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गुरुवार, 14 जनवरी 2016

साहित्य की चुनौतियां - सन्निधि संगोष्ठी

[२१ नवम्वर २०१५ की सन्निधि संगोष्ठी  में साहित्य की चुनौतियाँ विषय पर मेरे विचार -किरण आर्य ने मेरे विचारो को संगोष्ठी में पढ़ा - किरण का हार्दिक धन्यवाद करते हुए आज इसे पोस्ट कर रहा हूँ ]

सभी अतिथिगण एवं चर्चा में शामिल सभी साथियों को मेरा सप्रेम नमस्कार. वैसे तो किरण जी के माध्यम से सनिन्धी के कार्यो / संगोष्ठी से परिचित हूँ और साहित्य सेवा के लिए इससे जुड़े लोगो का अभिनन्दन करता हूँ. विदेश में रहने के कारण व्यक्तिगत रूप से इसका हिस्सा न बन सका. आज दूर बैठकर भी आप मित्रो के समक्ष अपनी बात कहने का, चर्चा में शामिल होने का अवसर मिला है, खुशी का अनुभव कर रहा हूँ.


साहित्य की चुनौतियाँ...
सर्वसहमति और असहमति के बीच जैसा कि संगोष्ठी का विषय ही चुनौती है तो उसे स्वीकार भी करना होगा, स्वीकार रहे है तो उन चुनौतियों को रेखांकित भी करना होगा. आज जीवन में सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा मनोविज्ञानिक रूप से बदलाव हमारे सामने है. रचनाकार भी इस बदलाव से अछूता कहाँ है. और यही से हमारी चुनौती शुरू होती है. पाठक या जनता की चित्वृति में हो रहे बदलाव को समझना जरुरी होगा. साहित्य और साहित्य्लोचना को साथ साथ चलाना होगा. अकेले तो इसे पूरा नही कर सकते इसलिए सभी साहित्यकारों को साथ या ऐसी सोच रखने वालो को साथ देना ही होगा. यहाँ उपस्थित साहित्यकार, मित्र, अतिथि अपने अपने अनुभवों से समकालीन चुनौतियों को आपके समक्ष रखेंगे ही इसलिए मैं केवल कुछ बातो को आपके सामने रखना चाहता हूँ.
*राष्ट्रवाद की चुनौतियाँ  
आजकल वैसे भी साहित्य जगत चुनाव से पहले चर्चा में था. सम्मान [ यदि वो क़ाबलियत पर था ] लौटाकर साहित्यकार चर्चा में बने रहे. मैं समझता हूँ वहां उन्हें कलम को ही सहारा बनाना चाहिए था वरना ये तो सीधे सीधे राजनैतिक अजेंडा ही नज़र आ रहा है. साहित्यकार भी इसी दुनिया, इसी समाज से रिश्ता रखते है और राजनीती ने ने भी उन पर अपनी पकड़ बनाई है. लेकिन उस सोच को लेखन के द्वारा हासिल करते तो साहित्य जगत को शर्मिंदा न होना पड़ता. राष्ट्रवाद से समझौता नहीं होना चाहिए. आप कितने बड़े आलोचक ही क्यों न हो परन्तु देश को शर्मिंदा या बदनाम करने वाले कृत्यों से दूर रहना चाहिए. नीति या सोच या विचार की आलोचना आजादी है लेकिन इस आज़ादी में देशभक्ति और देशद्रोह में फर्क करना जरुरी है. संवेदनशील होना आवश्यक है यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है लेकिन इसमें वास्तविकता का होना जरुरी है न कि छ्द्मजाल.
*प्रकाशक, पाठक और रचनाकार   
मैं रचनाकार और पाठक के बीच की कड़ी 'प्रकाशक' को भी सबसे बड़ी चुनौती मानता हूँ. साहित्य यथार्थ की अभिव्यक्ति है, वैचारिक अभिव्यक्ति है, शैली की अभिव्यक्ति है, विद्रोह, संघर्ष, प्रेम, पीड़ा की अभिव्यक्ति है. पहले प्रकाशक रचनाकारों के पीछे भागता था लेकिन आज रचनाकार प्रकाशक के पीछे भाग रहा है. और प्रकाशक व्यवसायिक दृष्टि से ही केवल मोलभाव कर रहा है. उसे लेना देना नही कि वह क्या पाठक को प्रस्तुत कर रहा है. क्या वह वास्तव में साहित्य की सेवा कर रहा है.   सोसियल वेबसाईट पर आज बहुत से युवा लेखन की और अग्रसर है. इसमें संदेह नही की कुछ तो अव्व्वल दर्जे की सामग्री [ भाषा, भाव, व्याकरण ] प्रस्तुत कर रहे है..लेकिन अधिकतर खुद को खुद ही कवी साहित्यकार की उपाधि देकर प्रस्तुत कर रहे है न भाषा का ज्ञान, वर्तनी में अशुधिया, न भावो का संचार लेकिन पुस्तके छपवा कर खुद को साहित्यकार समझ बैठा है. इस सोच  इस विचार में अनुभवी साहित्यकारों को मार्गदर्शन करना जरुरी है
