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गुरुवार, 20 जनवरी 2011

हौसला है तो ..




जीत ना मिले चाहे, हौसला बरकरार रहे
प्यार ना मिले चाहे, ज़ज़्बा बरकरार रहे

राह चाहे आसान ना हो, कदम बढते रहे
अंधेरा बेसक राह छिपाये, चिराग जलते रहे

नसीब चाहे साथ ना दे, लकीरे  बनती रहे
गुम हुई अगर सदाये, आवाज़ लगती रहे

जिंदगी चाहे मुंह मोड ले, जंग चलती रहे
खुशिया चाहे ना मिले, महफिल सजती रहे

प्रश्न कठिन है जिंदगी के, उतर देते रहे
फल चाहे ना मिले अभी, कर्म करते रहे

फूल चाहे मुरझा जाये, महक बिखरती रहे
खुदा को ना देखा हमने, तलाश चलती रहे

इस दुनिया में आये है तो जिंदगी जीना है
जीने का मज़ा मुस्कराहट और हौसला है
हौसला है तो राहे है, राहे है तो मंजिल है
तेरे हौसले में 'प्रतिबिम्ब' की दुआ शामिल है।

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

ज़िंदगी के कैनवास पर...




जिंदगी को लिखने का मौक़ा मिला
कई पन्नो और कलम का साथ इसमें मिला
कभी पन्ने खाली रहे
कभी कुछ लिखा गया
कभी दूसरो का कहा लिख गया
कभी बहुत कुछ इसमें लिखा गया
कभी तोड मोड कर फेकं दिया
कभी उन्ही पन्नो को फिर से उठाया

कभी इसमें आंसू जुड़े
कभी इसमे प्रेम जुड़ा
कभी इसमे खुद को जोडा
कभी इसमे अपनो को जोडा
कभी समाज कभी देश इनमे उभरा
कभी बन आईना अंतर्मन इसमे उतारा

  कभी ये पन्ने
  आसमान सा कैनवास बन जाते है
  जिसमे सब कुछ समेटने का मन करता है
  कभी ये पन्ने
  सागर की लहर बन जाते है
  जिसमें हिलोरे खाकर दूसरी लहर में मिल जाता हूँ
  कभी ये पन्ने
  फूल की पंखुड़ी बन जाते है
  जिसमें खुशबू बन अपनो के संग चल पडता हूँ
  कभी ये पन्ने
  प्लास्टिक सा बन जाते है
  जिसमें लिखने की हर कोशिस नाकाम होती है
  कभी इन पन्नो पर
  पानी फिर जाता है
  जिसमें स्याही फैल जाने से, सोच नया रुप लेती है
  कभी इन पन्नो पर
  कलम आढी तिरछी रेखाये अंकित करती है
  जिसमें रेखायें अलग दिखती है,सब बिखरा सा लगता है

  जीवन की कलम में स्याही अभी भी बाकी है
  निरंतर चलती रहेगी तब तक उम्मीद बाकी है
  कविता और सोच की जुगल्बन्दी अभी बाकी है
  ज़िंदगी और मेरी दास्तां की गुफ़्त्गू अभी बाकी है
  कलम और पन्ने की कहानी अभी भी बाकी है
  आपके साथ और स्नेह की रिवायत अभी बाकी है

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

रविवार, 2 जनवरी 2011

तेरा साथ


देखता रहा तुझे आते हुये
तेरे साथ ही मैं जिया।
कभी तूने प्यार दिया,
कभी तूने रास्ता दिखाया,
कभी खुशी और कभी गम,
तूने मुझे इस राह में दिया।

तेरे साथ,
कभी चला,
कभी लडखडाया,
कभी दौडा।

तेरे साथ
ठहरने का मन हुआ,
लेकिन रुक नही पाया,
क्योकि निरंतर चलना,
तेरी फितरत है।

तेरे इशारो पर,
नाचता रहा अब तक,
कभी सिर झुकाया
कभी सीना चौड़ा किया।

सोचा भी,
तुझसे आगे निकल जाऊँ,
लेकिन एक पल भी
तेरे बिन
आगे ना चल पाया।

सोचा,
तेरे साथ बिताये पलो में,
फिर से शामिल हो जाऊँ।
लेकिन वो तो बीत गया,
यादो को समेटने के सिवाय,
मैं कुछ न कर पाया।

