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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

मेरी जिन्दगी में तुम





मेरी जिन्दगी में तुम
कहो कहाँ कहाँ नही हो? 
तन मन में बसती हो
तुम हर रूप में शामिल हो

क्षितिज में उभरती
तुम पहली किरण संग
ढलती शाम से लेकर
तुम अंधेरी रात तक

सुबह की नर्म हवाओ में
दिन की गर्म हवाओ में
रात की सर्द हवाओ में
लिपटी सिमटी भावो में

चाहे हल्की बूंदा बांदी हो 
तुम झमझमाती बारिश में हो
तेज बारिश में भीगते हुए
बस तेरे ख्याल में रुझते हुए

तुम अकेलेपन की साथी हो
मेरे ख्यालो के गहराई में हो
मेरी नींद और ख्वाबो में हो
तुम हर गीत संगीत में हो

तुम एहसासों की बेल सी
रूठने मनाने की खेल सी
तुम साँसों की महक सी
मेरे मन की तुम वीणा सी

मेरे कर्म धर्म का स्तम्भ बन
तेरी मुस्कराहट से पुलकित मन
बोलो न मेरी जिन्दगी में

कहाँ कहाँ नही हो तुम ....


- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

खामोशी का शोर...







शब्दों का ताना बाना
कभी सवाल करता
वजूद बस मिट्टी सा
कभी यकीन दिलाता है


बनते बिगड़ते शब्द
उसकी बात करते है
कभी आवाज़ ओंधे मुंह
लहुलुहान गिरती है


खामोशी का शोर
शब्दों की भीड़ में
अकेला बात करता रहा
रिश्ते की आड़ में


रात में शब्द तन्हा है
कभी कविता बनते
कभी 'प्रतिबिम्ब' ये

क़त्ल भी कर देते है

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

तुम ....




रंग रूप का मुझे भान नही, बस जानता हूँ तुम मेरी हो
मेरे कण - कण में है जो रची बसी, वो खुशबू तुम हो
हाँ अपार सौन्दर्य हृदय का लिए, कभी तुम इठलाती हो
पढ़ मेरे नयनो की चंचल भाषा, कभी तुम शरमाती हो

हर्षित है तन - मन, चेहरे पर मुस्कान नित नूतन लिए
प्रेम पाठशाला में हो उपस्थित, नित नया अध्याय लिए
पुलकित करती है तुम्हारी वाणी, अलंकार प्रेम का लिए
रचती हर पल नवगीत, स्वर और सुर समर्पण का लिए

माधुर्य तुम्हारी जीव्हा पर, आँखों में बसता मधुर संसार
अंग - अंग सजते भावो से, प्रेम का होता अद्भुत शृंगार
संयोग है मिलन तेरा मेरा प्रिये, प्रेम बना अब आधार
परिपूर्ण निष्ठा का अहंकार लिए, है समर्पित तेरा संसार  

प्रेम की अब क्या परिभाषा दूं, बस जो कुछ हूँ तेरे लिए
प्रफुल्लित होता मेरा मन, तुझ संग या आभास तेरा लिए
महक उठती तन मन की बगिया प्रिये, एहसास तेरा लिए
तेरे पास बीता हर पल प्रिये, बन जाता है ख़ास मेरे लिए

भानु की किरण संग, कर प्रभु स्मरण मैं करूँ तेरा ध्यान
बनी रहे खुशियाँ तेरी, मिलता रहे जग में मान - सम्मान
मेरी अभिलाषा की आशा तुम, सफलता की हो तुम सोपान
जो चाहो पा जाओ तुम, हर कदम सफलता से हो पहचान

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

रविवार, 13 सितंबर 2015

ख़्वाब....






कोई ख्वाब कही इंतजार कर रहा है
हकीकत बनने को बस मचल रहा है
क्षितिज पर एक किरण अभी उभरी है
बस मेरी नज़र जाकर अब वही ठहरी है  

कल्पनाओ की परछाई साथ भाग रही है
दिलो की धड़कन उसकी गवाही दे रही है
एहसासों की मध्यम बयार चल तो रही है
लिपट लेना मिलकर हवा भी ये कह रही है

मेरे उभरते ख्वाब की जुम्बिश तुम सी है
जो नज़र झुकाए और नज़र चुराए आती है
कोमलता का शृंगार लिए मुझ से मिलती है
भावुकता से बस दिल बहला चली जाती है

खुले आसामा पर फिर चेहरा उतर आता है
बात ही बात में न जाने कहाँ खो जाता है
एहसासों का ‘प्रतिबिंब’ तब धुंधला जाता है
इन्द्रधनुषी आसमा फिर स्याह हो जाता है