*साहित्यकारों की याद
आज हम पुराने साहित्यकारों को भूलते जा रहे है.. नए रचनाकार उन्हें पढ़ते नही है, उनकी शैली को पढ़ते, समझते नही है.  वे क्यों स्तम्भ कहे जाते है उनकी दिशा क्या थी उनकी सोच विचार क्या थे. हमें उनकी याद दिलाना याद रखना जरुरी है. नहीं तो साहित्य बचेगा कैसे फिर कैसी चुनौती. फिर जो है वो है सामने है.
*रचनाशीलता की चुनौतियाँ:
सृजन में छात्र बने रहना आवश्यक है गंभीर लेखन जिसमे समकालीन विमर्श [ चिंता / दुःख  ] समाहित है, समाज को कौन प्रभावित कर रहे है? बाजारवाद कहीं रचनाशीलता को प्रभावित नहीं कर रहा है ? क्या हम उपभोक्तावादी बन गए है. क्या हमारे मूल्य हमारे संस्कार धरे के धरे रह गए है? इस सोच में स्व्यम के व्यक्तित्व को भी देखना होगा. हमें चाहिए कि पहले हम रचनात्मक टिप्पणी करना सीखे तो स्वयं ही
रचनात्मक लेखन की ओर झुकाव भी बढेगा और फिर लोगो को उद्वेलित कर सकने की क्षमता पैदा हो...
ध्यान कीजिये व्यंग्य में शरद जोशी जी का .. उनकी बातचीत में भी आपको वही अंदाज मिलेगा व्यंग्य का क्योंकि वे रोज ही व्यंग्य का सृजन करते थे. कमलेश्वर जी हो, निर्मल वर्मा जी हो प्रेमचंद हो  उन्होंने अपनी कहानियो में वे तत्व प्रयोग किये है जिनसे वे आज  पहचाने जाते है. आप कविता लिख रहे है तो समकालीन सरोकार को किस तरह शामिल किया है देखना होगा... चुनौती है कि हम किस तरह व्यंग्य में, कहानी में, कविता में आज को शामिल कर पा रहे है .   हमारी अभिव्यक्ति में पाठक कहाँ खड़ा है क्या हम पाठक के दिल दिमाग से खुद को जोड़ पाए है. विचारधारा, प्रतिबद्धता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बनाए रखना भी महत्वपूर्ण चुनौती है. 
*पक्षपात की चुनौतियाँ:
लेखन में अधिकतर पक्षपात होता आया है, आज साहित्यकार अपने से अच्छा लिखने वाले की चर्चा करना नही चाहते नाम लेना तो छोडो. अगर गलती से नाम ले भी लिया तो खुद को ऊपर रख ही बात करते है. और इसने ही साहित्य जगत को गुमराह भी किया है और चोट भी पहुंचाई है. समीक्षा हो या आलोचना दोनों के लिए 'विषय ज्ञान' का होना  जरुरी है जो साहित्य को नई ऊंचाइयो पर ले जा सकता है. अच्छे कार्य की सराहना और सम्मान देना सीखना होगा. लेकिन इसका स्तर कैसा हो यह अनुभवी साहित्यकार तय करे नहीं तो आज गली गली में सम्मान मिल रहे है अगर आपका पी आर अच्छा है तो आप हर जगह आमंत्रित हैं सम्मान देने की होड़ में है चाहे उस व्यक्ति विशेष  के साहित्य का स्तर मध्यम या निम्न दर्जे का ही क्यों न हो. लिंग पक्षपात भी अपनी जड़े फैला चुका है.
अंत में ....
यहाँ उपस्थित विशिष्ट अतिथि श्री मैनेजर पांडे के शब्दों को कहीं पढ़ा था कि "विचारधारा के बिना आलोचना और साहित्य दिशाहीन होता है"
अपनी बात मैं समाप्त करना चाहूँगा और यहाँ उपस्थित मित्रो सदस्यों से यही कहूँगा कि आइये हम अपनी दिशा निर्धारित करे और साहित्य के समक्ष जो चुनौतियाँ उन्हें स्वीकार कर साहित्य को भी नई दिशा दे. जिससे साहित्य की प्रासंगिकता प्रश्नों के घेरे में न रहे. साहित्य को साहित्य बनाये रखना होगा. शुभम

