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सोमवार, 28 सितंबर 2009

प्रश्न येसे पूछता है क्यो?


तू अपने मन के अंतर्मन में
छुपा कर बैठा ना जाने क्या ?

रहता चुप ना जाने किस भय से तू
हर मोड पर दिखता असहाय क्यो?

पीडा सहता ना जाने दर्द कैसा झेले तू
हर वेदना को पनपने देता है क्यो?

दु:ख का साया पल पल सताये
हर हार में खामोश दिखता है क्यो?

गम में बिलखता, रोता चुपचाप है तू
हर संताप में अकेले रहता है क्यो?

शून्य सा हो जाता है हर जबाब में तू
जिनका उतर नही, प्रश्न येसे पूछता है क्यो?

-प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

हम रूठना भूल गए :लेखक कमलेश चौहान कॉपी@2005


हर मौसम आया हर मौसम गया हम भूले ना आज तक कोई बात हम भूले ना तेरा पियार दिल ने माना तुम्हे ही दिलदार तेरा हमारे रूठने पे यह कहना भल्ला लगता है तेरा मिजाज़ चुलबला जब हमारा किसी से बात करना सुना करते थे तुमसे ही तुम्हारे दिल का डरना हम पूछते थे कियों करते हो हमारे प्रेम पे शक जवाब था तुम्हारा भरोसा है मुझ पर नहीं करता मेरे दिल नादाँ पे कोई शक लेकिन यु आपका हमारे आजाद पंछी दिल को कैद करना हमारा दिल समझ न सका आपका इस कदर दीवाना होना जब आई तुम्हारी बारी पराये लोगों से यु खुल कर बात करना, सोचते आप भी सीख जायोंगे प्रेम दोस्ती मे अंतर करना हम खुश होते तुम सीख रहे हो गैरो से दोस्ती करना हमारे दिल की कदर करोगे क्या होता है समाजिक होना यह क्या हुआ यह कै़से रुख बदला तुमने अपना गैरो की बातो मे हकीकत पाई तुमने हमारी वफ़ा भूल गए मौसम भी कुछ वक़त लेता है बदलने में सर्दी गर्मी घडी लेती है रुत बदलने में यह किस कदर रास्ता हमारा भूल गए इतनी जल्द कियों रंग बदल गया तुम्हारा नियत ने बदसूरत किया चेहरा तुम्हारा हम बैठे रहे दहलीज़ पर तेरी इंतजार मे बिखरा दिये राहो की बेदादगरी ने जो फूल बिखारे थे मेरे हाथो ने जब रूठ कर माँगा हमने अपना हक बरसा दिये तुमने अंगार भरे लफ्ज़ आंखे रोई पर ना सोयी रात भर तेरी ख़ुशी पे भटका था मेरा सफ़र वोह नज़र बरस जाती थी हमारी याद में अब ज़हर है कैसा तुम्हारी उस नज़र मे वोह तुम ना थे जो आंसू चुराए तन्हाई के मालूम ना था बरस गया है धुआ कब से तेरी बेरुखी से यह अशक निलाम हो गये मेरे अशकों से तेरी यादो के दिये बुझ गये तुझे क्या पता औ बेवफा अंग है बर्फ मेरे ना आयुंगी कभी तेरे दर पे बुलाने तुझे तेरी राहो से अब काफिले दूर हो गये कौन करे दुवा तेरे मिलने की हम रूठना भूल गयेWritt en by: Kamlesh Chauhan copy right 2005this composition is in form of story and poetry.Please nothing should be exploited or manipulated. allrights reserved .

रविवार, 13 सितंबर 2009

हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर


हिन्दी मेरी अपनी है भाषा

सब बोले मेरी ये है आशा


भारत मां के माथे की है ये बिन्दी

हर हिन्दुस्तानी की शान है ये हिन्दी


हिन्दी मनभावन और अति पावन है

बिखरे इसमें कई रंग और खुशबू है


हर साहित्यकार को करे हम नमन

हर रचनाकर का करे हम अभिनंदन


हिन्दी दिवस मना रहे हम सब आज

हिन्दी प्रेम की शुरुआत करे हम आज


आओ हम सब कर ले ये सन्धि

लिखे, पढे और बोले अब हिन्दी

- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

मुस्कराहट बांटते चलो..




