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गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

चलते चलते - ३१.१२-२०१५




१.
पल पल की कीमत
पल पल की कीमत है, कुछ पलो की कीमत हम न लगा पाए
रिश्तों की चाह में और बाट जोहते, अपनों को संभाल न पाए
कोई कहता रहा कोई सुनता गया, दूरियों में ही भाव खो गए
हमने जो भी चाहा 'प्रतिबिम्ब', वो लफ्ज़ बन कर ही रह गए
बीता लम्हा कुछ कह गया, शायद हम अब भी संभल जाए
था दौर जो वो गुजर गया, इस दौर में कुछ अलग सा हो जाए
२.
आज तो याद कर लूँ ....
कल तू बिना कुछ कहे चला जाएगा, मुझे तू याद बहुत आएगा
अच्छा बुरा जैसा भी था, बस अब यूं साथ न तू मेरे रह पाएगा
जानता हूँ तेरे बस में भी कुछ नही, मगर कुछ सिखला जाएगा
भूलना मेरी फितरत नही, बस ज़माने के साथ मैं बदल जाऊंगा
कल तक तुझको लिखता पढ़ता था, अब इतिहास बन जाएगा
समर्पण के थे भाव जहाँ, वहाँ पलट कर देखने न कोई आएगा
प्रेम तुझसे ही था अब तक, अब कोई और जीवन में आ जाएगा
जिंदगी की रीत यही 'प्रतिबिंब', बिछड़ा फिर कौन याद आएगा

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

शंख






पुराणों के अनुसार शंख हमारी संस्कृति में चंद्रमा सूर्य समान देवस्वरूप है
जिसके अग्र भाग में गंगा सरस्वती, मध्य में वरुण और अग्र में ब्रह्मा वास है

आत्मा, प्रकाश, आकाश, वायु, अग्नि, जल. पृथ्वी तत्वों से शंख निर्मित है
शंख सागर के गर्भ से हुआ उत्पित, विष्णु - लक्ष्मी के हाथो में सुशोभित है  

इस धरोहर की उत्पति अधिक होने से जगन्नाथपुरी शंख क्षेत्र कहलाता है
शंख द्वारा जल अभिषेक देवताओ को करता प्रसन्न, कल्याणकारी होता है

शंख प्रतीक निधि और सनातन धर्मं का, देव अर्चना हेतू ये प्रेरित करता है
पाता है जब स्पर्श शंख का, जल भी गंगाजल के सदृश पवित्र हो जाता है

शंख के बहुत से होते आकार, विशेषताओ के कारण भिन्न है इसके प्रकार
धार्मिक कृत्यों में उपयोग,  पूजा स्थल में रख मनोकामनायें होती साकार

पांचजन्य शंख से कृष्ण का नाता, युद्ध में अर्जुन ने देवदत शंख बजाया था
अनंत विजय शंख था युद्धिष्ठर का, भीष्म ने भी पोडरिक शंख बजाया था

वामावर्ती शंख है विष्णु स्वरूप, लक्ष्मी का स्वरूप दक्षिणावर्ती शंख होता है 
वैज्ञानिक व् आयुर्वेद का महत्व लिए, शंख हर जीवन को प्रभावित करता है

सनातन धर्म का ये है प्रतीक, ध्वनी से कहीं आस्था तो कहीं बढ़ता जोश
सकारत्मक उर्जा के लिए होता शंख प्रयोग, नकारत्मक उर्जा का होता नाश

प्रतीक है शंख नाद का, ॐ का, जीवन का, आगाज़ का व् विजय घोष का

आओ करे प्रतिबिंब’ शंखनाद, आध्य्तम, नैतिकता और धार्मिक चेतना का

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

~मुक्त किया~

इस  चित्र पर उभरे भाव 




कल तक
जिस रिश्ते से जुड़े थे
वो रिश्ता सच था,
चाहे वो भ्रम था
भ्रम को टूटना ही था
हकीकत से मिलना था

हाँ उस बंधन से
मुक्त किया
हर उस शख्स को
जिसने भी
मुझसे स्नेह का
रिश्ता बनाया

लेकिन
सत्यापित है अब
स्नेह छलावा है
स्वार्थ का यही
एक कड़वा सच है
आज बदलते रिश्ते
उसकी गवाही देते है

कसमे वादे
अस्तित्व का चोला
छोड़ देते है
बदलते वक्त का
दामन थाम लेते है
नीरस हुए एहसास
करवट बदल लेते है

चाह नही बाकी
तो जुड़ाव भी कैसा
ना चाहते हुए भी
आज दिल पत्थर किया
भ्रमित 'प्रतिबिम्ब' जो बना
आज उसे मुक्त किया
हाँ मैंने तुम्हे
आज मुक्त किया

मुक्त किया ....

