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गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

प्रेम सप्ताह





अंग्रेजो ने शगूफा छोड़ा
भारतीयों ने अपना रंग छोड़ा
बिकने लगा प्रेम दुकानों पर 
अपने भावो ने साथ छोड़ा
हर प्रेम को बाँट कर
पाश्चात्य का रंग जोड़ा

हर कोई अब
प्रेम अपना दिखाने लगा
अपने प्रेमी को
अपना बताने लगा
प्रेम प्रसंग अब
दूसरे बांचने लगे
भावो की अभिव्यक्ति को
अधिकार समझ
गली गली नुमाइश करने लगे
टेडी बियर हो या चाकलेट
धड़ल्ले से बिकने लगे
प्रेम का देते जबाब
ग्रीटिंग कार्ड और गुलाब
सप्ताह भर चलता खेल
फिर चाहे हो न हो मेल

लेकिन
प्रेम पवित्र
है अपने संस्कार
व्यक्तिगत
होता इसमें आदर अपार
खुद के भावो से सजाकर
प्रेम को मिलता पूजा सा आधार
अपने होते इसमें एहसास
हर लम्हे होते ख़ास
पल पल प्रेम अवतरित होता
बन शृंगार चेहरे पर सजता
तन मन को पुलकित करता
जन्म् जन्म का वायदा होता
प्रेम का कण कण में विस्तार होता

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ११/२/२०१६

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

मेरी याद...




कल बीत चूका 
आज मेरा नही है
आने वाला कल 
मेरा होगा शायद

यकीन नही न
आओ बतलाता हूँ
कुछ हकीकत
और रीत दुनियां की
बतलाता हूँ
आज शब्द मेरे
बेसक लडखडाये है
मगर भाव
अंतरमन से उपजे है

कल बीत चूका
अच्छे बुरे के साथ
अपनों के
साथ साथ
गुस्सा प्यार
करते करते बीत गया

आज मेरा नही
मेरा आज बस
बीते कल में उलझा है
साथ न कोई खड़ा है
बस कल के लिए
लड़ रहा हूँ खुद से
और अपनों से भी
खुद ही अपराधी हूँ
यह जानते हुए भी
समय और किस्मत को
दोष दे रहा हूँ
मेरा आज
सच में मेरा नही है
झूठ होगा अगर
इसे अपना कहूँगा

कल मेरा होगा
यकीनन.....
जब मेरे जाने के बाद
सब याद करेंगे
दो आंसू
चंद फूल
चंद शब्द
श्रद्धा सुमन
अर्पित करते हुए
अच्छा मुझे बतलायेंगे
कुछ मिलन को याद करेंगे
सब अपना कहते जायेंगे
अपने ही इस खबर पर
सत्यता की मोहर

और यहाँ भी
पसंद का चटका
आते जाते लोग या
अपने ही लगाते रहेंगे
फिर यकीन मानो
दो दिन की याद
बहुत ज्यादा होगी
फिर किसके पास
वक्त होगा
यू याद करने के लिए
जीवन चलता है
किसी के लिए
न रुका है
न रुकता है

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
१०/२/२०१६

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

मुक्त किया ....




स्वार्थ से भरपूर
एक रिश्ता
रिश्ते में जुड़े
कुछ कहे अनकहे
एहसास
रिश्तो से
मुक्ति पाना
कब सहज हुआ है
जब तक स्वार्थ
सर्वोपरी न हो

कल तक एक सोच
बहुत कुछ एक सा
महसूस होता था
साथ एक दूजे का
भला लगता था
और आज
अपने लिए
केवल अपने लिए
एक सुबह
आत्मबोध हो जाना
अपनत्व और प्रेम
से सजाये सँवारे  
रिश्ते की बलि चढ़ा कर
कुर्बानी और त्याग को
अपने हिस्से में डाल
मुक्ति देने का
मिथ्या परोपकार
मुक्ति पाने का
एकमात्र हथियार
जो खंडित करता है
रिश्तो की बुनियाद को
और होती है फिर
एक रिश्ते की
एकतरफा
दर्दनाक मौत...

अपराध बोध
किसे नही होता
लेकिन रिश्ते में....
जिसे हम खुद ही
सींच कर
इतना बड़ा होने देते है
जिम्मेदारी और
परिपक्वता के सामंजय से
सीमाओ का निर्धारण
भी खुद तय करते
फिर
अपराध कैसा?

क्या ऐसे ही
अन्य रिश्तो को
त्याग कर
हर बार
एक नया
आत्मबोध
अगले रिश्ते की
तलाश तक
पीछे मुड़ कर
न देखने की प्रवृति
शायद
कठोर निर्णय लेने में
सहायक होती होगी
और मुक्ति
आसान लगती होगी ....

एक रिश्ते की
बैमौत मौत
सुनहरे अक्षरों में
लिख दिया जाता है 
'मुक्त किया'
इस मौत का 
संस्कार नही होता
बस रिश्ता
दफन हो जाता है
दर्द किसी को
खुशी किसी को
नसीब हो जाती है ....


