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बुधवार, 31 दिसंबर 2014

अलविदा कहना होगा ....



आज तुझसे बिछुड़ना ही होगा
चाह कर भी नही रोक पाऊंगा तुझे
तेरे संग बिताया हर लम्हा
अब याद बन कर रह जाएगा
खुशी और गम को समेटे हुए
बीते हर पल तेरे ही आगोश में
तुझसे लड़ता रहा केवल अपने लिए
अपने हर सपने को पूरा करने की
बेझिझक फरमाइश तुझसे करता रहा
वक्त जैसा बीता वो मेरा ही नसीब था
तूने दिया या लिया ये अपना याराना था

तेरे मेरे प्यार की आख़री रात
आज शोर शराबे में बीत जायेगी
तेरे मेरे प्यार की कहानी
अब कल से अतीत कहलायेगी
अब न कभी तुझसे मिलना होगा
हाँ यादो में बस आना जाना होगा
चल अब मैं भी तुझसे विदा लेता हूँ
हाँ अब तुम्हे अलविदा कहना होगा ....

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

~सवेरा~


तस्वीर क्या बोले समूह में एक चित्र पर मेरे भाव मित्रो के साथ 

शंख ध्वनि का गूंजता मधुर घोष 
प्रभा - रशिम हरती अंधकार दोष

नभ से बिखरता स्वर्णिम प्रकाश 
वर - वधु से सजे धरती व् आकाश

पुण्य प्रभात से सजी हुई मधुर बेला 
इन्द्रधनुषी किरणों सा रंग है फैला 

शाखों पर लगा गहनों का सा मेला
रोमांचित मन झूले सावन सा झूला

सौम्य रूप लिए पूषण की शीतलता
सूर्य की प्रकृति से दिखे सन्निकटता

उदृत हो जब क्षितिज पर रूप बदलता
'प्रतिबिम्बित' होती भानू की चंचलता  


-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
पूर्व प्रकाशित  http://tasveerkyabole.blogspot.ae/2014/12/4-2014.html

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

आइना - ए - रिश्ता



हर रिश्ते की
एक सीमा होती है
हाँ वक्त के साथ
उसमे बदलाव आते है

ये सीमाए
कभी तो खुली होती है
तो कभी बाँध दी जाती है
ये सीमाए
दिल से तय होती है

और ये दिल
जब अपना समझता है
तब सीमाओ की
पाबंदी नही होती है

जीवन में
जब दखल लगता है
तो सीमाए
तय होने लगती है

फिर रिश्तो का
झूठ भी
सेंध मारने लगता है
सच भी
सामने आने लगता है

वैसे
सच रिश्तो का
रिश्ते
मजबूर नही होते
रिश्ते
मजबूर नही करते

रिश्तो में प्रेम
और प्रेम में सीमा
सीमओं में अहसास
अहसासो में घुटन
'प्रतिबिंब' इसी घुटन में
रिश्ते का होता है अंत

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

कल आज



अहसास संग है
साथ कोई नही है
दिल बाते करता है
सुनता अब कोई नहीं है

भावो की कतार है
शब्द खड़े लाचार है
सच अकेला है
झूठा का विस्तार है

आइना दुश्मनों का है
चेहरा उसका अपनों सा है
कदम मंजिल के प्यासे है
पानी मरीचिका सा है

दिल बीमार है
हर कोई बना हकीम है
भूख अब बिकती है
कलम बनी सौदागर है

नर नारी का नारा है
विचारो का उभरता भेद है
धर्म कर्म का अभाव है
संस्कृति संस्कार पर खेद है

रिश्ते पवित्र है
स्वार्थ से प्रताड़ित है
जोड़ना रणनीति है
तोड़ना अब राजनीति है

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

सोमवार, 24 नवंबर 2014

सुप्रभात



तुम्हे नींद तो
अच्छी आई होगी
सपनो और एहसासों का
मिलन खूब हुआ होगा
भोर की किरणों से
आँख तुम्हारी खुली होगी
अब सपनो की खोज
और एहसासों को जीना होगा
प्रतिबिंबित होगी हर सोच
जब आशा और आंकक्षा का
हकीकत के धरातल पर मिलन होगा
पथ स्पष्ट और मंजिल निकट
तब जीने का मज़ा दुगना होगा
मिलेगा फिर सुखद एहसास
जब सपना सच्चा और अपना होगा

शुभम 

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

दिया बुझता है ...



