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सोमवार, 25 जून 2012

लम्हा - लम्हा आओ फिर से जी जाएँ




कौन - कौन है अपना यंहा, किस - किस ने दिया साथ
कंहा - कंहा अपना ठिकाना, किस - किस ने थामा हाथ

चुन - चुन कर दोस्त बनाते, बुन - बुन कर रिश्ते संवारते
कण - कण प्रेम का हम सजाते, जन - जन को अपना कहते

आज - कल का भेद ना जाने, कल - परसो के लिये आज बिगाड़े
धर्म - अधर्म का पाठ रोज़ पढते, पल - पल धर्म से हम नाता तोड़े

इधर - उधर की बातों मे कान लगा, जन - मानस की करते बात
सुध - बुध खो बिखर रहे, क्षण - क्षण दुश्मनी की बैठ रही बिसात

तेरा - मेरा बना अब रिश्ता,  उलट - पुलट हुआ देखो सब विधान
अपने - पराये का बस छेडते राग, करते - करते छोड जाते निशान

तन - मन में आओ प्रेम जगाये, घर - घर में देश प्रेम की जोत जलाएँ
जन - जन को अपना हम बनाएँ, लम्हा - लम्हा आओ फिर से जी जाएँ

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

2 टिप्‍पणियां:

  1. लम्हा - लम्हा आओ फिर से जी जाएँ----- very nice composition

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  2. तन मन में आओ प्रेम जगाएं
    घर घर में राष्ट्र प्रेम की जोत जलाएं.....
    अत्यंत ही प्रेरक एवं भाव पूर्ण आव्हान ....
    शुभ कामनाएं प्रतिबिम्ब जी !!

    उत्तर देंहटाएं

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