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  ८/२/२०१६

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

एक सुबह एक ख्याल



आज सुबह

फिर कुछ कह गई
कौन हो तुम
पूछ कर हंसने लगी

परिहास पसंद है
लेकिन
सुबह की लालिमा से नही 
जो मेरा दिन तय करती है
जिसके आते ही
मेरे सपनो को
पंख लगते है
आशाएँ उड़ान भरती है
जीवन को गति मिलती है
अंधियारे से निकलती
वो रोशनी की किरण ही
जब सवाल पूछने लगे
मुझे देख हंसने लगे



जब भी
अंधियारा घेरता है
बस एक सुबह का ख्याल
जीवन देता है
आज उसी को मुझ पर
हँसता देख
मूक हूँ अचम्भित भी
खुद पर सवालों का
तूफान बरसाने लगा
किस्मत कोसने लगा
किसका बुरा किया
सोचने लगा
हर नाम और काम
बस मस्तिष्क पटल पर
उदृत होने लगे
सही को भी गलत
ठहराने का विफल प्रयास
भी मेरी जिज्ञासा को
शांत न कर पाया 

आखिर चटक धूप ने
फिर दस्तक दी
और मेरे तन मन से
मिलकर बस इतना कहा
चलो मैं तुम्हारे साथ हूँ
वक्त तो मुझे भी नही छोड़ता
कभी यहाँ कभी वहां
चलता जाता हूँ
लेकिन जब तक हूँ
तुम्हारे साथ हूँ 
बस चलते जाना
अंधियारा फिर आएगा
लेकिन मैं भी फिर आऊंगा
बस इतना ख्याल रख
आगे बढ़ते जाना .....

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ६/२/२०१६ 

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

चीख .....







बचपन की याद
अब आती नही
उलझ कर
सर से पैर तक
आज में
जकड़ा हुआ हूँ
अपने ही जाल में
तहजीब और
शराफत की खाल में  
लूटना चाहता हूँ
किस्मत को
और हाँ सच
बदलना चाहता हूँ
किस्मत को
और जिन्दगी के
इस रंगमंच से
जुड़े कई अदाकारों को
जो घावो को
हरा करते है
जख्म को
नासूर बनाते है

बचपन से बावन 
कम उम्र हुई
समझ नही पा रहा
अपने से ज्यादा
दूसरो को तवज्जो देने का
खामियाजा तो
भुगतना ही है
काले से
सफ़ेद होते बाल भी
मुझे चिढ़ाते है
आजकल हँसना
सीख लिया है उन्होंने
मेरे सामने ही मुझे
गलतियों का बादशाह
कह कर
ताज पोशी करते है


बचपन का जिक्र
अब होता नहीं
अनुभव के आगे
रेंगता बचपन
बहुत आगे
निकल आने का एहसास
लौटने की ख्वाइश लिए
दम तोड़ता वो बचपना
उम्र का सामाजिक रोड़ा
दिल से बगावत करता 
और उस पर झूलती
तमाम ख्वाइशे
बिन पैंदे के बर्तन सी
गीली लकड़िया
जलने को आतुर
कहीं आग
और कहीं ख़ाक
बस निकलती है 
एक आह
अन्तर्मन की चीख लिए ......

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  ५/०२/२०१६ 

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

दोषी कौन ....




अपनी हस्ती की 
तख़्ती लटकाये लोग 
जगह जगह 
किसी भीड़ का हिस्सा है 
अपना वर्चस्व बनाये रखने 
संवारने की कोशिश में
नापाक इरादे भी 
नेक आवरण में 
परोसकर 
तमाशा देखते है

पापी भी 
फल की चिंता में
पुण्य की आस में
हमारे बीच मौजूद है 
स्वार्थ सिद्ध करने हेतू 
राम राम जप कर 
खंजर भोकने को तैयार 
और हम 
जानकर भी अंजान
शायद 
आदत हो गई
या फिर बना ली है
क्योंकि हम भी 
उसी भीड़ 
उसी समाज
का आइना तो है
जिसमे ये प्रवृति 
फल फूल रही है

कुछ समझ पाये क्या 
कौन है वो 
पहचान लिया क्या
उस गुनाहगार को
या 
उस मित्र या
रिश्तेदार को 
या खुद ही 
अपने अंदर झांकने लगे
और खुद को भी 
मेरी तरह ही
आपने 
दोषी करार दे दिया है

-    प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २०/१/२०१६

प्रतिबिम्ब .......






जीवन यात्रा की शुरआत
इस जन्म में
प्रारब्ध के निशान
जन्म को प्रभावित करते है
परिवार और संस्कार
तो यहाँ विरासत में मिलते है
शिशु लीला खुद की
और
शिक्षा व्  संस्कार 
की जिम्मेदारी उठाता
परिवार
और इन्सान स्वयं बन जाता
परिवार का प्रतिबिम्ब ....

कहीं संघर्ष कही अमीरी
ख़्वाब की महकती बगिया
लक्ष्य, एहसास बनते बिगड़ते
कोई तपता
जलता अंगारों सा
कोई तैरता
सहज लग जाता किनारे
और
हर स्थिति परिस्थिति में
कठिन सरल के गणित संग
जिंदगी की अर्थव्यवस्था को
ढ़ोता रहता
गधे और घोड़े सा
तुम और मुझ जैसा
हर इन्सान ........
\
समाज का
अंग बनते भी
देर नही लगती
समाज भी
देर नही लगाता
अपनाने में,
सिखाने में,
रिश्तो में बना,
बंटा बिखरा समाज
स्वार्थ से भरपूर,
न चाह कर भी मजबूर
बस कोई राह पा लेता है
कोई चाह रख चलता जाता है
मंजिल की ओर
या फिर
मंजिल की तलाश में 
निरंतर ......

इस पर भी
मन की संतुष्टि
कब थाह लेती है
राजा हो या रंक
एक के बाद एक
स्वपन देखते हुए
किसी उद्देश्य हेतू
कदम ताल करता हुआ
बेसुध इन्सान
भटकता हुआ
मृग तृष्णा की भांति
लालच का जाल
फांसने लगता है
और इंसान का
पल प्रतिपल
बदलता स्वरूप
अपने को ही
भूलने लगता है

इंसान............

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २२/०१/२०१६ 
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