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सोमवार, 1 दिसंबर 2014

आइना - ए - रिश्ता



हर रिश्ते की
एक सीमा होती है
हाँ वक्त के साथ
उसमे बदलाव आते है

ये सीमाए
कभी तो खुली होती है
तो कभी बाँध दी जाती है
ये सीमाए
दिल से तय होती है

और ये दिल
जब अपना समझता है
तब सीमाओ की
पाबंदी नही होती है

जीवन में
जब दखल लगता है
तो सीमाए
तय होने लगती है

फिर रिश्तो का
झूठ भी
सेंध मारने लगता है
सच भी
सामने आने लगता है

वैसे
सच रिश्तो का
रिश्ते
मजबूर नही होते
रिश्ते
मजबूर नही करते

रिश्तो में प्रेम
और प्रेम में सीमा
सीमओं में अहसास
अहसासो में घुटन
'प्रतिबिंब' इसी घुटन में
रिश्ते का होता है अंत

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

कल आज



अहसास संग है
साथ कोई नही है
दिल बाते करता है
सुनता अब कोई नहीं है

भावो की कतार है
शब्द खड़े लाचार है
सच अकेला है
झूठा का विस्तार है

आइना दुश्मनों का है
चेहरा उसका अपनों सा है
कदम मंजिल के प्यासे है
पानी मरीचिका सा है

दिल बीमार है
हर कोई बना हकीम है
भूख अब बिकती है
कलम बनी सौदागर है

नर नारी का नारा है
विचारो का उभरता भेद है
धर्म कर्म का अभाव है
संस्कृति संस्कार पर खेद है

रिश्ते पवित्र है
स्वार्थ से प्रताड़ित है
जोड़ना रणनीति है
तोड़ना अब राजनीति है

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

सोमवार, 24 नवंबर 2014

सुप्रभात



तुम्हे नींद तो
अच्छी आई होगी
सपनो और एहसासों का
मिलन खूब हुआ होगा
भोर की किरणों से
आँख तुम्हारी खुली होगी
अब सपनो की खोज
और एहसासों को जीना होगा
प्रतिबिंबित होगी हर सोच
जब आशा और आंकक्षा का
हकीकत के धरातल पर मिलन होगा
पथ स्पष्ट और मंजिल निकट
तब जीने का मज़ा दुगना होगा
मिलेगा फिर सुखद एहसास
जब सपना सच्चा और अपना होगा

शुभम 

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

दिया बुझता है ...



पलट रहा किताब मोहब्बत की
शाम से ही गीत पुराना सुन रहा हूँ
रात की आहट सुनाई देने लगी है
अँधेरे में दिया यादो का जला रहा हूँ

इस रात में कितना शोर है आज
तिमिर घनघोर धरा पर छाया है
मिलता था साथ जिनका रात भर
उन चाँद तारो ने मुंह मोड़ लिया है

जीत का था जिस पर हमें भरोसा
जिन्दगी का वो दाँव हम हार बैठे है
जिन भावो में मिलती थी प्रेम सौगात
वो तमाम एहसास आज हार बैठे है

हर रात, हर बात होती थी उनसे
आज हर बात उनसे अधूरी रह गई
हवा का झोंका महक बिखेरता था
आज हवा भी दिल दुखा के रह गई

इश्क पर फक्र होता था आज तक
अब इसके हर रंग से डर लगता है
रात ख्यालो में कट जायेगी 'प्रतिबिंब'
सुबह के ख्याल से दिया बुझता है

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

रविवार, 16 नवंबर 2014

मुझे लिखना है



मुझे कुछ लिखना है
क्या लिखूं, क्या न लिखू
तुम्ही बताओ क्या लिखू
सच लिखू , या फिर झूठ लिखूं
तुम्हे लिखू या स्वयं को लिखू
तुम्हे लिखूंगा तो सच लिखूंगा
स्वयं को लिखूंगा तो झूठ लिखूंगा
यही तो सच्चाई है आज की
सच दूसरो का लिखना ही भाता है
अपना झूठ तो सदा लिखता आया हूँ
अरे हाँ बुराई भी तो दूसरो की ही नज़र आती है
हम तो खुद को सच्चाई का पुतला मानते है
अंगुली उठाने में आनंद भी तो आता है
खुद को वाह वाही और दूसरे को शर्मिंदगी मिलती है
और हाँ लिखने के बाद एक जीत का अहसास
एवरेस्ट पर विजय पताका फहराने  जैसा
चेहरे पर मुस्कराहट ला देता है
और फिर से एक बार तुम्हे लिखने को तैयार हूँ
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

