पृष्ठ

सोमवार, 27 मार्च 2017

~हालात की नज़र~




हमें जिन्दा देख कर हैरान है अपना कहने वाले
दर्द में हमें देख कर भी बहुत है नज़र फेरने वाले

वक्त के दर्द का घाव अंदर ही अंदर रिसता रहा
उभरती हुई हसरतो को बेपनाह दर्द मिलता रहा

मैंने लगा लिया गले जो आज तक वक्त ने दिया
वक्त की मजबूरियां होगी जो उसने हँसने न दिया

अस्तित्व मेरा स्वयं खुश रहने की कला सीख रहा है
वरना यहाँ बिगड़े हालात पर खुश होने वाले बहुत है

जानता हूँ एक दिन किस्मत अपनी खिल खिलायेगी
मगर 'प्रतिबिंब" तब तक कई रिश्तों की विदाई हो जायेगी

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २७/३/२०१७ 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपकी टिप्पणी/प्रतिक्रिया एवम प्रोत्साहन का शुक्रिया

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...