धन्यवाद !!  
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
21 नवंबर 2015 

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

बिकने का मौसम आ गया ......



मौसम-मौसम किताबो का मौसम अब आ ही गया
लगा है मेला, हर कोई अब किताबी कीड़ा हो गया
लेखक सब झूमे, बिकने का मौसम आ गया
कुछ का हुआ ऐसा प्रचार, किताबे बिकेगी हाथो हाथ
कुछ बाट जोहते रह जायेंगे, शायद मलते रहेंगे हाथ
लेखक सब झूमे, बिकने का मौसम आ गया
प्रकाशक भी शिकार करते रहे, दिखाते रहे अपना प्यार
नए लेखक खुश होकर, लुटाते रहे उन पर अपना प्यार
लेखक सब झूमे, बिकने का मौसम आ गया
स्वयं घोषित कवि या कहानीकार, गोता लगाने को तैयार
लुटा पैसो को अपने, छपी किताब अब विमोचन को तैयार
लेखक सब झूमे, बिकने का मौसम आ गया
शान है मित्रो को बताना, हमने किताबी मेला देख लिया
कुछ ने फोटो खिंचवाकर, मुफ्त किताबी उपहार पा लिया
लेखक सब झूमे, बिकने का मौसम आ गया
कुछ पढ़कर मित्रो की वाह-वाही कर, समीक्षक बन जायेंगे
मुफ्त पुस्तक की विनती कर, अच्छा-अच्छा लिख जायेंगे
लेखक सब झूमे, बिकने का मौसम आ गया
नहीं जानता इस भीड़ में कितने अच्छे लेखक मिल पायेंगे
उनका लेखन व् कृतियां क्या साहित्य का मान बढ़ा पायेंगे
लेखक सब झूमे, बिकने का मौसम आ गया
लेकिन दिल खुश थोड़ा ‘प्रतिबिम्ब’, प्रेमी के नाते कहता हूँ
मेरी हिन्दी फिर जीने लगी है, फले-फूले बस यही चाहता हूँ  
लेखक सब झूमे, बिकने का मौसम आ गया
           

                         प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  १२/०१/२०१६ 

सोमवार, 11 जनवरी 2016

उसने कहा .....



कल तुम्हारे लिए था
उस कल से पहले
ये पल किसी और का था 
हाँ मेरा कल तुम्हारे लिए था
उस कल में जो
तुम्हारा था तुम्हे दिया
शायद न चाहते हुए भी
हाँ तुम, मुझसे
अब भी आस लगाये बैठे हो
आज और
आने वाले कल के लिए
लेकिन सुनो !
तुम्हारे लिए
मेरे पास अब कुछ नही
मेरा रास्ता अब अलग है
मेरी प्राथमिकता में तुम
अब शामिल नही
बहुत लोग बहुत काम
हाँ कुछ ख़ास भी है
जिनसे अब जुड़े रहना है
कुछ को अपना बनाना है
तुमने साथ दिया
एक सच्चे प्रेमी की तरह
और चाह भी आस भी
अभी भी
एक सच्ची मोहब्बत की तरह
और मैं शायद
एक बेवफा की तरह
साथ छोड़ रही हूँ
तुम कल का इंतजार करो
शायद कल लौट आऊं
उम्मीद तो
तुम्हे रखनी होगी मुझसे
चाहे लौटू या न लौटू
..............................तुम्हारी किस्मत
(किस्मत से गुफ्तगू)

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

नियति ....




