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शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

नील गगन मे यूँ बादल


कभी सफेद
कभी काले
कभी छट जाते है 
कभी उमड आते है
नील गगन मे यूँ बादल 

बचपन से देखता आया हूँ
तुझे येसा ही पाया है
ना बदला तू
ना बदली तेरी फितरत 
नील गगन मे यूँ बादल 

बदली छाये
मन मोरा भाये
देख तुझे
मन मयूर सा हो जाये
नील गगन मे यूँ बादल  

चांदनी रात में भी
होती तुमसे कभी बात्
भरी दोपहर मे भी
तु निभाये हमारा साथ 
नील गगन मे यूँ बादल  

कभी तलाशने मे तुझे
कोसो निकल जाता हूँ
कभी ऊँचाई से देखू
तो पास तुझे पाता हूँ
नील गगन मे यूँ बादल 

तुझे बहुत बार 
मैने है कोसा
बरसता क्यो नही 
हर बार तू बरसात जैसा
नील गगन मे यूँ बादल 

कभी तुझ में झांका नही
खुश है या दुखी जाना नही
अहसास होता है कभी तेरे बरसने से
दर्द समेटे है तू भी कुछ कम नही
नील गगन मे यूँ बादल 

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शुक्रवार, 18 जून 2010

तेरी आंखो की नमी






तेरी आंखो की नमी

तेरी आंखो की नमी भिगो देती है मन मेरा
तेरी आंख का हर आंसू बन जाता है दर्द मेरा
टूट जाता हूँ जब सिकन में देखूँ चेहरा तेरा
शाम बैचेन और रात भी खो देती है चैन मेरा
तेरे हर गम से वाकिफ है मन मेरा
तेरा हर गम बन जाता है गम मेरा
तेरे नसीब के पन्ने मे भी है हर्फ मेरा
तेरा नसीब बन गया है अब नसीब मेरा *
तुझसे लफ्ज़ो का नही दोस्ती का रिश्ता है मेरा
खुशी का ही नही तेरे  गम से भी है रिश्ता मेरा
चेहरे मे मेरे दिखे तेरा चेहरा ये अंदाज़ है मेरा
मेरे साथ चल के तो देख मै हूँ हमनवा तेरा
ढूढ्ता हूँ हर सूरत मे चेहरा तेरा
तुझमे ही  सिमटा है जंहान मेरा
तेरे होंठो की मुस्कराहट है सकून मेरा
तेरे बिन कटता नही कोई सफर मेरा
शबनमी शाम मे जुगनु ने दिखाया चेहरा तेरा
कौन जाने आसूं जो निकला वो तेरा था मेरा
तेरी आंखो की नमी भिगो देती है मन मेरा
तेरी आंख का हर आंसू बन जाता है दर्द मेरा*

___________________________________
इस रचना में कुछ मित्रो (शेरो-शायरी के सद्स्य) के भावो को जोडा गया है।   
सभी का शुक्रिया!!

*    प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल
.  राज पंजाबी
.   हरविन्दर सिंह
राज गोईत
विकास कुमार अग्रवाल
.  कृ्ष्णा अग्रवाल                               
.   प्रीती भाटिया
७. अंजलि माथुर

सोमवार, 14 जून 2010

फेसबुक महिमा व आरती !

आज पी बी यानि "प्रवचन बाबा" की ओर से आप सभी फेसबुक भक्तो को एक संदेश्!

आज फेसबुक एक चाहत बन गया है, लगता है सभी इसकी पूजा करते है। प्रस्तुत है आप सभी के लिये इसका विधि-विधान,साम्ग्री एवम आरती!

