
मन बहुत उतावला होता है। इसमे न जाने कितने सवाल उठते है या जबाब मिलते है। चाहे उनमे मै स्वयं ही घिरा हूं या फ़िर समाज या देश के प्रति मेरी उदासीनता या फ़िर जिम्मेदारी। आप भी मेरी इस कशमकश के साथी बनिये, साथ चलकर या अपनी प्रतिक्रिया,विचार और राय के साथ्। तेरे मन मे आज क्या है लिख दे "चिन्तन मेरे मन का" के पटल पर यार, हर पल तेरी कशिश का फ़साना हो या फ़िर तेरी यादो का सफ़र मेरे यार।
सोमवार, 28 सितंबर 2009
प्रश्न येसे पूछता है क्यो?

मंगलवार, 22 सितंबर 2009
हम रूठना भूल गए :लेखक कमलेश चौहान कॉपी@2005
हर मौसम आया हर मौसम गया हम भूले ना आज तक कोई बात हम भूले ना तेरा पियार दिल ने माना तुम्हे ही दिलदार तेरा हमारे रूठने पे यह कहना भल्ला लगता है तेरा मिजाज़ चुलबला जब हमारा किसी से बात करना सुना करते थे तुमसे ही तुम्हारे दिल का डरना हम पूछते थे कियों करते हो हमारे प्रेम पे शक जवाब था तुम्हारा भरोसा है मुझ पर नहीं करता मेरे दिल नादाँ पे कोई शक लेकिन यु आपका हमारे आजाद पंछी दिल को कैद करना हमारा दिल समझ न सका आपका इस कदर दीवाना होना जब आई तुम्हारी बारी पराये लोगों से यु खुल कर बात करना, सोचते आप भी सीख जायोंगे प्रेम दोस्ती मे अंतर करना हम खुश होते तुम सीख रहे हो गैरो से दोस्ती करना हमारे दिल की कदर करोगे क्या होता है समाजिक होना यह क्या हुआ यह कै़से रुख बदला तुमने अपना गैरो की बातो मे हकीकत पाई तुमने हमारी वफ़ा भूल गए मौसम भी कुछ वक़त लेता है बदलने में सर्दी गर्मी घडी लेती है रुत बदलने में यह किस कदर रास्ता हमारा भूल गए इतनी जल्द कियों रंग बदल गया तुम्हारा नियत ने बदसूरत किया चेहरा तुम्हारा हम बैठे रहे दहलीज़ पर तेरी इंतजार मे बिखरा दिये राहो की बेदादगरी ने जो फूल बिखारे थे मेरे हाथो ने जब रूठ कर माँगा हमने अपना हक बरसा दिये तुमने अंगार भरे लफ्ज़ आंखे रोई पर ना सोयी रात भर तेरी ख़ुशी पे भटका था मेरा सफ़र वोह नज़र बरस जाती थी हमारी याद में अब ज़हर है कैसा तुम्हारी उस नज़र मे वोह तुम ना थे जो आंसू चुराए तन्हाई के मालूम ना था बरस गया है धुआ कब से तेरी बेरुखी से यह अशक निलाम हो गये मेरे अशकों से तेरी यादो के दिये बुझ गये तुझे क्या पता औ बेवफा अंग है बर्फ मेरे ना आयुंगी कभी तेरे दर पे बुलाने तुझे तेरी राहो से अब काफिले दूर हो गये कौन करे दुवा तेरे मिलने की हम रूठना भूल गयेWritt en by: Kamlesh Chauhan copy right 2005this composition is in form of story and poetry.Please nothing should be exploited or manipulated. allrights reserved .
रविवार, 13 सितंबर 2009
हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर
हिन्दी मेरी अपनी है भाषा
सब बोले मेरी ये है आशा
भारत मां के माथे की है ये बिन्दी
हर हिन्दुस्तानी की शान है ये हिन्दी
हिन्दी मनभावन और अति पावन है
बिखरे इसमें कई रंग और खुशबू है
हर साहित्यकार को करे हम नमन
हर रचनाकर का करे हम अभिनंदन
हिन्दी दिवस मना रहे हम सब आज
हिन्दी प्रेम की शुरुआत करे हम आज
आओ हम सब कर ले ये सन्धि
लिखे, पढे और बोले अब हिन्दी
- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
शुक्रवार, 11 सितंबर 2009
मुस्कराहट बांटते चलो..