मन के धरातल में
उपजा कोई ख्याल
एक चिंगारी बन
धधकने लगता है 
हौसले बुलंद करता है
जीवन को गति और
लक्ष्य को करीब लाता है
दृढ़ता उसका पैमाना बन
हर अवरोध से लड़ती है
संकल्प सीना ताने
हर वार सहता जाता है
शक्ति महाशक्ति प्रतीत होती है
और कदमो में जीत होती है 

कभी मन के अन्दर ही
वो ख्याल मुरझाने लगता है
अगर जीवंत भी रहा तो भी
नियति के क्रूर हाथ
हर प्रहार में वेदना देते है
पहाड़ सा हौसला भी
उसे मैदान में ला पटक देता है
उठकर लड़ने का साहस
जन्म लेता है बार बार
लेकिन अंत में
वीर गति को प्राप्त होता है 

अच्छाई और बुराई
सच और झूठ
धर्म और अधर्म
पाप और पुण्य
के बीच कोई भेद नही है
मानो या न मानो
यह भेद केवल सोच का है
जिसका संचालन
नियति अपने ढंग से करती है
इंसान तो एक मोहरा है
जिसे बस चला जाता है
शतरंज की बिसात पर
हार जीत के फैसले होने तक
जिंदगी और हमारे बीच
एक खेल चलता रहता है
नियति के आख़री पड़ाव तक....

-          प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
०७/०१/२०१

बुधवार, 6 जनवरी 2016

बदल गया साल – कुछ एक सवाल



हाँ ! देखो बदल गया फिर से वो साल
खट्टा मीठा था जो गुजर गया वो साल
सीख लिया जाते वक्त से करके सवाल
उत्तर मिला हमें तो है जीना हर हाल

जिस बदलाव की आस लिए बीता साल
उस बदलाव की उम्मीद जगी इस साल
चले जिस राह, उस राह से पूछे सवाल
उत्तर मिला चलते रहो चलना हर हाल

कभी दोस्त कभी दुश्मन बन बीता साल
अपनों की हकीकत नज़र आई उस साल
अपने आप से, अपनों का जब पूछा सवाल
उत्तर मिला अपनो से तुम बचना हर हाल

थे एहसास जिंदा जो, बिछड़ते रहे उस साल
उम्मीद टूटी कभी जुडी, कई बार उस साल
बीते वर्ष उलझन मन में, उठे बहुत सवाल
उत्तर में, बदल ली राह हमने भी इस साल


-    प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

रविवार, 3 जनवरी 2016

यूएई कौथिग २०१५ – दुबई [ एक रिपोर्ट ]


र वर्ष की तरह इस बार भी यूएई कौथिग  [ उत्तराखंडी गीत संगीत से सजी शाम ] में प्रवासी उत्तराखंडियो ने देव भूमि से आए अपने लोकगायको के द्वारा गाये गीतों का आनंद लिया और जमकर नृत्य भी किया. उत्तराखंड की खुशबू हर उपस्थित सदस्यों ने महसूस की और अंत तक लुत्फ़ लेते रहे. समय सीमा न होती तो कोई वहां से जाता भी नही. २३ जनवरी २०१५ को ग्रांड एक्सिसियर  होटल, बुर दुबई में इस कौथिग का आयोजन हुआ. 
स बार यूएई कौथिग कई मायनों में ख़ास रहा. कई वर्षो बाद उत्तराखंड की स्वर कोकिला सुश्री मीना राणा कुमोला जी का कौथिग में आना हुआ. ‘घुघूती’ गाने से पहचान बनाने वाले श्री किशन महिपाल जी, 'रामनगर बाजार' गीत से पहचान बनाने वाले लोकगायक श्री गोपाल मठपाल जी और उभरती प्रतिभा पंकज सती ने इस बार कौथिग में अपने अंदाज में अपने लोकप्रिय गीत गाये और सभी श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध किया तथा सभी को थिरकने को मजबूर किया. कुर्सिया खाली नज़र आने लगी क्योंकि सभी डांस फ्लोर में या जहाँ मौका मिला नाचने में व्यस्त थे. इस गीत संगीत की यात्रा में संगीतकार संजय कुमोला जी के साथ दिया प्रसिद्ध ढोलक वादक सुभाष पाण्डे जी ने और बांसुरीवादक  द्वारिका नौटियाल जी ने. इनके संगीत की धुनें और गायकों की सुरीली आवाज़ श्रोताओं को ले गई सीधे डांडी कांठी के मुल्क में. यूएई में बसे कई युवा प्रतिभा के धनी गायकों ने भी मंच में प्रस्तुति दी. अनिल गैरोला और उनकी टीम में शामिल गरिमा सुंदरियाल, शिव सेम्लटी, प्रकाश पांडे, शिव सिंह कैंथुरा, महिपाल रावत, पूरण राठौर एवं विनी जैथुडी ने सभी का मन मोह लिया.

