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शुक्रवार, 14 मई 2010

आज फिर उनको...




आज फिर उनको हमारा ख्याल आया
सपने में आकर चुपके से मुझे जगाया

कहने लगी भूल जाओ कल की कहानी
चलो शुरु करे अब फिर एक नई कहानी

अपना सहारा तुम्हें बनाना चाहती हूँ
तुम को अपना प्यार बनाना चाहती हूँ

तुम ही तो हो मेरे श्रृंगार – दर्पण
करती हूँ मैं तुमको सब कुछ अर्पण

आज फिर मुझे सीने से लगा लो
अपने रूठे दिल को फिर से मना लो

अब कर ना सकूँगी और इंतजार
खड़ी हूँ लेकर मैं फूलो का हार

आज फिर उनको हमारा ख्याल आया
सपने में आकर चुपके से मुझे जगाया।


- प्रतिबिम्ब  बड्थ्वाल, अबु धाबी
(पुरानी रचना पुराने ब्लाग से)

4 टिप्‍पणियां:

  1. कभी कभी कुछ समझ में नहीं आता कि
    क्या कॉमेंट्स किया जाये !!!
    जैसे कि इधर पर आपने जो लिखा है
    एक एक शब्द में जान है किस लाइन कि तारीफ कि जाए और
    किस लाइन को छोड़ दिया जाए ये तय करना बहुत मुश्किल है आज तो ...
    आपने तो हमको कहीं का नहीं छोड़ा
    वाह भाई वाह ....

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज फिर उनको हमारा ख्याल आया
    सपने में आकर चुपके से मुझे जगाया। bahut sundar...

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणी/प्रतिक्रिया एवम प्रोत्साहन का शुक्रिया

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