मेला ख्वाबो का अक्सर टूट ही जाता है
मगर हसीन सा खिलौना साथ दे जाता है
खेलता रहता कोई, दिल सौदा कर लेता है
ख्वाबों के शहर में फिर, उम्र जाया करता है  


सोमवार, 7 सितंबर 2015

प्रेम का पोस्टमार्टम




आज प्रेम का पोस्टमार्टम किया जाए. ये तो कौन नही जानता की पोस्टमार्टम कब किया जाता है ... लेकिन अगर प्रेम के जिन्दा रहते किया जाए तो बात कुछ और है. प्रेम तो हर रिश्ते की नीव है लेकिन मैं उस प्रेम की बात कर रहा हूँ जिसे मोहब्बत, इश्क, आशिकी जैसे कई और नामो से नवाज़ा गया है और यह  सभी जीवो में पाया जाता है.

आकर्षण प्रेम की प्रथम सीढ़ी है. आकर्षण व्यक्तित्व का, आकर्षण चित्त का, आकर्षण मन का, आकर्षण तन का, आकर्षण सौन्दर्य का, आकर्षण कामुकता का, आकर्षण भावो का, आकर्षण शब्दों का, आकर्षण ज्ञान का, आकर्षण आदतों का, आकर्षण स्वप्नों का. कई तरह के आकर्षण आँखों और कानो के द्वारा दिल में स्थान बनाते है.

आकर्षण के बाद दूसरी सीढ़ी बनता है सामीप्य. यह सामीप्य ही है जो आकर्षण को हकीकत बनने में सहायक होता है. सामीप्य जहाँ बढ़ता है वहां इस रिश्ते में प्रेम उर्जा का संचार होता है. फिर शायद पहले के कुछ रिश्ते बेमानी लगते है और नए में लुत्फ़ आता है.  सत्य है सामीप्य में तृष्णा होती है, और तृष्णा ही जोड़ती है तोड़ती है. यही वह कड़ी है जो प्रेम को आधार देती है. 

फिर उत्पन्न होता है विश्वाश और उसको निभाने की चुनौती. एक  दूजे  के प्रति प्रेम को दर्शाना भी दो मनो में इसे प्रगाढ़ करता है. संतुलन भावनाओ का जरुरी है. गलतफहमी का एक तिनका प्रेम को औंधे मुंह गिरा देता है. गलतफहमियो को पनपने न दिया जाए, कभी आभास हुआ तो तुरंत उसे हटाना जरुरी है. तब छोटी छोटी बाते इसमें खास बन जाती है या छोटी छोटी बाते बिगाड़ भी देती है. वक्त और जिम्मेदारियां अवश्य प्रेम में बदलाव लाती है भावनात्मक रूप में नही पर उसका बखान नही होता यानी इजहार बार बार नही किया जाता. प्राथमिकताये कहीं प्यार को पीछे छोड़ने लगती है तब छोटी छोटी बाते जो एहसास को जिन्दा रखे, एक दूजे को सहज और बंधन में बांधे रखती है. ऐसी स्थिति में एक दूसरे को स्थान देना जरुरी है – भावनाओ से, विचारो से भी. और व्यस्तता के बाद भी दो पल  सुकून से प्रेम के लिए निकाले जा सकते है. एक दूसरे के एहसास से जुड़कर. वरना विश्वास भी डगमगाने लगता है. अगर प्रथामिकताये परिवार, कार्य और जिम्मेदारी के आलावा है और प्रेम खोने लगा है तब प्रेम पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक है.


यहाँ मन सर्वाधिक महत्व रखता है और समर्पण उसकी वो सीढ़ी है जहाँ इस रिश्ते में एक ठहराव आता है. फिर दो मन एक बने रहते है अगर भटकने की फितरत नही. वरना फिर एक नया आकर्षण .... और पिछले रिश्ते की जिन्दा मौत.... 

बुधवार, 26 अगस्त 2015

तेरा मेरा सार




शब्द लिख रहे है तुम्हे, तुम दूर कहीं बैठी मुस्करा रही हो 
हम नही इन आँखों में, फिर भी दिल में जगह बना रही हो

हमने तो साँसों को अपनाया है , केवल तुम्हारे लिए 
ढूंढती है नज़र तुम्हे हर पल, आओ कुछ पलो के लिए

शायद जानती हो , इन धडकनों में बहती गति हो तुम 
इश्क लिखा मन में, मेरे मन की सच्ची पहचान हो तुम

मन तो मन की सुन्दरता देखे, कब सूरत से किया प्यार है 
पल पल 'प्रतिबिंब' सी उभर आती हो, यही तेरा मेरा सार है

रविवार, 23 अगस्त 2015

क्यों ?