पूजन सामग्री: कम्पयूटर और मोबाईल फोन, अंग्रेजी का थोडा ज्ञान (किसी भी भाषा मे या लिपी में लिखने के लिये), ईमेल आई डी(कोई भी)।

विधि-विधान:
सर्वप्रथम ईमेल आई डी द्वार फेसबुक मे अपना अकाऊंट खोलिये, अपने प्रोफाईल मे अपना चित्र लगाईये व जानकारी भरिये। अपने सभी एड्रेस बुक से साथियो को निवेदन भेजिये। फिर जो मित्र बने उनके मित्रो से अच्छे मित्रो(उनकी प्रोफ्फईल देखकर) को मित्र बनाये।

इस के लिये नहा धोकर बैठने की जरुरत नही। रात-दिन-सुबह या काम के वक्त या चलते फिरते(मोबाईल के द्वारा) कभी भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। सही मानो मे 24X7. सबसे पहले मुखपृ्ष्ठ पर जाये मित्र क्या कर रहे है जंहा लगे वंहा टिप्पणी या पंसद करिये। फिर अपने प्रोफाईल पेज़ पर जाये। देखे किसी ने आप्को किसी नोटस मे या चित्र मे या वीडियो में टैग तो नही किया। अगर किया तो वंहा टिप्पणी देना न भूले।

इसके तत्पश्चात आपके मन मे जो है उसे अपने स्थिति संदेश लिखे। कोई आपका चित्र या कोई वीडियो या नोट्स या चर्चा जिसे आप चाहते है मित्रो तक पहुँचाना चाहते है लिखे। यदि आपकोलगता है कुछ मित्रो को बात पहुँचानी है तो उन्हे टैग करे। फिर अपने बनाये ग्रुप या पेज़  या जिसमे आप शामिल है उस पर जाये और लोगो को पढे या अपनी प्रतिक्रिया दे। अगर कुछ नही तो नया विषय चुने और लिखे जिससे मित्र आपके साथ संबध बनाये रखे इसके द्वारा।

इसका प्रयोग करने से आप और मित्रो के बीच मे समन्व्य बना रहेगा। केवल मै जो लिखू वो लोग पढे, जबाब दे और् जो दूसरे लिखे उस ओर उदासीनता इसमे उचित  नही।
मित्रो से समान व्यव्हार इसमे लाभ देता है अधिकतर उन मित्रो से जो अधिकतर साथ नज़र आते है। मित्रो के लिये तीखे शब्दो से बचे जिससे आप किसी को खोने के डर से बचा जा सके(अगर वास्त्व मे इससे किसी के सम्मान को ठेस ना पहुंची है वंहा ठीक है)। अपनी सोच दुसरे पर थोपने की बजाय उसमे मित्रो के सहयोग या प्रतिक्रिया से जायज़ा लेना चाहिये। एक दुसरे की गलतियो को भी प्रेम से बताकर या मेल द्वारा समझाकर उस पर एक राय बनाना उचित है ना कि महफिल में बखेडा कर के। इससे मित्रता में टकराव नही आता। यह ध्यान रहे कि ये सामाजिक नेट वर्किंग साईट है मित्र है शायद आपका व्यव्हार आपको सदा के लिये एक अच्छा मित्र बना दे जिसे आप कल तक जानते भी नही थे। जो मित्र जुड जाते है लेकिन ज्यादा सम्पर्क मे नही है कभी कभी उनके पन्ने पर जाना चाहिये। हो सके तो आप ई मेल नोटिफिकेशन को बना ले जिससे मित्रो की खबर आपको मिलती रहे। फेसबुक के द्वारा बनाई गये अनुप्रयोगो का ही इस्तेमाल करे तो फायदा रहेगा कि अनाव्यशक दिक्कतो से बचा जा सकेगा।

फेसबुक में आपका सफर सुखद रहेगा इसी शुभकामना के साथ आओ भक्त लोग इस आरती मे शामिल हो जाये!

आरती
ऊँ जय  फेसबुक महिमा तेरी"

साईट जब ये देखी, समझ मै ना आये मेरी
ज्वाईन किया जब -2, तब समझी महिमा तेरी
क्या गाऊ मै महिमा तेरी -2
ऊँ जय फेसबुक साईट तेरी ,क्या गाऊ मै महिमा तेरी।

जितनी रिक्वेस्ट आई, सबको बनाया अपना। 
मित्रो को पहचाना-2, नये दोस्त बने सब कृपा तेरी
क्या गाऊ मै महिमा तेरी -2
ऊँ जय फेसबुक साईट तेरी ,क्या गाऊ मै महिमा तेरी।