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हाँ इस बार खास रहा LED पृष्ठभूमि, ग्राफिक्स एवं उच्च किस्म का साउंड सिस्टम जिनका प्रयोग पहली बार किया गया कौथिग के आयोजन में. गायक पंकज सती ने अपनी प्रथम अंतर्राष्ट्रीय प्रस्तुति दी. और सबसे ख़ास रहा गायक किशन महिपाल जी ने ‘घुघूती २’ [आने वाली म्यूजिक एल्बम ‘फ्यूलड़िया’] के ट्रैक के लोकार्पण के लिए दुबई में कौथिग के मंच को चुना. उत्तराखंड एशोसियेशन के सरंक्षक सदस्य श्री मनु रावत जी ने ट्रेक को शुरू किया और किशन महिपाल जी ने मंच से इसे गाया. उनकी इस नई एल्बम के लिए शुभकामनाएं.

कार्यक्रम की शुरआत दीपक ध्यानी जी ने उत्तराखंड से आए मेहमानों और कौथिग के स्पोंसर्स के परिचय एवं स्वागत से की, पुष्प गुच्छ देकर सभी का स्वागत किया गया. हर साल की तरह इस बार भी कौथिग में यूनियन इन्सुरेंस, गोल्डन ड्रेगन टूरिज्म [ श्री प्रयाग जोशी जी ], राज आर्यन फिल्मस एवं बाज़ार सिटी डॉट कॉम [ श्री अश्वनी नेगी जी ] और बेल्होल स्पेशलिटी हॉस्पिटल मुख्य स्पोंसर रहे. सहायक स्पोंसर में श्री चाँद मौला बक्श जी, रिवोली आईजोन, फ्रेंजी फ्लावर्स, अम्बिका ज्वेलर्स, सुहा अल शम्स ट्रांसपोर्ट एवं आल्मेड एफजेडको ने अपना  सहयोग दिया. उत्तराखंड एशोसियेशन आफ यूएई सभी का आभार प्रकट करती है और आशा ही नही अपितु विश्वास है कि उनका सहयोग तथा स्नेह यूं ही बना रहेगा. एशोसियेशन के सबसे वरिष्ठ सदस्य श्री चमोली जी, श्री मनु रावत जी ने दीप प्रज्वलित कर और पंडित सुशील थपलियाल जी ने मंत्रोचारण के साथ कार्यक्रम शुरू करने का संकेत दिया.
हमारे सहयोग कर्ता [ स्पोंसर्स ]


