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रविवार, 17 अक्टूबर 2010

दशहरे पर सभी को बधाई!!


सत्य की झूठ पर जीत का जश्न मनाओ
अच्छाई की बुराई पर जीत का जश्न मनाओ

आओ मित्रों अपने अंदर के राम को जगाये
आओं मित्रों अपने अंदर के रावन को जलाये

राम भी हम रावण भी हम फिर संशय कैसा
छोड़ झूठ और बुराई, करे व्यव्हार इंसानों जैसा

प्रभु का ध्यान कर महिमा उसकी हम पहचाने
मार्ग अंहिसा का अपनाये,धर्म हम अपना पहचाने

विजय निश्चित है अगर हम आज ये प्रण करे
एक दूजे में प्रभु को ढूढे और मानवता से प्रेम करे

[मित्रों आप को, परिवार को, सगे संबधियों को एवं आपके मित्रों को विजय दशमी की शुभकामनाये]
– प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल



बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

हाँ मैं वही गांव हूँ


हाँ मैं वही गांव हूँ
जिसकी वादियो में
तुमने कभी स्वच्छ सांसे ली थी
जिसकी हर पंगड्डियो ने
तुम्हे चलना सिखाया
जिसके हर खेत खलिहान ने
तुम्हे पेट भर खाना दिया
जिसके हर नदी झरनो ने
जीवन सागर मे तैरना सिखाया

हाँ मैं वही गांव हूँ
जिसमे सावन का झूला था
जिसमे तीज़ का त्यौहार था
जिसमे  होली जैसा हर रंग था
जिसमे बंसत का गीत  था

हाँ मैं वही गांव हूँ
जंहा असंख्य पेड छांव देते थे
जंहा तुम खेला करते थे
जंहा कुल देवता थे
जंहा ग्राम देवता थे

हाँ मैं वही गांव हूँ
जिसमें हर खेत मे
सोना उपज़ा करता था
जिसमे बेटी कि बिदाई पर
पूरा गाँव रोता था
जिसमे हर घर का चूल्हा
एक दूजे के प्रेम से जलता था
जिसमें हर रहने वाला
एक सुर में बोलता था

हाँ मैं अब भी वही गाँव हूँ
जिसका हर शख्स
अब बूढा हो चला है या विदा
जिसकी नई पीढी
अब केवल मौन है इसके लिये
जिसका वर्तमान
केवल अतीत बन कर रह गया है
या फिर वक्त के साथ
लुप्त हो रहा है शहर की चका चौंध में

           -         प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

माँ


मैने माँ को देखा है
उसके प्यार को पाया है
उसके तन से लिपट
खुद को मैने सींचा है
उसने अपने लहू को
दूध बना कर मुझे पिलाया है
आंच मुझ पर ना आने पाये
अपना आंचल मुझ पर डाला है
हर मौसम बनकर मां तूने
मुझे जीना सिखाया है
हर वार सहा वक्त का तूने
हर चोट से तूने मुझे उबारा है
आंसू मेरे ना निकले ये सोचकर
तुने आंसुओ को हर पल थामा है
हम को प्यार करते करते
खुद को तूने खूब रुलाया है

वक्त का झौंका कुछ येसा आया
इसी ने मुझे कठोर बनाया है
तेरे त्याग को चुनौती दी है
फिर भी बलिदान तुझी से मांगा है
तेरे प्यार को खुद् भूल गया
फिर भी गुनाहगार तुझे ही बनाया है
तेरे दूध का कर्ज़ चुका न पाया
आज तुझी से तेरा फर्ज़ पूछ रहा है
घर को घर जो बना न पाया
आज तेरा ही आशियाना छीन रहा है

जब जब समझ में मेरी कुछ आया
दे जाती है तू मुझको अब भी छाया
मेरे दुषकर्मो को हर पल तूने माफ किया
गलतिया जानकर भी सीने से लगा लिया
दूर रहूँ या पास प्रेम तेरा है हमेशा साथ
आश्रीवाद का उठता है सदा ही तेरा हाथ
त्याग समर्पण की तू तो मूरत है
भगवान की तू ही सच्ची सूरत है
इसी लिये बस इतना ही कहता हूँ
माँ तेरे आंचल मे ब्रह्मांड समाया है
             प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

कुछ लमहे यादो के


कुछ लमहे यादो के सैलाब में बह जाते है
हर याद में कुछ लमहे बस सिमट जाते है

याद तुम भी आते हो फिर कहीं खो जाते हो
बंद आँखो से देखता हूँ साथ अपने ही पाता हूँ

अहसास तेरा पाते ही आस संवरने लगती है
भाव पिघलने लगते है सांस बिखरने लगती है

फ़िर यादों में भी  दूर हो जाती हो
मृग- तृष्णा सी  नज़र आती हो

-       प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, आबू दाबी, यू ए ई
(एक पुरानी रचना)