मुस्कराहट - पुलकित कर देती है मन को. क्या महसूस किया कभी आपने. अगर नही तो कोशिश करिये, कही न कही आपके अंतर्मन को खुश कर देगा. मैने इसे बहुत बार महसूस किया है. मुस्कराहट केवल अपने मन मे ही नही दूसरे के चेहरे पर भी आप पढ सकते है.


कुछ दिन पहले हमारी बिल्डिग मे बाहर सफ़ेदी हो रही थी, काफ़ी लम्बे समय के बाद हमारी तरफ़ का नम्बर आ ही गया. बालकोनी मे खडे हो कर उनको देख रहा था कभी उपर कभी नीचे १५ मंजिला इमारत में सफ़ेदी करना कितना सरल या कठिन होगा उन लोगो के लिये. यही विचार कर रहा था. मै १० वी मंजिल में रहता हूं. तभी मेरी नज़र अपनी बालकोनी मे लगे बल्ब पर गई जिसे मैने कभी जलाया नही था उसे आन किया तो जला नही..बल्ब बदल्ने की सोची लेकिन बहुत उंचाई पर है जिस्के लिये काफ़ी लम्बी सीढी की जरुरत नज़र आई. तभी सफ़ेदी करने वाले नीचे आते दिखे मैने उनसे निवेदन किया क्या वे कुछ मदद कर सक्ते है वे राजी हुये और मैने उन्हे बल्ब दिया और उन्होने मेरा काम कर दिया. मेरी पत्नी ने झट से मुझे कुछ पैसे दिये उनको देने के लिये जो उन्होने सहजता से रख लिये और उनके चेहरे पर एक मुस्कराहट खिल आई. और हम दोनो भी खुश हो गये उनके चेहरे में जो भाव दिखे. मैने उनसे पूछा कुछ खाने पीने के लिये लेकिन उन्होने मना किया ( वे बंगलादेशी थे, और रोज़े रखे हुये थे). इतनी गर्मी मे खडे होकर काम करना, फ़िर पापी पेट के लिये जान जौखिम मे डालना. इंसान की जरुरत कहा से कहा ले जाती है या किस किस तरह के काम के लिये मज़बूर होना पडता है. फ़िर ख्याल भी आया कि उन लोगो का क्या जो इतनी उंची उंची इमारतो मे कार्य करते है...

खैर अगले दिन में फ़िर बाल्कनी मे खडा था उन्ही लोगो को देख रहा था, इस बार वे देखते ही मुस्कराने लगे. मैने उसकी तस्वीर लेनी चाही, फ़िर उनकी मुस्कराहट देखने वाली थी. एक तस्वीर उसने अपने पूरे कार्य के लिबास मे खिच्वाई १०वी मंजिल से लटके हुये, फ़िर उस्ने अपनी टोपी और रुमाल हटा कर( जो उस्ने रंग से बचने व उसकी गंध से बचने के लिये पहना था) तस्वीर खिंचवाई.शायद उसे ये मौका पह्ली बार मिला हो लटकते हुये.. पर मुझे और मेरी पत्नी को जो खुशी उनके चेहेरे मे नज़र आई उसे बयान तो नही कर सकता बस महसूस कर सकता हूं.( आप भी इन तस्वीरो को देखे)


एक मुस्कराहट सच में कितनी खुबसूरत बन जाती है. उन लोगो को ना जानते हुये भी वे उन पलो मे अपने से लगने लगे. कल मै जब अपनी कार पार्किग करके बाहर निक्ला तो दूर वही जनाब खडे थे. जैसे मैने नज़र उधर दौडाई तो वो मुस्करा रहा था मुझे देखकर. अच्छा लगा. शायद कुछ दिनो बाद ( जब कार्य खतम हो जाये उनका) हम ना भी मिले लेकिन यदि कही नज़र आये तो यकीन है वो मुस्कराहट बरकरार रहेगी.

मुस्कराहट बांटते चलो....

- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

शनिवार, 5 सितंबर 2009

बीते दिन


- बीते दिन -

कभी भूल कर हमें याद कर लेना
बीते दिनो की याद ताज़ा कर लेना

आज साथ तुमने मेरा छोडा
पूरा होता ख्वाब तुमने तोडा

दिल की बाते रह गई दिल में
प्यार की बाते मिल गई धूल में

याद करो अब उन बीते दिनो को
जिन्से बिछुडना पडा आज हमको

मेरे दिल ने चाहा था तुम्हे
अब तो याद करेगे बीते लम्हे

कभी भूल कर हमे याद कर लेना
बीते दिनो की याद ताज़ा कर लेना

- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
( 15-05-1984 )

रविवार, 30 अगस्त 2009

चल चलें रे मन मेरे…………

चल चलें रे मन मेरे…………

उठत गिरत मै पग बढ़ाऊँ,

सोचत मन अब मैं कित जाऊँ।

चल चलें रे मन मेरे…………

कभी भ्रमित मन, कभी घूमत मन,

कभी मधहोश मन, कभी रुठत मन।

चल चलें रे मन मेरे…………

कभी संकुचित मन, कभी उलझित मन,

कभी खेलत मन, कभी बहकत मन ।

चल चलें रे मन मेरे…………

कभी सहमत मन, कभी कुंठित मन,

कभी क्रोधित मन, कभी संचित मन।

चल चलें रे मन मेरे…………

कभी आस्तिक मन, कभी नास्तिक मन,

कभी तडपत मन, कभी पुलकित मन।

चल चलें रे मन मेरे…………

मन की बतिया, मन में ही समाये

हर पल बदलत, मन मैं अब कित जाऊँ

चल चलें रे मन मेरे…………

- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

शनिवार, 22 अगस्त 2009

दो दिरहाम और....

( चित्र केवल दिखाने के लिये)



