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गुरुवार, 12 जनवरी 2012

एक पत्ता





एक पत्ता
अपनी खूबसूरती
पर मचलने लगा
रंग पर इतराने लगा
सोचने लगा
काश मैं भी
यहाँ से निकल
दुनिया के रंग मे घुल जाऊँ

टूटा पत्ता साख से
हवा के साथ चल पड़ा
आज़ाद हुआ कहकर
मुस्कराने लगा
अब पेड़ से
ना कोई बंधन
ना कोई शिकायत

उठते गिरते पड़ते
हवा के थपेड़ो संग
ना जाने कहाँ खो गया
खुद को अकेला पा
उसे अहसास हुआ
अपने अस्तित्व का
सोचने लगा वह
उस साख से फिर
कभी न जुड़ पाएगा

और अब
सूख कर
मिट्टी मे मिल जाएगा
मिट्टी मे मिल जाएगा

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

10 टिप्‍पणियां:

  1. हृदयस्पर्शी कविता है। पढ़ते-पढ़ते ऐसा आभास होने लगता है मानो पत्ता क्या है..एक मासूम सा बच्चा है जो अपनी माँ से बिछुड़ कर अब घबरा रहा है....। शब्द सार्थक हैं।

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    उत्तर
    1. सच कहा आपने प्रभा जी .... वास्तविकता है ... शुक्रिया

      हटाएं
  2. बहुत कुछ कह दिया आपने ..गहरी अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत गहरी और सच्ची बात कह दी है।
    तारीफ में कविता के वश यह शब्द हैं काफी।
    कृपया इसे भी पढ़े-
    नेता कुत्ता और वेश्या

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर बिम्ब -विधान !एक बार शाख से अलग होने पर अपने अस्तित्व को बचाना कितना कठिन है -इसे बखूबी वर्णन किया है ..बधाई !

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणी/प्रतिक्रिया एवम प्रोत्साहन का शुक्रिया

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