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रविवार, 10 अप्रैल 2016

मैं और मेरी परछाई




आगे पीछे डोलता मेरा वजूद
कभी लम्बी कभी छोटी
होती मेरी अपनी परछाई
शब्द नही हैं उसके पास
लेकिन सवाल बहुत है
भीड़ में खो जाती है
अकेले में मुझसे
बहुत बात करती है 
मेरी  परछाई
रोते दर्पण सी
अपने प्रतिबिम्ब को
छलती है
अस्तित्व की तलाश में
कभी रुसवा होती है
कभी मौन होती है
कभी हंसती खिलखिलाती
तन्हाई से मोहब्बत करती है
या फिर
अँधेरे में गुम हो जाती है  

आज मुझे आवाज दे गई
मेरी अपनी ही परछाई
और
सवालों की अनंत धाराएँ
बह निकली होकर दिशाहीन
धैर्य पहचान खोकर
आक्रोश से सांठ गांठ कर बैठा
कड़वी आवाज बार बार
गर्जन कर रही
मानवता होकर तिरस्कृत
आँचल बेहूदी का ओढ़कर
जहरीले स्वर में
अभिनन्दन कर रही

रिवाज शहर का
ऊँची इमारतों ने
बदल दिया है
झुकना, अदब की रीत
आज दरवाजो में बंद है
भूख सडक पर
बदहवास घूमती है
गरीबी का नग्न तांडव
कैमरों की सुर्खियों में
लम्बी साँसे लेकर
दम तोड़ने को मजबूर

बेखौफ घूमता अपराध
छुपती छुपाती इंसानियत
उजाले में भी अँधेरे जैसा डर
लडखडाता तंत्र
एक दूजे पर अंगुली उठाते
एक दूजे के बने दुश्मन लोग
वजूद मिटाने पर तुले लोग
संस्कृति और संस्कार
को ठेंगा दिखाते स्वतंत्र नागरिक
प्रकृति का चेहरा पोतते लोग
खुद के लिए कब्र खोदते लोग

शांति का शील भंग हुआ
माँ का अपमान आम हुआ
जाति धर्म से लदे
कूड़े के ढेर पर
रोटियां राजनीति की
पक रही है
देश की अखंडता पर
जलती लकड़ियाँ फैंकने वाले
आग सेक रहे है
आग पर घी डालती
नामर्दों की एक लम्बी कतार

कांपने लगी मेरी परछाई
पूछ कर कई सवाल
साथ चलने से इंकार करती
लेकिन उसको कोई पहचानता नही
रोती बिलखती
मेरे साथ चलने को मजबूर
मैं और मेरी परछाई

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १०/४/२०१६ 

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