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रविवार, 17 नवंबर 2013

आईना - ए - जिंदगी





अमीर गरीब की बढ़ती खाई
सियासत की ये चाल भाई
स्वार्थ ने है पैठ बढाई
इंसानियत की देते सब दुहाई

खुशी कही पलके बिछाए
गम कही है डेरा जमाए
कर्म धर्म का जाल फैलाए
जिंदगी आइना दिखाती जाए

दर्द झेल रहा कोई
खेल समझ रहा कोई
किस्मत कहे 'प्रतिबिंब' कोई
बुरा वक्त समझ रहा कोई

1 टिप्पणी:

  1. आपने अपने ब्‍लॉग की एक अच्‍छी कोशिश की है। इसमें सबसे पहले ध्‍यान देने वाली बात ये है कि ये आपका ही मंच है, जिसपर आपके आलोचकों की आपसे ज्‍यादा पैनी नज़र है। हिंदी ब्‍लॉग है, जिसमें व्‍याकरण और ग़लतियों पर ज्‍यादा ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है, यदि इसमें सुधार हो जाए तो और भी गुणवत्‍तायुक्‍त कहलाई जाएगी। यूं तो हमसे भी भूल से ग़लतियां छूट जाती हैं, लेकिन किसी भी रचना में ऐसा दोष तो नकारात्‍मक परिणाम ही ‌माना जाएगा। कविताओं में भी मात्राओं और शब्‍दों का संतुलन...? ध्‍यान देने से सब ठीक हो जाएगा। हिंदी के लिए आप जो कार्य कर रहे हैं, वो प्रशंसनीय है। दिनेश शर्मा-स्‍वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम http://www.swatantraawaz.com

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