जमाना हो गया हमें उस एहसास से गुजरे हुए
उनका दिल, आँखे बात मुझसे करते क्यों नही ?

जानता हूँ रास नही आती अब उन्हें चाहत मेरी
आखिर क्यों यकीन नही अब चाहत पर मेरी ?

मेरी गैर मौजदूगी अब बैचेन उन्हें करती नही
मेरे लिए कलम उनकी कुछ कहती क्यों नही?  

जानता हूँ दूरियां उसने अब मुझसे बना ली है
साथ का वायदा जहाँ, वहां आज दूरी क्यों है ?

मुस्कराहट उनकी अब कुछ अलग सी बात करती है

ये मोहब्बत ‘प्रतिबिंब’ अब अतीत सी लगती क्यों है ? 

बुधवार, 12 अगस्त 2015

ये रिश्ता



रिश्ते रिसते रहे
एहसास घिसते रहे
जज़्बात पिसते रहे
ख्वाब फिर भी पलते रहे

चाह मुंह देखती रही
दूरी सवाल पूछती रही
अवेलहना जबाब देती रही
रुक, आस फिर भी कहती रही

बीते पल साथ देते रहे
मन को यूं ही बहलाते रहे
सच को झूठ से सहलाते रहे
मुस्कराहट से गम को छुपाते रहे

जुड़ी है डोर कोई अभी भी
इसलिए साँस चलती अभी भी
मैं समझा नहीं ‘प्रतिबिंब’ कभी भी

क्यों दिल सुनता नही, दिमाग की अभी भी 

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

मेरी जिज्ञासा तुम हो ....





बचपन का मेरा कुतूहल भी जिज्ञासा था
कुछ जानने की उत्सुकता भी जिज्ञासा था
जहाँ हर अविष्कारों की जननी जिज्ञासा है
वहां आध्यात्मिक रहस्य खोज भी जिज्ञासा है

प्रथम मन में जिज्ञासा का भाव प्रकट होना है
जानने की प्रबल प्रेरणा जिज्ञासा स्तर बढाती है  
दृढ़ संकल्प व् योग्यता जिज्ञासा को सजाती है
जिज्ञासा शक्ति जीवन को गतिशील बनाती है

जिज्ञासा विधि - परक व् निषेध - परक होती है
विधिपरक जिज्ञासा में लोकहित का समावेश है
निषेधपरक जिज्ञासा में अहित भाव प्रबल होता है
सच्ची जिज्ञासा अटल व् अदम्य से भरी होती है  

एक शिकारी अगर शिकार ढूंढें उसे मार्गणा कहते है  
व्यक्ति और वस्तु की खोज अन्वेषणा कहलाती है
जिज्ञासा मानसिक सम्बल बन चुनौती स्वीकारती है
जिज्ञासा कर्मठ साधक का भान करवा सफल होती है

मेरे कुतूहल व् उत्सुकता में उदृत  जिज्ञासा तुम हो
मेरी खोज व् अन्वेषणा में समर्पित जिज्ञासा तुम हो
मेरे विचार व् विमर्श में ‘प्रतिबिंबित’ जिज्ञासा तुम हो

मेरे हृदय व् मेरी गवेषणा में शामिल जिज्ञासा तुम हो. 

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

~अब...~





इस कोरे पुराने सड़े गले कागज पर कौन लिखना चाहेगा
नए की चाह लिए जब मन, पुराना कौन अपनाना चाहेगा
खोखले हो गए जो एहसास, कोई दूजा न उन्हें भर पायेगा
प्रेम का धागा जब टूट गया, कोई दूजा न उसे जोड़ पायेगा

मन से दूर कर ही दिया जब, कौन फिर हमसे मिलना चाहेगा
नदी के दो किनारे सा जीवन, मिलन की चाह कैसे रख पायेगा
मौसम से बदल रहे भावो में, कौन रंग मोहब्बत का भर पायेगा
बचा नही दर्द सीने में जब, शेर गजल गीत कौन लिख पायेगा

भूली बिसरी बाते याद कर, कौन खुशियाँ से दूर रहना चाहेगा
नीरस हो गए ज़ज्बात जब, कौन उनमे फिर रस भरना चाहेगा
तोड़ मोड़ कर 'प्रतिबिंब',ये कागज का टुकड़ा कल फेका जायेगा
इस पर लिखे मेरे भाव शब्दों को, कौन भला यहाँ पढ़ पायेगा

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
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