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शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

चक्रव्यूह



प्रतिष्ठा के अहंकार से मुक्त
संस्कार रूपी शिक्षा से लैश
अपने व्यवहार का कवच पहन
कलम का निर्भीक अस्त्र उठा
वाणी का अचूक शस्त्र ले कर
चला था अपनों की  तलाश में

कुछ ही दूर पर अपनों का शिविर
जैसे मेरा ही इंतजार उनको था
नए नियमों का उल्लेख करते 
सैकड़ों  परिचित अपरिचित चेहरे 
सबके उठे हाथ और बंद मुट्ठी
कुछ ही क्षणों में कारवां बन गया

भीड़ थी, जिसे कारवां समझ लिया
किसी आवाज़ पर मुड़ने वाले चेहरे
पता नही कब रास्ता भटक बिछड़ गए 
जो बचे अपने थे, शायद जख्मों को खुरेदने 
प्रेम का जहर पिला, बगल में छुरी लेकर
मैं मोह जाल में फंस, उफ़ भी न कर सका 

मैं अभिमन्यु !!! रिश्तों के चक्रव्यूह का
स्नेह, आदर और विश्वास का मुखौटा पहने
अपने ही लोगो से - पराजित अभिमन्यु !
काश ‘प्रतिबिम्ब’, अभिमन्यु की तरह ही
गर्भ में ही इस चक्रव्यूह का रहस्य जान लेता
तो आज मुझे कदापि इतना दुःख नहीं होता

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २३/०२/२०१८

6 टिप्‍पणियां:

  1. सबके उठे हाथ और बंद मुट्ठी
    कुछ ही क्षणों में कारवां बन गया..
    गूढ़ रचना..
    दो बार और पढ़ना पड़ेगा..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 04 नवंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  3. आभार यशोदा जी ... कुछ विषय सपष्ट होकर भी अंजाने से लगते है।

    जवाब देंहटाएं
  4. दिग्गविजय जी बहुत बहुत आभार आपका।

    जवाब देंहटाएं

आपकी टिप्पणी/प्रतिक्रिया एवम प्रोत्साहन का शुक्रिया

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