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

मोदी तुझे सलाम [ पैरोडी गीत ]





यहाँ वहां सारा जहाँ खोज लिया
मोदी जी तेरे जैसा कोई नहीं
ऐसे ही नही तुझे दुनिया
प्यार करती है
नहीं कहीं तेरे जैसा कोई नही

देखा पढ़ा जहाँ भी, बस तेरा नाम है
जो मेरे साथ देश को सम्मान दिलाती
सबसे प्यारा तेरा रुतबा
नाम है बस तेरा, नाम ही
मोदी तुझे सलाम मोदी तुझे सलाम
हाँ मोदी तुझे सलाम, मोदी तुझे सलाम

वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्
वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्
वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्

जब से तू राजनीति में आया
भारत ने विकास शब्द को पाया
सबका साथ सबका विकास अपनाया
अब तुझ पर ही आस हमारी
तुझे भगवान् सलामत रखे
भारत फिर से विश्व गुरु बने
तेरा नाम, भारत का मान बना रहे

वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्
वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्
वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्

दुनिया तेरे पास आ रही
अपनी बाहें खोल दे
सबको अपना बना ले
लोगो का विरोध चलता रहेगा
बस तू अपना काम कर
तुझसे ही सबकी उम्मीदे, मेरी भी आस है
तू भारत का भाग्य विधाता है
तू ही किरण, तू गर्व, मोदी

मोदी तुझे सलाम मोदी तुझे सलाम
हाँ मोदी तुझे सलाम, मोदी तुझे सलाम

वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्
वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्
वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्

सोमवार, 9 नवंबर 2015

बिहार चुनाव नतीजे पर - पैरोडी गीत




देख तेरे बिहार की हालत क्या हो गई भगवांन
विकास छोड़ जात पात से ऊपर न उठ सका इंसान

गरीबी बेरोजगारी से बिहार का नाता
अब कैसे होगा उत्थान
जात पात से ऊपर न उठ सका इंसान

नौकरी चाकरी न अब इनको प्यारी
दिल दिमाग में आरक्षण भारी
भोली भाली जनता सारी
नितीश लालू का जंगलराज, सन्मति का दे वरदान

जात पात से ऊपर न उठ सका इंसान
देख तेरे बिहार की हालत क्या हो गई भगवांन
विकास छोड़ जात पात से ऊपर न उठ सका इंसान

अपना घर छोड़ अन्य राज्य में बसते
शिक्षा के लिए घर से दूर है जाते
हे भगवान्
अब भारत में कुछ बदलो इंसान
मातृभूमि का जो करे सम्मान
पेट में अन्न नही बीफ पर मचा देखो घमसान
सन्मति दे भगवान्

जात पात से ऊपर न उठ सका इंसान
देख तेरे बिहार की हालत क्या हो गई भगवांन
विकास छोड़ जात पात से ऊपर न उठ सका इंसान

अपहरण, फिरौती वाले है जीते
सबका साथ सबका विकास वाले हारे
चारा खा कर अब तक पेट न भरा
कर लो बिहार वाले हर जख्म हरा
जनता को बेवकूफ बनाने का तैयार हुआ प्लान

जात पात से ऊपर न उठ सका इंसान
देख तेरे बिहार की हालत क्या हो गई भगवांन
विकास छोड़ जात पात से ऊपर न उठ सका इंसान

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

कोरा ख़त






पल पल का साथ समझ बैठा था जिसे
उसने इंतजार का चौकीदार बना दिया हमें

बिन मिले हमसे, चैन न आता था जिसे
आज वो चैन से रहते है बिना मिले हुए हमें

तस्व्वुर में बना रहता है आना जाना उनका
दिल की बात कहे हुए अब जमाना हुआ हमें

उस नदिया की लहर बनने ख़्वाब था मन में
छोड़ पीछे उसने आज किनारा बना दिया हमें

एहसास दिल के लिख भेजा था ख़त उन्हें
उनकी दरियादिली देखो ख़त कोरा भेज दिया हमें

चाँद तारों में देखकर बात करता था जिससे
आज 'प्रतिबिम्ब' उसने ही खामोश कर दिया हमें 

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

तेरा मिलना





एक भीड़
बिखरी सी आस पास
तेरा  मिलना
बना गया लम्हें खास

वक्त चला
तेरा साथ मिलता गया
इश्क का
हर लम्हा जीता गया

मेरी मोहब्बत
वक्त का सवाल था
तेरी मोहब्बत
वक्त का जबाब था

कुछ पल
हमें बैचेन करने लगे
कुछ एहसास
तन मन बसने लगे

नया दौर
अपना सपना टूटने लगा  
हर पल
इंतजार में गुजरने लगा  

वक्त बदला
साथ फिर छूटने लगा
आज फिर
भीड़ में खो गया 

..... सकता हूँ मैं



देख उदास तुम्हे
भला कैसे मुस्करा सकता हूँ मैं
हाँ रहो खुश तुम
वो प्यार देने की कोशिश कर सकता हूँ मैं

