पृष्ठ

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

खत्म हुआ खेल “ख”(खुशियों) का



रुठना खासियत है उनकी, खिसियाना अब आदत बन गई
खिझाना वो छोडते नही, मौजदूगी मेरी अब खुरचन बन गई

खामोश हूँ मैं तेरी खातिर, ख्वाहिश थी तेरी, खैरात नही मांगी थी
खस्ता हाल है, खोखला सा जीवन, ख्वार की मुराद नही मांगी थी

खंगालता रहा मैं अपना इश्क, ना जाने क्यो खटकता रहा उन्हें
खटिक सा घूमा मैं उनके शहर और गली, खबर भी ना हुई उन्हें

खंख है जीवन,खपने लगा मैं, खंभार सा रिश्ता, खंडहर सा मैं
ख्यालि नही अब खंडित हूँ मैं,खरमास की तरह खटकता रहा मैं

खलियान सा खिले सोचा था,लेकिन खारा हुआ अब तो रिश्ता
खिदमत का कंहा मिला मौका, एक खरोंच से टूटा अब ये रिश्ता
         
   प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

12 टिप्‍पणियां:

  1. वाह अद्भुत प्रतिबिम्ब भाई ...
    'ख ' से जितना हो सकता था ...आपने कर दिखाया
    बहुत खूब ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. ख्यालि नही अब खंडित हूँ मैं,खरमास की तरह खटकता रहा मैं

    खरमास का उपयोग बहुत गज़ब का है ...बहुत अच्छी नज़्म

    उत्तर देंहटाएं
  3. शुक्रिया बबन जी एवम संगीता जी... बस 'ख'अक्षर से कुछ शब्दो को एक्त्र कर रहा थो कुछ श्ब्दो को इसमे पिरो पाया...

    उत्तर देंहटाएं
  4. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना कल मंगलवार 28 -12 -2010
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..


    http://charchamanch.uchcharan.com/

    उत्तर देंहटाएं
  5. 'ख' से कई रंग , भाव पिरोये हुए सुन्दर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  6. उत्तर
    1. रिया जी आप मित्रो का स्नेह - धन्यवाद

      हटाएं
  7. ख की ख़लिश , खरास , खटास ...सब एक साथ ..
    वाह जनाब !

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणी/प्रतिक्रिया एवम प्रोत्साहन का शुक्रिया

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...