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मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

हाँ मैं वही गांव हूँ


हाँ मैं वही गांव हूँ
जिसकी वादियो में
तुमने कभी स्वच्छ सांसे ली थी
जिसकी हर पंगड्डियो ने
तुम्हे चलना सिखाया
जिसके हर खेत खलिहान ने
तुम्हे पेट भर खाना दिया
जिसके हर नदी झरनो ने
जीवन सागर मे तैरना सिखाया

हाँ मैं वही गांव हूँ
जिसमे सावन का झूला था
जिसमे तीज़ का त्यौहार था
जिसमे  होली जैसा हर रंग था
जिसमे बंसत का गीत  था

हाँ मैं वही गांव हूँ
जंहा असंख्य पेड छांव देते थे
जंहा तुम खेला करते थे
जंहा कुल देवता थे
जंहा ग्राम देवता थे

हाँ मैं वही गांव हूँ
जिसमें हर खेत मे
सोना उपज़ा करता था
जिसमे बेटी कि बिदाई पर
पूरा गाँव रोता था
जिसमे हर घर का चूल्हा
एक दूजे के प्रेम से जलता था
जिसमें हर रहने वाला
एक सुर में बोलता था

हाँ मैं अब भी वही गाँव हूँ
जिसका हर शख्स
अब बूढा हो चला है या विदा
जिसकी नई पीढी
अब केवल मौन है इसके लिये
जिसका वर्तमान
केवल अतीत बन कर रह गया है
या फिर वक्त के साथ
लुप्त हो रहा है शहर की चका चौंध में

           -         प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
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