अमानत हो तुम
तुमसे कैसे खुद से दूर कर सकता हूँ
खुशी हो मेरी तुम
हर गम तुम्हारे ले सकता हूँ मैं

चाहता हूँ तुम्हे
चाहत से कैसे मुह मोड़ सकता हूँ
मोहब्बत हो मेरी तुम
तुम्हारे बिन कैसे रह सकता हूँ मैं

अपनाकर मुझे तुमने 
मेरे एहसास को तुमने जगह दी है
अहसान है तुम्हारा प्रिये
हकीकत को कैसे झुठला सकता हूँ मैं

जरुरत न हो जब मेरी
तब उपेक्षा बेहिचक कर सकती हो
प्यार में न सही प्रिये
मुसीबत में काम आ सकता हूँ मैं

शुक्रिया कहना चाहता हूँ
हक़दार नही जिसका मिला वो मुझे
जब लगे लायक नही
कह देना मुझे, दूर जा सकता हूँ मैं


-         प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

तू.....






हाँ तू शामिल है
मेरी रूह में
भोर से भोर तक
अनगिनत मुलाकाते
महकती है सांस
लिए मिलन की आस
पंखुडियां मोहब्बत की
खुलती जाती है पल पल
एहसास खुसबू बन
महका देते है रोम रोम
छल नही भावो में
पिघल जाता बस तन मन
आलिंगन करती स्नेह लता
सिमट जाती सारी कायनात
कोमलता और समर्पण से
पुरुस्कृत होता कण कण
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

... तू मेरी हो गई



नहीं जानता कैसे
तेरी मुस्कराहट
मुझसे जुड़ गई
और तुम मेरी बन गई 

चंद बातो से निकल
भावो में दिखने लगी
दिल में उतर कर
और तन मन में बस गई

अब तेरे बिन यूं तो
पल कोई कटता नही
सिमट कर मेरी बाहों में
न जाने कब तू मेरी बन गई

नीरस थे मौसम सारे
गुम थी जब तुम कहीं
पाया जिस दिन तुम्हे
सावन सी फुहार आ गई

तेरे इंतजार का
तेरे प्यार का
हर लम्हा महसूस किया
मिलते ही मेरी धरोहर बन गई

तेरी खुशी बन
तेरे गम अपना लूं
प्यार करता तुझे हर पल

जिस दिन से तू मेरी हो गई

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

सच या झूठ




देख रहा हूँ
कभी होकर मौन
कभी बेबाक बन
जिंदगी की परतो को
उधड़ते बुनते जाल को
मशीन बना कर्म
छूट रहा कही धर्म
वादा मोहब्बत का
सुर बगावत का
दोस्ती सीमित लेकिन
उदगार ज़माने के
आस एहसास फीके है
अब सीख लिए सलीके है
रुतबा जिम्मेदारी का
मानसिकता फरेब की
'प्रतिबिंब' देख अपना
असमंजस में पड़ गया हूँ
सच या झूठ,

पहचान नही पा रहा हूँ

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

मेरी जिन्दगी में तुम





मेरी जिन्दगी में तुम
कहो कहाँ कहाँ नही हो
तन मन में बसती हो
तुम हर रूप में शामिल हो

क्षितिज में उभरती
तुम पहली किरण संग
ढलती शाम से लेकर
तुम अंधेरी रात तक

सुबह की नर्म हवाओ में
दिन की गर्म हवाओ में
रात की सर्द हवाओ में
लिपटी सिमटी भावो में

चाहे हल्की बूंदा बांदी हो 
तुम झमझमाती बारिश में हो
तेज बारिश में भीगते हुए
बस तेरे ख्याल में रुझते हुए

तुम अकेलेपन की साथी हो
मेरे ख्यालो के गहराई में हो
मेरी नींद और ख्वाबो में हो
तुम हर गीत संगीत में हो

तुम एहसासों की बेल सी
रूठने मनाने की खेल सी
तुम साँसों की महक सी
मेरे मन की तुम वीणा सी

मेरे कर्म धर्म का स्तम्भ बन
तेरी मुस्कराहट से पुलकित मन
बोलो न मेरी जिन्दगी में

कहाँ कहाँ नही हो तुम ....


- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

बुधवार, 30 सितंबर 2015

खामोशी का शोर...







शब्दों का ताना बाना
कभी सवाल करता
वजूद बस मिट्टी सा
कभी यकीन दिलाता है


बनते बिगड़ते शब्द
उसकी बात करते है
कभी आवाज़ ओंधे मुंह
लहुलुहान गिरती है


खामोशी का शोर
शब्दों की भीड़ में
अकेला बात करता रहा
रिश्ते की आड़ में


रात में शब्द तन्हा है
कभी कविता बनते
कभी 'प्रतिबिम्ब' ये

क़त्ल भी कर देते है
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