पलट रहा किताब मोहब्बत की
शाम से ही गीत पुराना सुन रहा हूँ
रात की आहट सुनाई देने लगी है
अँधेरे में दिया यादो का जला रहा हूँ

इस रात में कितना शोर है आज
तिमिर घनघोर धरा पर छाया है
मिलता था साथ जिनका रात भर
उन चाँद तारो ने मुंह मोड़ लिया है

जीत का था जिस पर हमें भरोसा
जिन्दगी का वो दाँव हम हार बैठे है
जिन भावो में मिलती थी प्रेम सौगात
वो तमाम एहसास आज हार बैठे है

हर रात, हर बात होती थी उनसे
आज हर बात उनसे अधूरी रह गई
हवा का झोंका महक बिखेरता था
आज हवा भी दिल दुखा के रह गई

इश्क पर फक्र होता था आज तक
अब इसके हर रंग से डर लगता है
रात ख्यालो में कट जायेगी 'प्रतिबिंब'
सुबह के ख्याल से दिया बुझता है

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

रविवार, 16 नवंबर 2014

मुझे लिखना है



मुझे कुछ लिखना है
क्या लिखूं, क्या न लिखू
तुम्ही बताओ क्या लिखू
सच लिखू , या फिर झूठ लिखूं
तुम्हे लिखू या स्वयं को लिखू
तुम्हे लिखूंगा तो सच लिखूंगा
स्वयं को लिखूंगा तो झूठ लिखूंगा
यही तो सच्चाई है आज की
सच दूसरो का लिखना ही भाता है
अपना झूठ तो सदा लिखता आया हूँ
अरे हाँ बुराई भी तो दूसरो की ही नज़र आती है
हम तो खुद को सच्चाई का पुतला मानते है
अंगुली उठाने में आनंद भी तो आता है
खुद को वाह वाही और दूसरे को शर्मिंदगी मिलती है
और हाँ लिखने के बाद एक जीत का अहसास
एवरेस्ट पर विजय पताका फहराने  जैसा
चेहरे पर मुस्कराहट ला देता है
और फिर से एक बार तुम्हे लिखने को तैयार हूँ
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

मौसम - ए - इश्क



सर्द रातो सी होती है मोहब्बत
रिश्तो में गरमाहट दे जाती है
गर्म हवाओ सी नोक झोंक से
पारा प्रेम का बढ़ता जाता है
धुंध सी अविश्वास की परते
गहरे विश्वास को ढक देती है
सावन और भादो के प्रेम झूले में
ज़ज्बात आसमान छूने लगते है
बरसात में भीगते और संवरते रिश्ते
कभी अहसास पतझड़ से बिखर जाते है
धरती हर मौसम को सहती है 'प्रतिबिंब'
लेकिन इंसान मौसम सा बदलता जाता है

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शनिवार, 1 नवंबर 2014

मिलन और विरह के बीच




मेरे शहर की याद
ले आई तुम्हारे पास
तुमसे मिलना
मिलकर बिछड़ना
और हाँ याद आया
मिलन और विरह के बीच

शोर करती हुई खामोशियाँ
प्रेम के पन्ने बांचती आँखे खेलती खेल
तन मन में उभरते कोमल अहसास
तन मन पर लिपटती अहसासों की बेल

तन मन पर फैलती तुम्हारी खुशबू
आँखों में 'प्रतिबिंबित' होती हुई शरारत
गालो में अंकुरित चाहत के लाल पौधे
प्रकृति के सतरंगी रंग देते हुए साथ

अंगडाई लेती, कसमसाती ख्वाइश
तन मन में विद्दुत प्रवाह दौड़ता सा
स्पन्दन करती लहरों का समावेश
समुद्र की गहराई में छूटता पसीना सा

और फिर
मिलन में सम्पूर्णता की लिए आहट
बयाँ करती
अधरों में उभरती महकती मुस्कराहट

मेरे शहर की याद
मिलन से विरह के बीच
और फिर से
मिलन की चाह  लिए .....


- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

ये वक्त





ये वक्त
तू चल मैं आता हूँ
आखिर तूने
आगे चलना सीख लिया
सोच तो हमारी
तेरे साथ चलने की थी
लेकिन तूने
कदम कदम पर
बेगाना सा व्यवहार किया
मंजिल से पहले ही
बढ़ते कदमो को रोक दिया
मोहब्बत तुझसे की थी
लेकिन तूने दुश्मनी निभाई
अब साथ चलू भी तो कैसे
हर मोड़ पर तूने की बेवफाई

ये वक्त
चल तू अब आगे आगे
देखूगा तूने क्या है बिसात बिछाई
तेरी चालो से पहले
समझ लूँगा मैं तेरे सारे मंसूबे
तू चलते रहना अपनी चाले सभी
मैंने हौसला खोया कहाँ है अभी

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शनिवार, 26 जुलाई 2014

शहीदों की चिताओ पर ....