मुस्कराहट - पुलकित कर देती है मन को. क्या महसूस किया कभी आपने. अगर नही तो कोशिश करिये, कही न कही आपके अंतर्मन को खुश कर देगा. मैने इसे बहुत बार महसूस किया है. मुस्कराहट केवल अपने मन मे ही नही दूसरे के चेहरे पर भी आप पढ सकते है.
कुछ दिन पहले हमारी बिल्डिग मे बाहर सफ़ेदी हो रही थी, काफ़ी लम्बे समय के बाद हमारी तरफ़ का नम्बर आ ही गया. बालकोनी मे खडे हो कर उनको देख रहा था कभी उपर कभी नीचे १५ मंजिला इमारत में सफ़ेदी करना कितना सरल या कठिन होगा उन लोगो के लिये. यही विचार कर रहा था. मै १० वी मंजिल में रहता हूं. तभी मेरी नज़र अपनी बालकोनी मे लगे बल्ब पर गई जिसे मैने कभी जलाया नही था उसे आन किया तो जला नही..बल्ब बदल्ने की सोची लेकिन बहुत उंचाई पर है जिस्के लिये काफ़ी लम्बी सीढी की जरुरत नज़र आई. तभी सफ़ेदी करने वाले नीचे आते दिखे मैने उनसे निवेदन किया क्या वे कुछ मदद कर सक्ते है वे राजी हुये और मैने उन्हे बल्ब दिया और उन्होने मेरा काम कर दिया. मेरी पत्नी ने झट से मुझे कुछ पैसे दिये उनको देने के लिये जो उन्होने सहजता से रख लिये और उनके चेहरे पर एक मुस्कराहट खिल आई. और हम दोनो भी खुश हो गये उनके चेहरे में जो भाव दिखे. मैने उनसे पूछा कुछ खाने पीने के लिये लेकिन उन्होने मना किया ( वे बंगलादेशी थे, और रोज़े रखे हुये थे). इतनी गर्मी मे खडे होकर काम करना, फ़िर पापी पेट के लिये जान जौखिम मे डालना. इंसान की जरुरत कहा से कहा ले जाती है या किस किस तरह के काम के लिये मज़बूर होना पडता है. फ़िर ख्याल भी आया कि उन लोगो का क्या जो इतनी उंची उंची इमारतो मे कार्य करते है...
खैर अगले दिन में फ़िर बाल्कनी मे खडा था उन्ही लोगो को देख रहा था, इस बार वे देखते ही मुस्कराने लगे. मैने उसकी तस्वीर लेनी चाही, फ़िर उनकी मुस्कराहट देखने वाली थी. एक तस्वीर उसने अपने पूरे कार्य के लिबास मे खिच्वाई १०वी मंजिल से लटके हुये, फ़िर उस्ने अपनी टोपी और रुमाल हटा कर( जो उस्ने रंग से बचने व उसकी गंध से बचने के लिये पहना था) तस्वीर खिंचवाई.शायद उसे ये मौका पह्ली बार मिला हो लटकते हुये.. पर मुझे और मेरी पत्नी को जो खुशी उनके चेहेरे मे नज़र आई उसे बयान तो नही कर सकता बस महसूस कर सकता हूं.( आप भी इन तस्वीरो को देखे)

