पृष्ठ

सोमवार, 29 अगस्त 2016

तुम मेरा गौरव







क्षितिज पर
लालिमा का बिखराव होते ही 
नयनों के
सपन लोक से बाहर आते ही
हकीकत से
सामना होते ही वो आ जाती है
सूरज की किरणें
उसे सुनहरी ओढ़नी में सजा देती है

और फिर .....
तन मन पर
उसका प्रभाव स्वत: ही नज़र आता है
खिला सा चेहरा उसका
आँखों के आगे तितली बन मंडराता रहता है
हर रंग से सजी
उसकी अदा आस पास रहने को मजबूर करती है
छू लेने की चाह
तमन्ना बन आगोश में भरने को मचल जाती है

देखो न ....
शब्दकोश के सारे शब्द
यहाँ - वहाँ अपनी छाप छोड़ने को व्याकुल है
अर्थ और भाव भी
सब के हृदय पटल पर प्रभावित करने को तैयार है
अमर प्रेम सी प्रियसी बन
तुम मेरे दिन - प्रतिदिन और रोम रोम में व्याप्त हो

हाँ तुम मेरा गौरव, मेरा प्रेम "हिन्दी" हो .......


-      प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपकी टिप्पणी/प्रतिक्रिया एवम प्रोत्साहन का शुक्रिया

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...