20 साल की एक घटना मुझे याद आ गई, उस वक्त भी रमजान का महिना था. हम लोगो का दुसरा साल था अबु धाबी मे. हमारे एक मित्र दिल्ली जा रहे थे अपने परिवार के साथ. मै और मेरा एक मित्र उनको छोडने अबु धाबी के हवाई अड्डे पर गये. उनको विदा करके हम लोग बहार् आये और समस्या थी वापिस घर आने की. बस का पता किया तो मालूम हुआ कि एक घंटा लगेगा. फिर सोचा कि चलो टैक्सी की जाये. ज्यादातर टैक्सी ड्राईवर पठान थे. उस वक्त जवानी भी थी और पैसे बचाने का जोश भी था. सभी टैक्सी वालो ने 20 दिराहम मांगे जो हम लोग देने के मूड मे नही थे.
एक पाकिस्तानी परिवार छोटे बच्चो के साथ इसी वक्त बहार आया था अये उन्हे भी जल्दी थी घर जाने की. वे हम दोनो दोस्तो को देख रहे थे पूछते हुये.(वहा़ से शेयरिंग टैक्सी भी मिलती थी 5 दिरहाम प्रति वयक्ति) फिर कुछ हिम्मत करके जनाब मेरे पास आये और कहने लगे कि आप को भी अबु धाबी जाना है तो आप हमारे साथ चले और हम 6दिरहाम देगे यानि 12 दिरहाम और आप 4 दिरहाम यानि 8 दिरहाम दे देना. हम लोग बिना झिझक के तैयार हो गये. उन्होने टैक्सी वाले को बुलाया और उसे बताया कि इस तरह से हम लोग पैसे देगे. ड्राईवर भी जवान सा था. हम लोग उसके साथ गये आगे तक ( येसे कानूनी तौर पर अनुमति नही है).
रास्ते भर कुछ बाते हुई और हम उन पाकिस्तानी परिवार को उनके घर पर छोड कर अप्ने घर की तरफ निकले ( हमे नही पता कि उन जनाब ने कितने पैसे दिये उसे..तय हुआ था 12 दिरहाम ). खैर जब हम अपने घर के पास पहुंचे तो मैने 10 दिरहाम का नौट उसे दिया लेकिन उसने 2 दिरहाम वापिस नही दिये.. हम टैक्सी मे ही बैठे रहे उसे बताया कि कैसे उसने हमे 2 दिरहाम देने है लेकिन वो अडा रहा. थोडा गर्मा गर्मी के बाद निर्णय हुआ कि उसी पाकिस्तानी जनाब के घर जाया जाये जिस्के साथ ये बाते तय हुई थी( ये बता दू कि उसका घर 5 किलोमीटर दूर था).
फिर हम उस्के( टैक्सी ड्राईवर) साथ आगे निकले कि अचानक उसने कहा कि पुलिस स्टेशन जायेगे. हम लोग घबरा गये क्योकि यहां पर आकर पहली बार ये नाम सुना था. खैर मेरे दोस्त और मैने कुछ हिम्मत करके हामी भर दी. उस समय अबु धाबी इतना विकास नही था और हमे पता भी नही था कि पुलिस स्टेशन कहा है...कुछ देर बाद हमारी टैक्सी एक अंधेरे सुनसान क्षेत्र से गुजरी तो हम डर गये लेकिन टैक्सी वाला मुस्कराता रहा शायद उसने डर भांप लिया था हमारे चेहरे मे... फिर हम कुछ जोश मे आये और उससे पूछा कि कहा ले जा रहे हो? उसने मुस्कराते हुये कहा बैठो बस आ गया पुलिस स्टेशन. फिर कुछ लाईट नज़र हमे आई तो जान मे जान आई क्योकि उससे पह्ले हमने कई किस्से सुने हुये थे कि कैसे ये लोग लूट लेते है.
हम लोग पुलिस स्टेशन पहुचे वहा गेट पर तैनात लोगो से सलाम दुआ हुई. टैक्सी वाला उनसे कुछ घुल मिल कर बात कर रहा था ( हमे तो परेशानी ये थी कि अरेबिक हमे आती नही थी) खैर पहले उन्को बताया कि क्य हुआ. वे भी अचरज मे थे कि 2 दिरहाम के लिये हम लोग यहा आये है. वे कहने लगे की आपको पैसे दैने होंगे लेकिन हम अडे रहे. क्योकि दो दिरहाम कि बात नही थी हम चाहते थे जो तय हुआ है उस पर अमल होना चाहिये. खैर उन लोगो ने कहा कि अभी आफिसर आ येगा उससे बात करो.
रात के 11 बजे ड्यूटी आफिसर आया उससे बात हुई उन्हे अंग्रेजी आती थी. हमारी बात सुनकर वो भी हंसे. लेकिन उन्होने कहा कि नही हमे देने होन्गे 5 दिरहाम के हिसाब से उसे क्योकि आमतौर पर यही किराया वसूलते है . अचानक मेरे मुह से निकल गया कि ये रमजान के महिने मे वर्त रखता है तो झूठ क्यो बोल रहा है. अगर हम तय करते 20 प्रति वयक्ति तो वो भी हम देते. इस पर उस आफिसर ने हमसे कहा कि मै समझ रहा हूं और ये गरीब आदमी है तो मै आपसे कहता हूं कि इसे भूल जाओ. हमको तसल्ली हो गई कि हमारी बात रखी गई और उन्होने इसे स्वीकारा. फिर हमने उनसे कहा कि हमने आपकी बात रखी है अब ये बताये कि हम घर इतनी दूर कैसे जाये तो उन्होने कहा कि ये ही छोडेगा ( उन्होने उस का टैक्सी न्0 लिखा) उस्को हिदायत दी कि बिना कुच्छ कहे हमे हमारे घर तक छोडे.
टैक्सी वाला थोडा गुस्से मे हो गया और यकीन मानिये 6-7 किलोमीटर उसने गाडी केवल पह्ले/दूसरे गियर मे चलाई. लेकिन उसे ये अहसास नही हुआ कि 2 दिरहाम के च्क्कर मे उसने कितना पैट्रोल व्यर्थ किया समय के साथ. खैर हम लोग 12.30 (रात मे) घर पहुंचे. जब हम उतरे तो कुछ बडब्डाता हुआ वो निकल गया.
कहने का मतलब ये था कि 2 दिरहाम के लिये हमने पुलिस स्टेशन का चक्कर लगा. लेकिन ये सब इस्लिये कि किसी बात को अगर हम कह देते है तो उस पर अमल करना चाहिये. कई दोस्तो ने इस पर खिल्ली भी उडाई हमारी और कुछ ने सराहा भी. लेकिन हम खुश थे कि हम लडना जान्ते है हक के लिये और जुबान से पीछे नही हटना चाहिये. आज भी इस घटना को याद करता हूं तो मै भी मुस्कराये बिना नही रहता...
- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल.