एक मुस्कराहट सच में कितनी खुबसूरत बन जाती है. उन लोगो को ना जानते हुये भी वे उन पलो मे अपने से लगने लगे. कल मै जब अपनी कार पार्किग करके बाहर निक्ला तो दूर वही जनाब खडे थे. जैसे मैने नज़र उधर दौडाई तो वो मुस्करा रहा था मुझे देखकर. अच्छा लगा. शायद कुछ दिनो बाद ( जब कार्य खतम हो जाये उनका) हम ना भी मिले लेकिन यदि कही नज़र आये तो यकीन है वो मुस्कराहट बरकरार रहेगी.
मुस्कराहट बांटते चलो....
- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
शनिवार, 5 सितंबर 2009
बीते दिन
रविवार, 30 अगस्त 2009
चल चलें रे मन मेरे…………
चल चलें रे मन मेरे…………
सोचत मन अब मैं कित जाऊँ।
चल चलें रे मन मेरे…………
कभी भ्रमित मन, कभी घूमत मन,
कभी मधहोश मन, कभी रुठत मन।
चल चलें रे मन मेरे…………
कभी संकुचित मन, कभी उलझित मन,
कभी खेलत मन, कभी बहकत मन ।
चल चलें रे मन मेरे…………
कभी सहमत मन, कभी कुंठित मन,
कभी क्रोधित मन, कभी संचित मन।
चल चलें रे मन मेरे…………
कभी आस्तिक मन, कभी नास्तिक मन,
कभी तडपत मन, कभी पुलकित मन।
चल चलें रे मन मेरे…………
हर पल बदलत, मन मैं अब कित जाऊँ
चल चलें रे मन मेरे…………
- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
शनिवार, 22 अगस्त 2009
दो दिरहाम और....

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009
सुनो वतन के रखवालो

- सुनो वतन के रखवालो -
हे माटी के मतवालो, गीत हिंद के गा लो,
हर धर्म का है मान यहां, प्रेम जहां की भाषा है,
मां यही है,शक्ति यही है, सुनो वतन के रखवालो
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
इस माटी मे हम जन्मे हैं, इस माटी से प्यार करो,
प्यार हमारी शक्ति है, इसी में छुपी देश भक्ति है,
तिरंगे ध्वज की गरिमा को, आंच कभी ना आने देंगे।
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
आजादी कही छिन ना जाये, भारत को हमें बचाना है
वतन पर मरने वालो की, हमे यही तो दीक्षा है,
उठो स्वयं को तैयार करो, माटी का कर्ज चुकाना है,
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
भारत में रहनेवाला , हर एक इंसा हिन्दुस्तानी है,
धर्म कहीं लुटने ना पाये, करनी इसकी निगरानी है,
मां की लाज बचानी है, यही एक हमारा नारा हो।
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
सब युवाओ के कंधो पर, बागडोर है भारत की,
अब घडी है परीक्षा की, इसके लिये हर पल तैयार रहो,
गर्व है तुम पर भारत मां को, उसका पूरा स्म्मान करो।
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
यह देव्य भूमि है, यह पुण्य भूमि है, इस पर कितने अवतार हुये,
हम स्वयं अंश है इस भूमि के, फिर क्यो कोई अपमान सहे,
दे देंगे जीवन अपना भी, लेकिन मां को कुछ ना होने देगे।
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
आज वचन ले हम सब, इसकी रक्षा करने का,
मर जायेंगे, मिट जायेंगे, सेवा मे अपने वतन की,
धर्म यही है कर्म यही है, हम तिरंगे के मतवालो का।
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, आबू धाबी, य़ू ए ई
शनिवार, 8 अगस्त 2009
आ गई अब बरसात की बारी

प्रतीक्षा थी तेरी वर्षा रानी,
बहुत की तूने आनाकानी।
मोरो ने नाच कर दिखाया,
हमें वर्षा का संदेश सुनाया।
चारो ओर छा गई समां निराली,
घटा है छाई काली – काली।
चिडियों ने पंख फडफ़डाये,
बादल है अब गडगडाये।
जब आई बरखा रानी,
चारो ओर फैल गया पानी।
भर गये सब नदी तालाब,
चारो ओर खिले कमल गुलाब।
कोयल ने कू कू कर,
मन को सांतवना दी गाकर।
हरी भरी हुई है डालिया
पक्षी करने लगे उनसे अठखेलिया।
हरियाली की यों आ गई बहार है,
खुश हुये सब नर नार है।
शुक्रवार, 31 जुलाई 2009
दूर जाना ना..
