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शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

चाल .......




मैं चला,
तुम चले,
अपनी अपनी चाल।
फिर भी खड़े है
आज भी वही सवाल

मौन क्यों है आत्मा?
दूर क्यों है परमात्मा?
खोई क्यों है इंसानियत?
झुलसती क्यों है मानवता?

चेतना अब केवल झुंझलाती है
अन्याय अब केवल आह भरती है
मुस्कराहट अब केवल छलती है
सच्चाई अब केवल दम तोड़ती है

झूठ और अहंकार मिल बैठे है
स्वार्थ और अरमान मिल बैठे है
दोस्त और दुश्मन मिल बैठे है
प्यार और नफरत मिल बैठे है

एक तेरी चाल और एक मेरी चाल
बस नही कोई समझे वक्त की चाल
फिज़ाओ ने बदली हवाओं की चाल
इन सबके आगे बेबस है हमारी चाल

आओ मिल कर अब हम चले चाल
वक्त से लड़ने का यूं हम करे कमाल
एक जुट होकर रखे अब नई मिशाल
खुद का नहीं देश हित का है सवाल

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

3 टिप्‍पणियां:

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