बुधवार, 29 सितंबर 2010

जीवन में पानी


जानते है की जल से  
एक तिहाई दुनिया आच्छादित है
जानते है की जल
एक रासायनिक पदार्थ है
पानी की तीन अवस्थाये
कभी द्रव्य,कभी ठोस या कभी गैस है
जल आसमां से भी बरसता है
नदी में सागर में और महासागर में भी है
पानी खारा भी है मीठा भी है
बस जल का चक्र घूमता है
कंही पानी को तरस रहा है
कंही पानी खूब बरस रहा है
शरीर में भी पानी है
जीवन में भी पानी है
कंही दूषित है
कंही गंगाजल है
कोई पी रहा है लवणित जल
कोई तरस रहा है पीने को हर पल
कंही बह रहा शांत हो कर
कंही बह रहा अंशात हो कर
कंही बर्फ बनकर लुभा रहा है
कंही बर्फ बनकर मौत दे रहा है
पानी तेरी भी अजब कहानी है
कंही प्यास तो कंही तबाही है
कंही नीर बन कर बह रहा है
कंही तीर बनकर चुभ रहा है
जल से मिलता जब जल
जीवन को मिलता इससे बल
पानी सब कुछ अपने मे समाये
जिस में चाहे उसमें मिल जाये
कोई तुझ को करता अर्पित
कोई तुझ मे हो जाये समर्पित
जल पानी नीर जैसे तेरे कितने नाम
माने दुनिया और माने चारो धाम
पानी बिन रुक जाती सांस
इसमे बसती है सबकी आस
प्यासे को पानी एक बूंद पिला देना
जीवन अपना हे मानव तू संवार लेना
पानी अब मैं क्या करुं तेरा गुणगान
अब तू दे जीवन या फिर ले ले जान
      -    प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

सोमवार, 27 सितंबर 2010

प्रेम तुम्हारा



प्रेम तुम्हारा………

प्रेम तुम्हारा है अति पावन
दिखाये हर पल मुझको सावन

स्पर्श तुम्हारा है रुई जैसा
कोमल है जो मन की भाषा

प्रेम करती तुम्हारी हर अदा
मधहोश करती तुम्हारी हर सदा

सागर सी गहराई है इसमें
झील सी है शांति इसमें

प्यार का हर रंग छलकता इसमें
प्रेम के हर साज बजते है इसमें

हर मौसम की झलक है इसमें
जिंदगी की हर राह समाई इसमें

प्यार ने दी हर नई सांस मुझको
तुम्हारे प्रेम की तरंग छूती मुझको

प्रेम तुम्हारा है अति पावन
दिखाये हर पल मुझको सावन

-   प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

फूल की कहानी


फूलो की बगिया
खुबसूरत दुनिया
प्रकृति ने बनाया
माली ने सज़ाया
हर रुप हमे भाया
हर भाव इसमें पाया
जीवन जब आया तो
प्रभु को इसे चढाया
मौत का हुआ सामना
बन हार उसे विदा किया

कोई वीर जब शहीद कहलाया
सम्मान दे फूलो को अर्पण किया
फूलो का ही आसरा नज़र आया
जब प्रेमी बन कर अपना प्रेम जताया
विवाह हो या कोई जश्न मनाया
बन माला सबको अपना बनाया
प्रभु पूजा या आरती, तु ही काम आया
दक्षिणा ना पास तो तुझे आगे सरकाया

फूल ने जब सुनी मेरी, दिल उसका भी रो दिया
कुछ आंसू दर्द के, कुछ खुशी से उसने बया किया
मेरा अंत निश्चित है टूट कर जब गिर गया
खुशी है टूट कर भी काम तुम्हारा कर गया
फूलो की इस कहानी को तुमने आज सुनाया
कांटो की कहानी का वक्त अभी नही है आया

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

बुधवार, 15 सितंबर 2010

जिंदगी दो पल की....



जिंदगी दो पल की....
दो पलो "जिंदगी और मौत"
के बीच का सफर लंबा होता है
या फिर छोटा होता है
जो हमें तय करना है

इन दो पलो को......
आकार हम देते है
भावनाये हम भरते है
प्रेम हम जताते है
घृणा हम फैलाते है
दुश्मनी हम करते है


इन दो पलो में....
जीवन हम बनाते - संवारते है
अपने हम बनाते - बिगाडते है
रिश्ते हम बनाते - तोड़ते है
मै और स्वार्थ का रिश्ता जोडते है

आओ इन दो पलो मे.....
जिंदगी अगर आईना है
तो आओ इन दो पलो मे
अपनी सूरत संवार ले

प्यार अगर जिंदगी है
तो आओ इन दो पलो मे
प्यार का रंग भर दे

जिंदगी अगर खेल है
तो आओ इन दो पलो मे
इंसानियत का खेल खेले

जिंदगी अगर एक न्यौता है
तो आओ इन दो पलो मे
हर न्यौता सहर्ष स्वीकार करे

जिंदगी अगर एक ताकत है
तो आओ इन दो पलो मे
अपनी एकता का प्रमाण दे

जिंदगी अगर एक सोच है
तो आओ इन दो पलो मे
अपनी सोच को नया आयाम दे

जिंदगी अगर एक  पूजा है
तो आओ इन दो पलो में
श्रद्धापूर्वक अर्चना करे

जिंदगी अगर  एक  विश्वास है
तो आओ इन दो पलो मे
आत्मविश्वास को जागृत करे

जिंदगी अगर एक कार्य है
तो आओ इन दो पलो में
ईमानदारी से कार्यो को अंजाम दे

जिंदगी अगर एक यज्ञ है
तो आओ इन दो पलो में
घृणा और स्वार्थ की आहुति दे

मुस्कराना अगर जिंदगी है
तो आओ इन दो पलो में
जिंदगी भर ले दोस्तो

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल , आबु धाबी, यूएई
               १५.०९.२०१० बुधवार  



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