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रविवार, 18 दिसंबर 2016

वक्त का साया









वक्त का साया
स्वर्ग नरक खाई से
भी अलग
कई गुना गहराई तक
दफन कर देता है
हर उम्मीद
हर हौसले
हर जज्बे
की तड़फती चीख को

मानवता
दम तोडती हुई
निवस्त्र कर देती है
इंसानियत के ओढ़े हुए
आवरण को....
धोबी के कुत्ते सा
न घर पर न घाट पर
ला कर पटक देती है
और
बेजुबान कर देते है
वक्त के तीखे ज़ख्म...
झुलसता जाता है
रोम - रोम बिखरता
टूटता - कराहता हुआ
रेंगते हुए
अनिश्चितकाल के आगोश में
दुबक कर बैठ जाता है...

दिखाई तो नहीं देती
लेकिन सुनाई देती है
एक चीत्कार
जो खुद से निकल
खुद में ही समाधि लेती है
आस पास भीड़
बहरी हो कर
नपुंसक बन जाती है
उनके मन के कोने में
ताली पीटते एहसास
खुद को राजा
दूसरे को रंक समझ लेते है
जीत का काला झन्डा
आँखों के सामने
तांडव करते हुए
खिलखिलाहट करता हुआ
नस्तर चुभोता जाता है

कौन भागीदार
कौन चौकीदार
कौन अपना
कौन पराया
शतरंज की बिसात पर
चाल चलते...
पाप पुण्य की परिभाषा से अलग
अपने ओहदे की गरिमा का
नाज़ायज प्रदर्शन करते
मुंह में राम बगल में छुरी
मुहावरे को सत्यापित करती
सैंकड़ो बेदर्द आत्माए
वक्त के आगोश में सिमट
मीठे जहर सा फैलता हुआ
मेरे अस्तित्व को ‘प्रतिबिम्ब’
मिटाने की
चेष्टा करता हुआ
वक्त का साया ...

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  १८/१२/२०१६

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