मिलना और मिलाना, सब उठाये फाय्दा तेरा
लिखना और पढाना,-2, सब करते जमी पे तेरी
क्या गाऊ मै महिमा तेरी -2
ऊँ जय फेसबुक साईट तेरी ,क्या गाऊ मै महिमा तेरी।

मन की बात को कहने, पन्ने बनाये इसमे बहुतेरे
मित्रो को जोडा इसमे-2, तब मन की प्यास बुझे मेरी
क्या गाऊ मै महिमा तेरी -2
ऊँ जय फेसबुक साईट तेरी ,क्या गाऊ मै महिमा तेरी।

मुखपृष्ठ पर मित्रो की, खबर फीड से मिलती सारी,
बहुत सारी साईट है नेट पर-2 , तु सब पर है भारी
क्या गाऊ मै महिमा तेरी -2
ऊँ जय फेसबुक साईट तेरी ,क्या गाऊ मै महिमा तेरी।

अनुप्रयोगो का सब सेवन करते, इससे खुश मित्र है रहते
टिप्पणी या प्रतिक्रिया -2, का प्रसाद यंहा मिलता सब्को
क्या गाऊ मै महिमा तेरी -2
ऊँ जय फेसबुक साईट तेरी ,क्या गाऊ मै महिमा तेरी।

जो तेरा उपयोग करे फेसबुक, वो हो जाता बस तेरा
घर परिवार काम चाहे छूटे-2, पर दोस्त बहुतेरे पाता
क्या गाऊ मै महिमा तेरी -2
ऊँ जय फेसबुक साईट तेरी ,क्या गाऊ मै महिमा तेरी।











-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल (पीबी), अबु धाबी

शुक्रवार, 11 जून 2010

देखो क्या है बदला.........

देखो क्या है बदला.........




बदला जमाना बदल गई संस्कृति
हर रिश्ता चढ गया इसकी आहुति
हिन्दी खो गई अब जुंबा पर अंग्रेजी है समाई
करे खिलाफत जो उसकी सम्झो शामत आई
हमने भी पीछे - आगे खूब नज़र दौडाई
देखा क्या बदला, फिर अपनी समझ मे आई

मां पिताजी बन गये अब "मोम - डैड"
मित्रो से अब कहते है "हैल्लो "ड्य़ूड "
भैया मोरे बन गये है अपने "ब्रो"
बात करे तो लगता है जैसे करते"थ्रो"
बहना बन गई अब देखो "सिस"
आम हुये चारो ओर अब "किस"

घर जाकर अपनो से मिलते थे तब
अब मिलते  यार-दोस्तो से जाकर "पब"
जमाना बदल गया बदल गई अब सोच
चाय अपनी भूल गई, अब खुलती "स्कोच"
घर को अपना घर बना न पाये लेकिन
भाये हमको अब तो "रिलेशन - लिव इन"

बदल गई है सच मे कितनी  अब  "लाईफ"
"गे" का जमाना है, ढूढने पडेगे अब "हज़्बेंड -वाईफ"
पचता नही किसी को अब घर का "फूड"
कहते है "फास्ट फूड " है अब "वेरी गुड"
भूल गये है हम  एक दुसरे को देख मुस्कराना
"चैटिंग"और"स्माईली" का देखो आया ज़माना

..........................बदला है ज़माना

- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

बुधवार, 9 जून 2010

टिकट मुस्कराहट का....

टिकट मुस्कराहट का....

मुस्कराहट कंही खरीदनी नही पडती। येसे कई अवसर आते है जब छोटी छोटी बाते भी इसका कारण बन जाती है। एक छोटी सी घटना आज भी हुई जिसे आप लोगो के साथ बांटना चाहता हूँ।

