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सोमवार, 24 जनवरी 2011

तेरा जिक्र




हर बात पर तेरा जिक्र जरुरी है
वरना मेरी कही हर बात अधूरी है

अगर शब्द बन कर तेरा नाम ले पाऊँ
लिखते हुये मन में तेरा जिक्र कर जाऊँ

तेरी दूरी का अहसास कभी होने नही देता
तेरा जिक्र मुझे कभी तन्हा होने नही  देता

कुछ ख्याल उनका कुछ जिक्र उनका
वक्त जब तब याद दिलाता है उनका

तेरा जिक्र किया तो हाज़िर जबाबी कहलाये
समझने वाले इसे भी  लाज़बाब कह गये

जिक्र करता हूँ तेरा चेहरा आंखो में आता है
तेरे अहसास से चेहरा फूल सा खिलने लगता है

मेरी दुआओ मे भी तेरा जिक्र आता है
ख्यालो मे भी पहले तेरा नाम आता है

खुश हो जाता हूँ जब साथ तेरा होता है
वंहा भी हर बात में जिक्र तेरा होता है

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

अंबु से...




अंबु से निर्मित हुआ इस धरती पर
अंकुरित हुआ इस पावन धरती पर

अंबर में अंकित जैसा एक सितारा
अंलकार सा सजा बना जैसा अंगवारा

अंशु सा चमकता, अंशुमान का पदार्पण हुआ हो जैसे 
फूल अंकटक सा खिल मेरे तन से लिपटा हो अब जैसे

अंचित है सब प्रियजन, तुम भी अंबक में बसते हो
अंजौरी बन मेरे जीवन में, अंतर्मन मे तुम रहते हो

अंचल सरकता है, टखने में अंदुक सज़ते है
देख तुझे अंतरपट मेरे तब खुल जाते है

अंजन बन किसी की नयनो में बसता हूँ
अंगार बन किसी की नयनो में खटकता हूँ

अंगन्यास किया रिश्तो के बंधन में बंधने के लिये
इंसानियत एक अंगत्राण है समाज मे जीने के लिये

अंतर्दाह कभी गिरा देता है कभी उठाता है
हमारा कर्म कभी हमें अंतकारी बनाता है

जीवन मृ्त्यु का अंतराल जीना है हमें
सत्य है अंतगति, सामना करना है हमें

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

हौसला है तो ..




जीत ना मिले चाहे, हौसला बरकरार रहे
प्यार ना मिले चाहे, ज़ज़्बा बरकरार रहे

राह चाहे आसान ना हो, कदम बढते रहे
अंधेरा बेसक राह छिपाये, चिराग जलते रहे

नसीब चाहे साथ ना दे, लकीरे  बनती रहे
गुम हुई अगर सदाये, आवाज़ लगती रहे

जिंदगी चाहे मुंह मोड ले, जंग चलती रहे
खुशिया चाहे ना मिले, महफिल सजती रहे

प्रश्न कठिन है जिंदगी के, उतर देते रहे
फल चाहे ना मिले अभी, कर्म करते रहे

फूल चाहे मुरझा जाये, महक बिखरती रहे
खुदा को ना देखा हमने, तलाश चलती रहे

इस दुनिया में आये है तो जिंदगी जीना है
जीने का मज़ा मुस्कराहट और हौसला है
हौसला है तो राहे है, राहे है तो मंजिल है
तेरे हौसले में 'प्रतिबिम्ब' की दुआ शामिल है।

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

ज़िंदगी के कैनवास पर...




जिंदगी को लिखने का मौक़ा मिला
कई पन्नो और कलम का साथ इसमें मिला
कभी पन्ने खाली रहे
कभी कुछ लिखा गया
कभी दूसरो का कहा लिख गया
कभी बहुत कुछ इसमें लिखा गया
कभी तोड मोड कर फेकं दिया
कभी उन्ही पन्नो को फिर से उठाया

कभी इसमें आंसू जुड़े
कभी इसमे प्रेम जुड़ा
कभी इसमे खुद को जोडा
कभी इसमे अपनो को जोडा
कभी समाज कभी देश इनमे उभरा
कभी बन आईना अंतर्मन इसमे उतारा

  कभी ये पन्ने
  आसमान सा कैनवास बन जाते है
  जिसमे सब कुछ समेटने का मन करता है
  कभी ये पन्ने
  सागर की लहर बन जाते है
  जिसमें हिलोरे खाकर दूसरी लहर में मिल जाता हूँ
  कभी ये पन्ने
  फूल की पंखुड़ी बन जाते है
  जिसमें खुशबू बन अपनो के संग चल पडता हूँ
  कभी ये पन्ने
  प्लास्टिक सा बन जाते है
  जिसमें लिखने की हर कोशिस नाकाम होती है
  कभी इन पन्नो पर
  पानी फिर जाता है
  जिसमें स्याही फैल जाने से, सोच नया रुप लेती है
  कभी इन पन्नो पर
  कलम आढी तिरछी रेखाये अंकित करती है
  जिसमें रेखायें अलग दिखती है,सब बिखरा सा लगता है

