेम तपस्या में

लीन होकर जाना

कुछ हद तक

प्यार की भाषा को

और उसकी परिभाषा को



प्रेम एक

सम्बन्ध है

मेल है

दिल के तारो का

परस्पर स्नेह का

विचारो का

भावनाओ का



एक दूजे का

सहारा है प्यार

समर्पण और आदर का

सामंजय है प्यार



शायद इस दुनिया मे कई

प्रेम पुजारी है

फिर भी

प्रेमबन्धन मे पूर्ण नही



प्यार मोह्ब्बत के इस

मनचले खेल ने

"प्रतिबिम्ब " तुम्हें

बहुत कुछ सिखलाया है

और सिखा रहा है



अरे!!! ये किसकी आवाज है

जो चुपके से मेरे कानो मे

शहद घोल रही है और

अपने करीब बुला रही है



अच्छा मैं चला और कुछ

सीखने की चाह मे - प्यार की राह में।


- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल
(एक पुरानी रचना पुराने ब्लाग से)




2 टिप्‍पणियां:

  1. ◊▬►► प्रतिबिम्ब जी प्रेम तो तपस्या का ही एक रूप है ! इस तप में लीन हो हर तरह के भाव प्राप्त होते हैं ! जो एक ही जगह एक साथ कहीं और दुर्लभ हैं ! इसी लिए तो कामदेव नामक देव भी हैं इस जहान में !

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