कठिन परिस्थितियों संग
जवानो ने दुश्मन के हर वार झेले
देश की आन बान शान के लिए
ये जाबांज जान हथेली पर लेकर चले

दुश्मनों को मुंह तोड़ जबाब देने
ये दिलदार सर पर कफ़न बाँध कर चले
कभी अपनी टुकड़ियों के साथ
मौका मिला तो दुश्मन से लड़ते रहे अकेले

घर परिवार को छोड़ कर
भारत माँ के लिए रण बाँकुरे मरने मिटने चले
शौर्य बलिदान की रख मिसाल
कोई डटा मैदान में, कोई घायल कोई शहीद हो चले

धर्म जात पात की सोच नही
हर सिपाही भारत माँ के सच्चे सपूत बन कर चले
ज़ज्बा तिरंगे की खातिर दिखता है
दुश्मन को मार भगा इसमें लिपट दुनिया छोड़ चले

शहीदों की चिताओ पर
क्या लगते रहेंगे यूं ही हर वर्ष मेले
ख़ास दिन क्यों याद करे इन्हें 'प्रतिबिंब'
आओ रोज उनकी कुर्बानी का अहसास करते चले

सोमवार, 21 जुलाई 2014

लिखना ....



शौक है मेरा लिखना
पढना तो तुम्हे है
समझना भी तुम्हे है
शब्दों और लय को
संगीत तुम्हे देना है
अर्थ और भावार्थ की
दूरी तुम्हे तय करनी है
दर्द या मोहब्बत को
तुम्हे महसूस करना है
अपराध और अपवाद का
भेद तुम्हे करना है
काले अक्षर और सफ़ेद पन्नो पर
रंग तुम्हे भरने है

हाँ यह निर्भर करता है
तुम्हारी उम्र पर
तुम्हारी सोच पर
तुम्हारे ज्ञान पर
तुम्हारे अनुभव पर
तुम्हारी संवेदनशीलता पर

मेरे शब्द जाल सरल है
मेरी सोच की तरह
मेरे नजरिये की तरह
मेरे अल्प ज्ञान की तरह
मेरे खट्टे मीठे अनुभव की तरह

मेरे दिल और दिमाग का
'प्रतिबिम्ब'
तुम्हे अपने मन - मस्तिष्क पर
प्रतिबिंबित करना है

मेरा शौक तो बस लिखना है
शब्दों को आप तक पहुंचाना है
अच्छा या बुरा यह आपको तय करना है  

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

विमोचन



शब्द एक साथ
जुड़ने लगे
भावो की माला
गुथने लगी

कोई कवि बन
उभरने लगा
कोई लेखक बन
बिकने लगा

सृजनता का पैमाना
बदलने लगा
प्रकाशक का व्यापार
चलने लगा

किताबो का मेला
शुरू हुआ
नए आवरण का
श्रीगणेश हुआ

शायद साहित्य अब
समृद्ध होगा
हर लेखक का
सम्मान होगा

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

'डे' - वेलेंटाइन दिवस पर खास



वेलेंटाइन दिवस की परंपरा 1992 तक भारत में इतनी पकड़ नहीं बना पाई थी. वाणिज्यिक/व्यवसायिक टीवी चैनलों जैसे एम् टीवी , समर्पित रेडियो कार्यक्रमों और प्रेम पत्र प्रतियोगिताओं की वजह से फैला साथ ही इसमें आर्थिक उदारीकरण ने वेलेंटाइन कार्ड के उद्द्योग को बढ़ावा दिया. इसके बाद ही यह बदलाव देखा गया कि आम जानता के बीच में अपने प्रेमका इजहार आम हुआ. इसका असर यह हुआ कि जो बाते प्रेम की व्यक्तिगत होती थी और चारदीवारी के भीतर ही उसकी पवित्रता को संजो कर रखा जाता था, अब उसे लोग पश्चिम सभ्यता की तरह सरे आम प्रदर्शित करने में हिचकते नही. ये उद्द्योग का ही असर है कि हम हर रिश्तो को अब दिनों में भुनाना सीख गए है. घर पर माँ - पिता, भाई - बहन, पति - पत्नी का आदर/प्रेम करे या न करे लेकिन पब्लिक/जनता में खूब प्रचार प्रसार किया जाता है. अब माध्यम भी इतने हो गए है कि नैतिक बाते हो चाहे रिश्ते अब केवल दिखावे का सामान बन कर रह गए है.