अबु धाबी में आजकल निर्माण इतना चल रहा है कि यातायात हर जगह रुका हुआ प्रतीत होता है। गर्मी तो हाल खराब कर ही रही है। हां तो आज मुझे एक कार्य हेतु अल नूर् अस्पताल मे जाना था जो कि खलीफा स्ट्रीट में स्थित है। जब पहुंचा तो कार पार्किंग ढूढने मे समय लगा, तीन चार चक्कर लगाने पडे। तभी पार्किंग से फोर व्हील ड्राइव  निकलते हुये देखी। मैने दाय़ी तरफ का इशारा लगा कर गाडी खडी की और जैसे ही वो महाश्य निकले मैने अपनी गाडी खडी कर दी उस स्थान मे। मै अभी सोच ही रहा था कि पर्किंग टिकट किस जगह से लेना पडेगा, तभी मेरे शीशे मे खटखट हुई। मैने शीशा खोला कार का तो एक यूएई नागरिक काफी उम्र  वाले सामने खडे थे और उन्होने पार्किंग टिकट मेरी ओर बढा दिया। मै एक दम चौक सा गया। मैने उन्हे पैसे देने चाहे(3 दिरहाम) लेकिन उन्होने हंसते हुये कहा नही मेरा काम 10 मिनट मे हो गया अभी काफी वक्त है। मैने उन्हे धन्यवाद दिया और मै भी मुस्करा दिया उनकी इस दिल नवाज़ी पर। फिर जब मै कार से निकला तो वे ही महाशय थे जिन्होने कार निकाली थी और मैने वंहा लगाई थी। फिर से हम दोनो ने एक दुसरे को  देखा और मुस्करा दिये।

ये नही कि मैने 3 दिरहाम बचा लिये या उन्होने मुझ पर अहसान किया या जताया। वह गाडी निकाल कर सीधे जा सकते थे लेकिन रुक कर इस प्रकार से एक मुस्कारहट का तौहफा दे गये। हालाकि मैने कई बार इस तरह से किया है लेकिन मुझे किसी ने पहली बार इस प्रकार से दिया तो मै भी मुस्कराये बिना नही रह सका। इसके बाद मुझे 3-4 जगह जाना हुआ और सभी कार्य आसानी से निपट गये उस मुस्कराहट के अहसास के साथ। आखिर टिकट मुस्कराहट का जो था....

प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल

मंगलवार, 8 जून 2010

रोशनी की तलाश ...



एक गलियारा
कुछ अंधेरा
अपने मे समाये हुये
मै चला जा रहा था
इस गलियारे के
बीचो बीच 
रोशनी की तलाश मे
आंखे बडी हुई
मन मे एक डर
शरीर पर एक सिरहन
चेहरे मे सिकन
रुकती सी धडकन 

सहसा एक रोशनी
धीमे से गलियारे मे
फैलने लगी
सब कुछ साफ
नज़र् आने लगा
गलियारे का स्वरुप 
अलग सा था
मेरी सोच के विपरीत
जिसे अंधेरे में समेटा था
अब सब कुछ सहज था
ना डर था ना सिकन 
अधेरे और रोशनी का
बस ये अंतर था

इस रोशनी की तलाश 
अब जीवन मे भी है
इतना पता है मुझे
रोशनी मेरे भीतर है
बस  अहसास 
होने का इंतज़ार है
जब मै स्वयं को
इस रोशनी से
प्रकाशमय कर सकूं।

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शुक्रवार, 4 जून 2010

फिर एक अहसास हुआ


आज कुछ गुमसुम सा था
मन मे कुछ उतार चढाव सा था
मन के भीतर कुछ ज्वार भाटा सा था
अहसास कुछ चावल आटा सा था
कुछ चुन सकता था कुछ सब मिला सा था
वक्त भी कुछ हमसे जला भुना था

हर रिश्ते पर कुछ प्रश्न खडे थे
अपने ना जाने क्यो सडे पडे थे
हम भी बस अनजान खडे थे
अपनो से हम भी कुछ अडे खडे थे
दोस्त वे भी दूर खडे थे 
जिनके लिये हम भी कभी लडे थे

जिसने अपना जाना वो मुहं फुलाये खडा था
हाथ जिसका थामा वो भी अकडा खडा था
दीन दुनिया की रस्मो मे जकडा खडा था
हर दुशमन भी सामने अकडा खडा था
हर राह में भावो का यू रोड़ा खडा था
मुसीबत का सामने जैसे जोडा खडा था

इतने मे आई मन्द सी हवा 
छट गया जो फैला था धुआं
जो सोचा न था वो  हुआ
ना जाने कैसे ये सब हुआ
मन मे फिर एक अहसास हुआ
हर बात मे उनका फिर दीदार हुआ

-प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल , अबु धाबी, यू ए ई

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