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गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

प्रेम सप्ताह





अंग्रेजो ने शगूफा छोड़ा
भारतीयों ने अपना रंग छोड़ा
बिकने लगा प्रेम दुकानों पर 
अपने भावो ने साथ छोड़ा
हर प्रेम को बाँट कर
पाश्चात्य का रंग जोड़ा

हर कोई अब
प्रेम अपना दिखाने लगा
अपने प्रेमी को
अपना बताने लगा
प्रेम प्रसंग अब
दूसरे बांचने लगे
भावो की अभिव्यक्ति को
अधिकार समझ
गली गली नुमाइश करने लगे
टेडी बियर हो या चाकलेट
धड़ल्ले से बिकने लगे
प्रेम का देते जबाब
ग्रीटिंग कार्ड और गुलाब
सप्ताह भर चलता खेल
फिर चाहे हो न हो मेल

लेकिन
प्रेम पवित्र
है अपने संस्कार
व्यक्तिगत
होता इसमें आदर अपार
खुद के भावो से सजाकर
प्रेम को मिलता पूजा सा आधार
अपने होते इसमें एहसास
हर लम्हे होते ख़ास
पल पल प्रेम अवतरित होता
बन शृंगार चेहरे पर सजता
तन मन को पुलकित करता
जन्म् जन्म का वायदा होता
प्रेम का कण कण में विस्तार होता

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ११/२/२०१६

1 टिप्पणी:

  1. सही कहा सर प्रेम का विस्तार तो कण कण में होता है

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