चंद पंक्तियाँ 'डे' [day] से प्रेम पर

'डे'

भूले अपनी संस्कृति, खुद को 'डे' में उलझा दिया
हर रिश्तो को हमने अब, केवल 'डे' में बदल दिया

प्रेम व् पवित्रता की सीमा तोड़, 'डे इवेंट' बना दिया
पश्चिम को अपना बना, दिलो को अब 'डे' बना दिया

हर दिन है जिसका, उसको अब  'डे' में सीमित किया
तोड़ कर धागा एकता का, 'डे' से गठबंधन कर लिया

'दिवस' याद किसको 'प्रतिबिंब', 'डे' से जो दोस्ती हुई
गरिमा भावो व् रिश्तो की अब बनकर 'डे' झुलस रही

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

'आप' की मेहरबानियाँ





अन्ना का लेकर समर्थन, आन्दोलन का फिर श्रीगणेश किया
भ्रष्टाचार जनलोकपाल था मुद्दा, जिसमे जनता का साथ पाया
देख उमड़ी भीड़,भावुक जनता से खेलने का फिर ख्याल आया
दिखा ठेंगा अन्ना को, सत्ता पाने का सुन्दर हमने अवसर पाया

चाल किसी की व् सोच किसी की, लेकिन रणनीति अपनी बनाई
आन्दोलन व्  धरना खूब किया, सोचा अब तो सत्ता की चाबी पाई
कोसा जिसे दिन रात  उसका ही सहयोग पा दिल्ली की सत्ता पाई
किए खोखले वादे जनता से, कैसे बचे इसकी हमने जुगत जुडाई

कांग्रेस ने गरीबो के भावो से खेला, हमने उस नफ्ज को पकड़ लिया
देखी जिस में राष्ट्रहित की सोच, उस रथ को दिल्ली में अब रोक लिया
देश को युग पुरुष न मिलजाए, इसलिए लोकसभा लड़ने का सोच लिया
दिल्ली में रणनीति अपने पर भारी, इसलिए धरना का हमने सोच लिया

गुमराह किया जनता को वादों से, कांग्रेस भाजपा को सत्ता पाने से रोक दिया
वादों के लिए जनता देख रही, लेकिन हमने देश पर राज का सपना देख लिया
कर नही सकते, हो नहीं सकते पूरे ये वायदे, यह हमने  कुछ दिन में समझ लिया
बिजली पानी का लोलीपोप थमा लोगो को, कांग्रेस भाजपा को हमने कोस दिया

मैं अराजक तत्व हूँ अब एलान किया,  देश जाए भाड में मंत्रियो का बचाव किया
गणतंत्र दिवस का बना कर मजाक, तोड़ कर क़ानून जनता को परेशान किया
घमंड, जिद्द और अड़ियलपन को अपना, अराजकता का रास्ता हमने दिखा दिया
जनता को भड़काना अब हमारा काम, विद्रोह आदत अब तो  'आप' ने दिखा दिया


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

बुधवार, 1 जनवरी 2014

नव वर्ष मंगलमय हो !


२०१४ मंगलमय हो लेकिन यह भी ध्यान रहे !!!


ग्रेगोरियन कैलेंडर का आ गया नया साल
हर बार की तरह होगा आयोजन बेमिसाल
खुशियाँ  मना, शुभकामनाएं देते है हर बार
नए साल का उत्साह देखते ही बनता है यार

भूले हम, विक्रम सवंत है हमारा नया साल
संस्कृति और परम्पराओ का हुआ बुरा हाल
पाश्चात्य संस्कृति अपना, आधुनिक कहलाते
संस्कारो का कर तिरस्कार, भारतीय कहलाते

हर धर्म का मान कर, खुद से न हम खुद दूर करे
अच्छाई हर मार्ग की अपना, खुद को हम मजबूत करे
अपवादों से लड़, अपनी परम्पराओ का सम्मान करे
माडर्न दिखने हेतू, अपनी संस्कृति का न अपमान करे

आने वाल नव वर्ष शुभ हो, सुख का सब रस पान करे
नव विक्रम सवंत के दिन भी, सब मिल आयोजन करे
नई सोच के संग, संस्कृति संस्कारो का उल्लेख करे
मैं भारतीय ये मेरी पहचान, आओ खुद पर हम गर्व करे

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

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