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गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

मेरी जिन्दगी में तुम





मेरी जिन्दगी में तुम
कहो कहाँ कहाँ नही हो
तन मन में बसती हो
तुम हर रूप में शामिल हो

क्षितिज में उभरती
तुम पहली किरण संग
ढलती शाम से लेकर
तुम अंधेरी रात तक

सुबह की नर्म हवाओ में
दिन की गर्म हवाओ में
रात की सर्द हवाओ में
लिपटी सिमटी भावो में

चाहे हल्की बूंदा बांदी हो 
तुम झमझमाती बारिश में हो
तेज बारिश में भीगते हुए
बस तेरे ख्याल में रुझते हुए

तुम अकेलेपन की साथी हो
मेरे ख्यालो के गहराई में हो
मेरी नींद और ख्वाबो में हो
तुम हर गीत संगीत में हो

तुम एहसासों की बेल सी
रूठने मनाने की खेल सी
तुम साँसों की महक सी
मेरे मन की तुम वीणा सी

मेरे कर्म धर्म का स्तम्भ बन
तेरी मुस्कराहट से पुलकित मन
बोलो न मेरी जिन्दगी में

कहाँ कहाँ नही हो तुम ....


- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

बुधवार, 30 सितंबर 2015

खामोशी का शोर...







शब्दों का ताना बाना
कभी सवाल करता
वजूद बस मिट्टी सा
कभी यकीन दिलाता है


बनते बिगड़ते शब्द
उसकी बात करते है
कभी आवाज़ ओंधे मुंह
लहुलुहान गिरती है


खामोशी का शोर
शब्दों की भीड़ में
अकेला बात करता रहा
रिश्ते की आड़ में


रात में शब्द तन्हा है
कभी कविता बनते
कभी 'प्रतिबिम्ब' ये

क़त्ल भी कर देते है
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