मौसम - ए - इश्क



सर्द रातो सी होती है मोहब्बत
रिश्तो में गरमाहट दे जाती है
गर्म हवाओ सी नोक झोंक से
पारा प्रेम का बढ़ता जाता है
धुंध सी अविश्वास की परते
गहरे विश्वास को ढक देती है
सावन और भादो के प्रेम झूले में
ज़ज्बात आसमान छूने लगते है
बरसात में भीगते और संवरते रिश्ते
कभी अहसास पतझड़ से बिखर जाते है
धरती हर मौसम को सहती है 'प्रतिबिंब'
लेकिन इंसान मौसम सा बदलता जाता है

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शनिवार, 1 नवंबर 2014

मिलन और विरह के बीच




मेरे शहर की याद
ले आई तुम्हारे पास
तुमसे मिलना
मिलकर बिछड़ना
और हाँ याद आया
मिलन और विरह के बीच

शोर करती हुई खामोशियाँ
प्रेम के पन्ने बांचती आँखे खेलती खेल
तन मन में उभरते कोमल अहसास
तन मन पर लिपटती अहसासों की बेल

तन मन पर फैलती तुम्हारी खुशबू
आँखों में 'प्रतिबिंबित' होती हुई शरारत
गालो में अंकुरित चाहत के लाल पौधे
प्रकृति के सतरंगी रंग देते हुए साथ

अंगडाई लेती, कसमसाती ख्वाइश
तन मन में विद्दुत प्रवाह दौड़ता सा
स्पन्दन करती लहरों का समावेश
समुद्र की गहराई में छूटता पसीना सा

और फिर
मिलन में सम्पूर्णता की लिए आहट
बयाँ करती
अधरों में उभरती महकती मुस्कराहट

मेरे शहर की याद
मिलन से विरह के बीच
और फिर से
मिलन की चाह  लिए .....


- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

ये वक्त





ये वक्त
तू चल मैं आता हूँ
आखिर तूने
आगे चलना सीख लिया
सोच तो हमारी
तेरे साथ चलने की थी
लेकिन तूने
कदम कदम पर
बेगाना सा व्यवहार किया
मंजिल से पहले ही
बढ़ते कदमो को रोक दिया
मोहब्बत तुझसे की थी
लेकिन तूने दुश्मनी निभाई
अब साथ चलू भी तो कैसे
हर मोड़ पर तूने की बेवफाई

ये वक्त
चल तू अब आगे आगे
देखूगा तूने क्या है बिसात बिछाई
तेरी चालो से पहले
समझ लूँगा मैं तेरे सारे मंसूबे
तू चलते रहना अपनी चाले सभी
मैंने हौसला खोया कहाँ है अभी

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शनिवार, 26 जुलाई 2014

शहीदों की चिताओ पर ....



कठिन परिस्थितियों संग
जवानो ने दुश्मन के हर वार झेले
देश की आन बान शान के लिए
ये जाबांज जान हथेली पर लेकर चले

दुश्मनों को मुंह तोड़ जबाब देने
ये दिलदार सर पर कफ़न बाँध कर चले
कभी अपनी टुकड़ियों के साथ
मौका मिला तो दुश्मन से लड़ते रहे अकेले

घर परिवार को छोड़ कर
भारत माँ के लिए रण बाँकुरे मरने मिटने चले
शौर्य बलिदान की रख मिसाल
कोई डटा मैदान में, कोई घायल कोई शहीद हो चले

धर्म जात पात की सोच नही
हर सिपाही भारत माँ के सच्चे सपूत बन कर चले
ज़ज्बा तिरंगे की खातिर दिखता है
दुश्मन को मार भगा इसमें लिपट दुनिया छोड़ चले

शहीदों की चिताओ पर
क्या लगते रहेंगे यूं ही हर वर्ष मेले
ख़ास दिन क्यों याद करे इन्हें 'प्रतिबिंब'
आओ रोज उनकी कुर्बानी का अहसास करते चले

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