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शनिवार, 11 जुलाई 2015

भाव और शब्द ....


क्या हुआ इतने बैचैन क्यों नज़र आ रहे हो ? भावो ने शब्दो से पूछ ही लिया. शब्दो की खामोशी बरक़रार ही रही. कुछ ऐसा था जो आज शब्दों को कुछ भी कहने से रोक रहा था. भाव शब्दों के निशब्द होने से मन ही मन खुद को असहाय महसूस कर रहा था. शब्दो से ही भावो को महसूस किया जा सकता है. अगर शब्द ही नही तो भाव किस काम का. भावो का मंथन जारी था, शब्दों का रुक जाना भावो से बर्दाश्त नही हो रहा था. भावो को अपनी इस हालत पर रोने का मन हुआ लेकिन बात फिर वही, बिना शब्दों के रो भी नही सकता. हँसना - रोना, दर्द - खुशी, धर्म - कर्म, सच - झूठ, गलत - सही, इन सबको कैसे मैं दिखलाऊं.
हिम्मत कर भावो ने शब्दों को अपनी ओर खींच लिया और गले लगा लिया. गले लगाते ही शब्दों ने भी खामोशी तोड़ दी. रुंधी आवाज़ में कहने लगे : भाव तुम हमारे बिना अधूरे हो. तुम हमसे वो सब करवाते हो जो तुम चाहते हो, तुम खुद को लोगो तक या अपनों तक पहुँचाने के लिए मेरा इस्तेमाल करते हो. बस यही सोचकर खामोश थे हम कि तुम हमसे कहलवाकर खुद न जाने कहाँ गुम हो जाते हो और लोग हमें ही अच्छी बुरी नज़र से देखते है. हम हर भाषा को अपनाते हैं, उन्हें तुम्हारा सन्देश सुनाते हूँ, समझाते हैं, लेकिन तुम्हारी भाषा कोई नही, तुम्हारा मन जो चाहता है, समझता है, देखता है वह सब हम लोगो तक पहुँचाने में सक्षम है लेकिन फिर क्यों कुछ लोग समझ पाते है, कुछ लोग समझ नही पाते है और कुछ हमें देखना तक पसंद नही करते.
भावो ने शब्दों को सहलाते हुए कहा नियति है, हम दोनों पूरक है एक दूजे के बस इतना ध्यान रखो. हमारा काम है मन में अवतरित होना और तुम्हारा काम है उन्हें लोगो के दिल और दिमाग तक पहुंचाना. यह उन पर निर्भर करता है कि वे हमसे कैसा व्यवहार करते है. उनकी समझ कहाँ तक हमें समझने में समर्थ है. हाँ उनकी आयु, उनका अनुभव, उनकी चाहत और उनका ज्ञान इसमें अहम् भूमिका निभाते है. यह सुनकर इस बार शब्दों ने भावो को गले लगा लिया और वादा किया कि सदैव भावो का साथ निभाते रहंगे....भाव और शब्द फिर तैयार खड़े है उसी उत्साह उसी उमंग के साथ और प्रतिबिम्ब भी इंतजार में है उनसे मिलने के लिए ... 

श्री ललिता प्रसाद बड़थ्वाल – एक परिचय


राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट.... राम भक्त और भक्ति की कई मिसाले इतिहास या धार्मिक ग्रंथो में दर्ज है, लेकिन इस जीवन काल में एक ऐसी ही विभूति से परिचय होना आश्चर्यजनक तो है ही लेकिन स्वयं में एक प्रेरणा एक दर्शन होना भक्ति का साक्षात प्रभु दर्शन करने जैसा होगा. जी हाँ कुछ समय पहले मुझे इसकी जानकारी स्नेही श्री अनिल बड़थ्वाल जी से मिली. और आज उस राम भक्त श्री ललिता प्रसाद बड़थ्वाल जी का उल्लेख करते हुए और आप सब से परिचय कराते हुए हर्ष के साथ सुखद अनुभूति हो रही है. उन्होंने राम नाम को सवा सो करोड़ बार लिखा. ‘राम’ नाम में उभरे दो अक्षरों से सारी रामायण को रच डाला. वे आज भी ‘सीता राम’ शब्द को लिखने में जुटे है. जिसे अब तक वो पौने दो करोड़ बार लिख चुके है. आइये मिलते है इस रामभक्त से और शुरुआत करते है उनके संक्षिप्त परिचय से.