सके तत्पश्चात कार्यक्रम की बागडोर सीपी पुरोहित एवं ललिता चौहान के हाथो में रही जिन्होंने बखूबी अपनी प्रतिभा का परिचय देते हुए सुनियोजित तरीके से कौथिग का संचालन किया. यूएई के अनिल गैरोला एवं टीम ने ‘जौ जस देई’ और ‘उत्तराखंड की महिमा’ गा कर कार्यक्रम की शुरआत की. फिर उत्तराखंड से आए सभी लोकगायको ने प्रस्तुति दी.  मीना जी ने ‘हम उत्तराखंडी छां’, ‘लोन्डा चंद्रा’, म्यार पहाड़ा रंगीलो आदि अपने प्रसिद्ध गीत गाकर सबको देवभूमि के करीब महसूस कराया साथ ही संजय कुमोला जी के साथ ‘ह्योंद का दिन बौडी आइगेनी’ गाया. किशन जी ने ‘घुर घुरयंद घुघूती’ ‘सयाली बम्पाली’ 'ल्सका छोरी जैसे गानों से जहाँ रंग जमाया वहीं म्यूजिक एल्बम फ्यूलड़िया का लोकार्पण किया. गोपाल मठपाल जी ने हाय मेरो रूमाला, लाली हो पधनी लाली, ओ भागी ता छुमा जैसे कई लोकप्रिय गीत गाकर यूएई को उत्तराखंड बना दिया.  पंकज सती ने नए अंदाज [ रिमिक्स] में गीत गाकर अपना परिचय दिया. कई गीतों पर यूएई में पली बढी किशोरियों ने मंच पर काबिल ए तारीफ नृत्य प्रस्तुत किया. इस दौरान कई युगल गीत प्रस्तुत किये लेकिन अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त व् उत्तराखंड की पहचान बने गीत बेडू पाको बारा मासा’ को मीना जी, मठपाल जी एवं महिपाल जी ने गाकर प्रोग्राम समाप्त किया.

त्तराखंड एशोसियेशन आफ यूएई साल भर कई कार्यक्रम करता है जिससे यहाँ बसे उत्तराखंडी एक दूसरे से सम्पर्क में रहे, अपनी संस्कृति और संस्कार को भूले नही उनके नजदीक रह सके. किसी विशेष परिस्थिति में एक दूसरे की मदद यहाँ या उत्तराखंड में कर सके. कौथिग साल का आखरी प्रोग्राम होता है और यही से नए साल के लिए टीम का एलान होता है. इस बार सरंक्षक [ पेटर्न ] के रूप में श्री मनु रावत जी चुने गए और उनके साथ एडवाइज़र श्री जय सिंह बिष्ट जी एवं श्री प्रतिबिंब बड़थ्वाल जी चुने गए है.  इनके द्वारा नई एडमिन टीम चुनी गई है जो अपनी एक्जक्यूटिव की टीम तैयार करेंगे वर्ष २०१६ के लिए. इस वर्ष एडमिन चुने गए है - एडमिन बुरांश  [श्री राकेश कुकरेती जी एवं श्री उत्तम सकलानी जी], एडमिन बाघ [ श्री दीपक नरेंद्र खुल्वे जी एवं श्री रंजीत चौहान जी ], एडमिन कंडाली  [ श्री राजेन्द्र लखेड़ा जी एवं श्री दीपक ध्यानी जी ]. एडमिन खमीरा [ श्री शैलेन्द्र सिंह नेगी जी एवं श्री उमेद सिंग रावत जी ]. संस्था के प्रेजिडेंट के रूप में श्री शैलेन्द्र नेगी जी, वाइस प्रेजिडेंट श्री रंजीत चौहान जी एवं जनरल सैक्रेटरी श्री राजेन्द्र लखेड़ा जी चुने गए है.


नए साल की शुभकामनाओ के साथ
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
टीम यूएई  

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

मेरी तरह का आदमी




मेरी तरह का आदमी 
हर कोने में गरियाता हुआ 
मिल जायेगा, ढूँढना नहीं पड़ता 
कुछ समाज से जुड़ी बातें
खीजता मन 
और पीड़ा का स्वर लिए  
लुभावनी बातें और ज्ञान बांटता 
बस 
छिपा कर बैठा है खुद का मन 

जिन्दगी में कई छेद है
अच्छा लगता है 
इन छेदों से निहारना 
शब्द निकलते हैं 
कलम चलने लगती है 
तब
प्रेम कलम की स्याही थी 
जो शायद अब सूखने लगी
बात बात पर अब
ये पन्ने शिकायत करते हैं
मोहब्बत तलाक मांगती सी 
हर आहट सन्देश की 
धीरे - धीरे मौन हो रही है  

अच्छा है 
जितना जल्दी कोई पहचान ले 
जिसने पहचान लिया 
उसने 
कब का किनारा कर लिया 
तुम अब तक क्यों 
लंगडाते हुए साथ चल रहे 
मेरी खुशफहमी के लिए 
गलतफहमी का शिकार हो गए 
अपनत्व के जाल में फंस  गए
फिर भी मैं ढीठ हूँ....
अपनों को समझने का 
उनसे मोहब्बत का 
बुरा ख्याल मन  में लिए 
चल रहा हूँ, तुम्हारे साए में ही 
अपने 'प्रतिबिम्ब' को छलते हुए 

एक और आकाश 
एक और धरती 
एक और इंसान 
एक और चेतना का भास लिए 
शून्य से शतक की ओर
तपिश और बौछार की जुगलबंदी 
एक नए गीत की ओर ......
चलोगे क्या साथ इसे गुनगुनाने ....