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

सुनो वतन के रखवालो


- सुनो वतन के रखवालो -

हे माटी के मतवालो, गीत हिंद के गा लो,

हर धर्म का है मान यहां, प्रेम जहां की भाषा है,

मां यही है,शक्ति यही है, सुनो वतन के रखवालो

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

इस माटी मे हम जन्मे हैं, इस माटी से प्यार करो,

प्यार हमारी शक्ति है, इसी में छुपी देश भक्ति है,

तिरंगे ध्वज की गरिमा को, आंच कभी ना आने देंगे।

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

आजादी कही छिन ना जाये, भारत को हमें बचाना है

वतन पर मरने वालो की, हमे यही तो दीक्षा है,

उठो स्वयं को तैयार करो, माटी का कर्ज चुकाना है,

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

भारत में रहनेवाला , हर एक इंसा हिन्दुस्तानी है,

धर्म कहीं लुटने ना पाये, करनी इसकी निगरानी है,

मां की लाज बचानी है, यही एक हमारा नारा हो।

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

सब युवाओ के कंधो पर, बागडोर है भारत की,

अब घडी है परीक्षा की, इसके लिये हर पल तैयार रहो,

गर्व है तुम पर भारत मां को, उसका पूरा स्म्मान करो।

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

यह देव्य भूमि है, यह पुण्य भूमि है, इस पर कितने अवतार हुये,

हम स्वयं अंश है इस भूमि के, फिर क्यो कोई अपमान सहे,

दे देंगे जीवन अपना भी, लेकिन मां को कुछ ना होने देगे।

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

आज वचन ले हम सब, इसकी रक्षा करने का,

मर जायेंगे, मिट जायेंगे, सेवा मे अपने वतन की,

धर्म यही है कर्म यही है, हम तिरंगे के मतवालो का।

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, आबू धाबी, य़ू ए ई

शनिवार, 8 अगस्त 2009

आ गई अब बरसात की बारी


सन १९७९ में जब पहली बार बारिश देख कर कुछ लिखने का मन हुआ तो शब्द कुछ इस तरह उभर कर आए थे। आज भी मेरी डायरी के पन्ने पर पहली कविता यही है।



प्रतीक्षा थी तेरी वर्षा रानी,
बहुत की तूने आनाकानी।

मोरो ने नाच कर दिखाया,
हमें वर्षा का संदेश सुनाया।

चारो ओर छा गई समां निराली,
घटा है छाई काली – काली।

चिडियों ने पंख फडफ़डाये,
बादल है अब गडगडाये।

जब आई बरखा रानी,
चारो ओर फैल गया पानी।

भर गये सब नदी तालाब,
चारो ओर खिले कमल गुलाब।

कोयल ने कू कू कर,
मन को सांतवना दी गाकर।

हरी भरी हुई है डालिया
पक्षी करने लगे उनसे अठखेलिया।

हरियाली की यों आ गई बहार है,
खुश हुये सब नर नार है।

- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल


शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

दूर जाना ना..




प्यार करना तो डरना ना
डरना तो प्यार करना ना

खुबसूरत बन कर तो आना ना
आना तो दिल लिये बिना जाना ना

वादे तो झूठे करना ना तो
करना तो बिना निभाये जाना ना

मेरे दिल से खेल खेलना ना
खेलो तो रुठ कर जाना ना

दिल के करीब तो आना ना
आना तो दूर जाना ना

दूर तुम मुझसे होना ना
होना तो प्यार भुलाना ना


-प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
( 1984 मे लिखी कविता आप लोगो के लिये)

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