राम भक्त श्री ललिता प्रसाद बड़थ्वालराम भक्त श्री ललिता प्रसाद बड़थ्वाल


श्री ललिता प्रसाद बड़थ्वाल जी का जन्म उत्तराखंड के गाँव बडेथ, पट्टी ढांगू, हिला पौड़ी गढ़वाल में हुआ. बचपन गरीबी के वातावरण में बीता और हाई स्कूल तक शिक्षा ग्रहण की और फिर जीविका हेतू रेलवे के चतुर्थ श्रेणी में भरती होकर कालका [हरियाणा] आ गए. साथ ही विद्याध्ययन भी करते रहे. ज्योतिष और धर्म के प्रति उनकी आस्था ने, उनकी लगन ने उन्हें रत्न-भूषन-प्रभाकर और विद्यावाचस्पति की उपाधि अर्जित की. २ वर्ष तक वे कालका में गढ़वाल सभा के महा सचिव रहे. सभा के नए प्रतिनधिमंडल में उन्हें प्रचार मंत्री के रूप में कार्य करने का मौका मिला. इसी दौरान उन्होंने लिपिक की परीक्षा पास की, और रेलवे में ही उनका स्थान्तरण भटिंडा [पंजाब] में हो गे. भटिंडा में श्री ललिता प्रसाद जी ने गढ़वाल भ्रातिमंडल की स्थापना की और महामंत्री के पद पर रहे. १९६० में उनका स्थान्तरण हुआ और वे गाजियाबाद आ गए. यहाँ भी कई वर्षो तक वे गढ़वाल सभा के सचिव रहे. पदोन्नति हुई और वे सन १९६८ में दिल्ली  आ गये, रेलवे के प्रधान कार्यलय में वे सीनियर कलर्क, हेड कलर्क एवं सुपरिटेंडेंट की हैसियत से कार्य करते हुए सं १९९१ में वे सेवानिवृत हुए.

उनका कहना है उनके पिता द्वारा ही उन्हें राम नाम की सीख मिली, उनके पिता रामायण बांचते हुये ही इस संसार से विदा हुए.  जब वे कार्य हेतू नित्य गाजियाबाद से नई दिल्ली जाते थे तो उसी रेल के एक डिब्बे में रामायण सत्संग होता था और उनका इस सत्संग से जुड़ना नियति कहा जा सकता है. बाल्यकाल से ही राम के नाम के साथ जुड़ना उनके जीवन में उस भक्ति को चरितार्थ करना ही था. वे नित्यरामायण सत्संग से जुड़े, एक वर्ष तक उपाध्यक्ष के रूप में संस्था में कार्य किया और ५ वर्षो तक इसी संस्था के अध्यक्ष के तौर पर राम नाम का प्रसार करते रहे. सन १९८\७ में एक धार्मिक सम्मलेन में श्री बड़थ्वाल जी का मिलना हुआ अयोध्या के प्रसिद्ध संत और राम जन्म भूमि के अध्यक्ष श्री नृत्य गोपालदास जी से. उन्ही से श्री ललिता प्रसाद जी को श्री राम नाम\ लेखन की प्रेरणा मिली.  दो अक्षरों ‘राम’ नाम से उन्होंने रामायण के हर श्लोक का सृजन किया और सम्पूर्ण रामायण को उन्होंने राममय बना दिया. श्री बड़थ्वाल जी के गुरु श्री रामानान्दाचार्य के चित्रकूट आश्रम के मानस मंदिर में यह रामायण आज भी भक्तो के दर्शनार्थ रखी हुई है. नौकरी के दौरान सहित [ १९८७ – १९९९] १२ वर्षो तक उन्होंने सव करोड़ बार राम नाम लिखने पर, उनके उत्कृष्ट और राम भक्ति से लबरेज सृजन के लिए उन्हें अंतराष्ट्रीय राम नाम बैंक, अयोध्या राम  मंदिर के संस्थापक श्री न्रित्यागोपल्दास ने स्वर्णपदक से सम्मानित किया.

