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रविवार, 24 अक्तूबर 2010

वो मैं था




हर तरफ शोर था
जिसे ना सुना किसी ने
वो अल्फ़ाज़ मेरे थे
भीड चारो और थी
जिस् चेहरे पर नज़र ना पड़ी
वो चेहरा मेरा था
समुन्द्र में तूफान उठा
जिसको साहिल ना मिला
वो कश्ती मेरी थी
किस्मत ढूढती रही दर
जिसका दर ना मिला
वो घर मेरा था
प्यार फ़िजा में बिखरता रहा
जिसे प्यार मिला
वो दिल मेरा था
ख्वाईश मुंह फैलाती रही
जिसकी इच्छा पूरी हुई
वो तम्न्ना मेरी थी
सबकी बातो को माना उसने
जिसे नही माना
वो बात मेरी थी
हसरत मंजिल बुलंद थी
जिसे मंजिल ना मिली
वो मुकद्दर मेरा था
महफिल सजाई थी उन्होने
जिसे निमत्रण ना था
वो शख्स मै था
सबके लिये इस्तकबाल है
जिसे इज़ाजत ना मिली
वो सलाम मेरा था
कुछ पन्ने किताब बन गये
जिसे कोरा कागज़ ना मिला
वो कलम मेरी थी
        रिश्तो का हुजूम सामने था
जिसे जोडा न गया
वो नाम मेरा था 
 - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल, अबु धाबी

9 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sundar likha hai.. Aik ajeeb se dard me sarobaar kavita bahut hee bhavuk hai.. ati sundar.

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  2. दिल को छू कर, जो अश्क बनकर आँखों से बह निकला
    वो शब्द "प्रतिबिम्ब" तेरा था

    प्रतिबिम्ब जी, क्या अलफ़ाज़ हैं, क्या अंदाज़ हैं !!
    मैं भी अबू धाबी में रहता हूँ, कभी मिलने का मौका मिले तो बहुत ख़ुशी होगी. (०५०-३१३६९५०)

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  3. Bahut Achha likha hai, lekin ati nirashavadi rachna hai!
    Aksar aisa dekha gaya hai ki berojgari mein hi nai peerhi ke yuvao mein aisi dharna aati hai!

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  4. Pratiji aap apna sankalan prakashit karwaiye.... Arun Dhoundiyal

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  5. achha likhte hai aap ne achaa lagta hai ki aap hamare dil me utar gaye hain bhaiji dhanyawad...

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आपकी टिप्पणी/प्रतिक्रिया एवम प्रोत्साहन का शुक्रिया

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