  जीवन की कलम में स्याही अभी भी बाकी है
  निरंतर चलती रहेगी तब तक उम्मीद बाकी है
  कविता और सोच की जुगल्बन्दी अभी बाकी है
  ज़िंदगी और मेरी दास्तां की गुफ़्त्गू अभी बाकी है
  कलम और पन्ने की कहानी अभी भी बाकी है
  आपके साथ और स्नेह की रिवायत अभी बाकी है

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

रविवार, 2 जनवरी 2011

तेरा साथ


देखता रहा तुझे आते हुये
तेरे साथ ही मैं जिया।
कभी तूने प्यार दिया,
कभी तूने रास्ता दिखाया,
कभी खुशी और कभी गम,
तूने मुझे इस राह में दिया।

तेरे साथ,
कभी चला,
कभी लडखडाया,
कभी दौडा।

तेरे साथ
ठहरने का मन हुआ,
लेकिन रुक नही पाया,
क्योकि निरंतर चलना,
तेरी फितरत है।

तेरे इशारो पर,
नाचता रहा अब तक,
कभी सिर झुकाया
कभी सीना चौड़ा किया।

सोचा भी,
तुझसे आगे निकल जाऊँ,
लेकिन एक पल भी
तेरे बिन
आगे ना चल पाया।

सोचा,
तेरे साथ बिताये पलो में,
फिर से शामिल हो जाऊँ।
लेकिन वो तो बीत गया,
यादो को समेटने के सिवाय,
मैं कुछ न कर पाया।

लेकिन ये कैसा सच है,
जिसमे पीछे और आगे
जाने की मनाही है।
बस तेरे साथ चलना
हकीकत भी है
और मज़बूरी भी है।

समय !!!!
मेरा वादा है तुझसे,
तेरे साथ चलने का।
जब तक चल सकूंगा,
अपना कर्तव्य निभाऊंगा।
मातृभूमि और कर्मभूमि,
से अपना रिश्ता निभाऊँगा।
तेरे साथ ही चलकर मैं,
अपनो से फर्ज़ निभाऊँगा।
समय आज ही तू मेरे साथ है,
कल के लिये खाली मेरे हाथ है।

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

आग


जलना या जलाना है इसका स्वभाव
दहनशील पदार्थ है छोडती अपना प्रभाव
बुझती है जब आक्सीजन का हो अभाव
लेकिन रोशनी और क्षति है इसका भाव

घर्षण से पैदा होती है चिंगारी
चिंगारी से जलती/बढती है ये आग 
हवा और ज्वलनशील वस्तु बढाते है आग
पानी और मिट्टी से बुझती है आग 

आग पवित्र है हमारी आस्था बनकर
कही जोत, कंही सतत अग्नि बनकर
कंही रोशन करती है रोशनी बनकर
कंही विज्ञान में है सहायक बनकर

वीरो के सीने में भी जलती है आग
क्रोध में भी शब्द उगलते है आग
दुश्मनी में भी एक हथियार है आग
जीवन में भी एक जरुरत है आग 

कभी आस है आग, तो कभी है विनाश
कभी दाह है आग, तो कभी है प्रकाश 
कभी त्यौहार है आग, तो कभी है द्वेष
कभी गवाह है आग, तो कभी है क्लेश

संस्कृति, जीवन और विज्ञान 
आग का है हर पल योगदान 
प्रयोग करे, दे इसे मान सम्मान
रिश्तो मे जोड ना करे अपमान
              
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

खत्म हुआ खेल “ख”(खुशियों) का



रुठना खासियत है उनकी, खिसियाना अब आदत बन गई
खिझाना वो छोडते नही, मौजदूगी मेरी अब खुरचन बन गई

खामोश हूँ मैं तेरी खातिर, ख्वाहिश थी तेरी, खैरात नही मांगी थी
खस्ता हाल है, खोखला सा जीवन, ख्वार की मुराद नही मांगी थी

खंगालता रहा मैं अपना इश्क, ना जाने क्यो खटकता रहा उन्हें
खटिक सा घूमा मैं उनके शहर और गली, खबर भी ना हुई उन्हें

खंख है जीवन,खपने लगा मैं, खंभार सा रिश्ता, खंडहर सा मैं
ख्यालि नही अब खंडित हूँ मैं,खरमास की तरह खटकता रहा मैं

खलियान सा खिले सोचा था,लेकिन खारा हुआ अब तो रिश्ता
खिदमत का कंहा मिला मौका, एक खरोंच से टूटा अब ये रिश्ता
         
   प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
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