हर श्लोक  के शब्दों को इसी तरह लिखा गया हैहर श्लोक के शब्दों को इसी तरह लिखा गया है राम नाम से सजी रामायण भेंट करते हुएराम नाम से सजी रामायण भेंट करते हुए

गजियाबाद के जगद्गुरु स्वामी श्री रामभद्राचार्य जी ने तुलसीमंडल संस्था की स्थापना की. श्री बडथ्वाल जी इस संस्था के उपाध्यक्ष भी है. मासिक पत्रिका ‘श्री तुल्सीपाठ सौरभ’ के वे १५ वर्षो तक प्रबंध संपादक रहे.  अब वे सांसारिक क्रियाकलापों से मुक्त होकर ‘सीतराम’ लिखने में सलंगन है. अब तक जिसे वे पोने डॉ करोड़ बार लिख चुके है. उनका कहना है कि श्री राम ही उनके डॉक्टर भी है उनका पावन नाम उनके जीवन में परम औषध का कार्य करती है. उनका एक पुत्र इंजिनियर है एवं दूसरा पुत्र जनरल मेनेजर. लेकिन वे राम नाम के साथ स्वयं को जोड़े हुए है. रामायण का ये श्लोक उनकी भक्ति के उद्देश्य को दर्शाता है

नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥ राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥

अर्थात ऐसे कराल (कलियुग के) काल में तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसार के सब जंजालों को नाश कर देने वाला है। कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है.

हर अक्षर में राम - राम शब्द को जोड़ कर पूरी रामचरित्र मानस को अपनी हस्तलिपि द्वारा पूर्ण करना असाधरण कार्य है. श्री बड़थ्वाल जी ने अधिकांश जीवन साहित्य और धर्म के सेवा में लगा दिया है. इस अद्वितीय एवं महान कार्य को पूर्ण करने में उनकी वर्षो की साधना और लगन है. इस महान रचना के रचयिता और राम भक्त को हम प्रणाम करते है. प्रभु से उनकी लम्बी आयु और स्वस्थता की कामना करते है.

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

वो....






फूलो से मोहब्बत सीखी है उसने, आँखों में शोखी कयामत ढाती है
महकती है फ़िजा उसके मुस्कराने से, घायल दिल को कर जाती है

ख़बर हर लम्हों की रखते है, करीब आने से न जाने क्यों डरते है
बेकरारी मिलन की बढ़ रही है, हर लम्हा जीते हर लम्हा मरते है

आँख मिलाती है आँखे चुराती है, आँखों से जाम पिलाती जाती है
कभी रंग-ए-मोहब्बत दिखती है, मगर हवा बगावत करती जाती है

लबो पर तबस्सुम लिए फिरती है, उस पर नज़ाकत का क्या कहना
शरारत दिल करना चाहे 'प्रतिबिम्ब', उसकी शराफत का क्या कहना

सोमवार, 6 जुलाई 2015

जख्म




तब चल रही थी बयार कुछ हल्की हल्की
बरस रही थी तब फुहार कुछ हल्की हल्की
अहसास मन में भीग रहे थे कुछ धीरे धीरे
चाहत के फूल खिलने लगे थे कुछ धीरे धीरे

ख्वाब हकीकत से लगने लगे थे होले होले
कश्ती प्यार की तैरने लगी फिर होले होले
खुशबू से उसकी महकने लगे थे तन मन
संगम प्रीत का महसूस कर रहे थे तन मन

फिर वक्त और किस्मत चलने लगे संग संग
टूटने लगे वो ख्वाब सारे जो बुने थे संग संग
वक्त का आंधी तूफ़ान करने लगा हमें दूर दूर
कल थे पास पास आज हम हो गए है दूर दूर 

जानता हूँ किस्मत के सितारे बदलते है पल पल
भावो में छिपी आस की जंजीर टूटती है पल पल
‘प्रतिबिम्ब’ ये जिंदगी यूं भी सताती है कभी कभी

जिंदगी जख्म पर जख्म देती जाती है कभी कभी 

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
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