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
०१.०१.२०१६

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

चलते चलते - ३१.१२-२०१५




१.
पल पल की कीमत
पल पल की कीमत है, कुछ पलो की कीमत हम न लगा पाए
रिश्तों की चाह में और बाट जोहते, अपनों को संभाल न पाए
कोई कहता रहा कोई सुनता गया, दूरियों में ही भाव खो गए
हमने जो भी चाहा 'प्रतिबिम्ब', वो लफ्ज़ बन कर ही रह गए
बीता लम्हा कुछ कह गया, शायद हम अब भी संभल जाए
था दौर जो वो गुजर गया, इस दौर में कुछ अलग सा हो जाए
२.
आज तो याद कर लूँ ....
कल तू बिना कुछ कहे चला जाएगा, मुझे तू याद बहुत आएगा
अच्छा बुरा जैसा भी था, बस अब यूं साथ न तू मेरे रह पाएगा
जानता हूँ तेरे बस में भी कुछ नही, मगर कुछ सिखला जाएगा
भूलना मेरी फितरत नही, बस ज़माने के साथ मैं बदल जाऊंगा
कल तक तुझको लिखता पढ़ता था, अब इतिहास बन जाएगा
समर्पण के थे भाव जहाँ, वहाँ पलट कर देखने न कोई आएगा
प्रेम तुझसे ही था अब तक, अब कोई और जीवन में आ जाएगा
जिंदगी की रीत यही 'प्रतिबिंब', बिछड़ा फिर कौन याद आएगा

शनिवार, 28 नवंबर 2015

शंख






पुराणों के अनुसार शंख हमारी संस्कृति में चंद्रमा सूर्य समान देवस्वरूप है
जिसके अग्र भाग में गंगा सरस्वती, मध्य में वरुण और अग्र में ब्रह्मा वास है

आत्मा, प्रकाश, आकाश, वायु, अग्नि, जल. पृथ्वी तत्वों से शंख निर्मित है
शंख सागर के गर्भ से हुआ उत्पित, विष्णु - लक्ष्मी के हाथो में सुशोभित है  

इस धरोहर की उत्पति अधिक होने से जगन्नाथपुरी शंख क्षेत्र कहलाता है
शंख द्वारा जल अभिषेक देवताओ को करता प्रसन्न, कल्याणकारी होता है

शंख प्रतीक निधि और सनातन धर्मं का, देव अर्चना हेतू ये प्रेरित करता है
पाता है जब स्पर्श शंख का, जल भी गंगाजल के सदृश पवित्र हो जाता है

शंख के बहुत से होते आकार, विशेषताओ के कारण भिन्न है इसके प्रकार
धार्मिक कृत्यों में उपयोग,  पूजा स्थल में रख मनोकामनायें होती साकार

पांचजन्य शंख से कृष्ण का नाता, युद्ध में अर्जुन ने देवदत शंख बजाया था
अनंत विजय शंख था युद्धिष्ठर का, भीष्म ने भी पोडरिक शंख बजाया था

वामावर्ती शंख है विष्णु स्वरूप, लक्ष्मी का स्वरूप दक्षिणावर्ती शंख होता है 
वैज्ञानिक व् आयुर्वेद का महत्व लिए, शंख हर जीवन को प्रभावित करता है

सनातन धर्म का ये है प्रतीक, ध्वनी से कहीं आस्था तो कहीं बढ़ता जोश
सकारत्मक उर्जा के लिए होता शंख प्रयोग, नकारत्मक उर्जा का होता नाश

प्रतीक है शंख नाद का, ॐ का, जीवन का, आगाज़ का व् विजय घोष का

आओ करे प्रतिबिंब’ शंखनाद, आध्य्तम, नैतिकता और धार्मिक चेतना का
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