लेकिन ये कैसा सच है,
जिसमे पीछे और आगे
जाने की मनाही है।
बस तेरे साथ चलना
हकीकत भी है
और मज़बूरी भी है।

समय !!!!
मेरा वादा है तुझसे,
तेरे साथ चलने का।
जब तक चल सकूंगा,
अपना कर्तव्य निभाऊंगा।
मातृभूमि और कर्मभूमि,
से अपना रिश्ता निभाऊँगा।
तेरे साथ ही चलकर मैं,
अपनो से फर्ज़ निभाऊँगा।
समय आज ही तू मेरे साथ है,
कल के लिये खाली मेरे हाथ है।

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

आग


जलना या जलाना है इसका स्वभाव
दहनशील पदार्थ है छोडती अपना प्रभाव
बुझती है जब आक्सीजन का हो अभाव
लेकिन रोशनी और क्षति है इसका भाव

घर्षण से पैदा होती है चिंगारी
चिंगारी से जलती/बढती है ये आग 
हवा और ज्वलनशील वस्तु बढाते है आग
पानी और मिट्टी से बुझती है आग 

आग पवित्र है हमारी आस्था बनकर
कही जोत, कंही सतत अग्नि बनकर
कंही रोशन करती है रोशनी बनकर
कंही विज्ञान में है सहायक बनकर

वीरो के सीने में भी जलती है आग
क्रोध में भी शब्द उगलते है आग
दुश्मनी में भी एक हथियार है आग
जीवन में भी एक जरुरत है आग 

कभी आस है आग, तो कभी है विनाश
कभी दाह है आग, तो कभी है प्रकाश 
कभी त्यौहार है आग, तो कभी है द्वेष
कभी गवाह है आग, तो कभी है क्लेश

संस्कृति, जीवन और विज्ञान 
आग का है हर पल योगदान 
प्रयोग करे, दे इसे मान सम्मान
रिश्तो मे जोड ना करे अपमान
              
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

खत्म हुआ खेल “ख”(खुशियों) का



रुठना खासियत है उनकी, खिसियाना अब आदत बन गई
खिझाना वो छोडते नही, मौजदूगी मेरी अब खुरचन बन गई

खामोश हूँ मैं तेरी खातिर, ख्वाहिश थी तेरी, खैरात नही मांगी थी
खस्ता हाल है, खोखला सा जीवन, ख्वार की मुराद नही मांगी थी

खंगालता रहा मैं अपना इश्क, ना जाने क्यो खटकता रहा उन्हें
खटिक सा घूमा मैं उनके शहर और गली, खबर भी ना हुई उन्हें

खंख है जीवन,खपने लगा मैं, खंभार सा रिश्ता, खंडहर सा मैं
ख्यालि नही अब खंडित हूँ मैं,खरमास की तरह खटकता रहा मैं

खलियान सा खिले सोचा था,लेकिन खारा हुआ अब तो रिश्ता
खिदमत का कंहा मिला मौका, एक खरोंच से टूटा अब ये रिश्ता
         
   प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

दोस्ती का आलम


मित्र बनाओ अभियान
बढाओ जान पहचान
बहुत है यंहा कद्रदान
सारे मित्र मेरे महान
महके मेरा खलिहान
जिंदाबाद हिन्दुस्तान

मुझे तुम लगते हो प्यारे
सपने जैसे सच हुये हमारे
हम है अब तुम्हारे सहारे
चलो साथ देखे अब बहारे
दोस्ती है बीच अब हमारे
चलो अब ये रिश्ता संवारे

एक हाथ मे उसका हाथ
दूजे हाथ में है दूजा हाथ
मन में भाये तीसरा हाथ
थामे अब चौथे का हाथ
येसे है मेरे कितने हाथ
छोड चले जो अब साथ

भरते है दोस्ती का दम
नही किसी से हम कम
वक्त पर छोड देते दामन
जैसे पडा हो कोई सामान
येसा है दोस्ती का आलम
सबको "प्रतिबिम्ब"का सलाम

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल , अबु धाबी

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

क्रोध



क्रोध मात्र एक शब्द नही, भरपूर है इसका भी संसार
ज्वाला इसकी विनाशकारी, बस मिलता इसमे अंधकार
क्रोध उपजता है
अंहकार से
उपेक्षा से
जिद्द से
भय से
घृणा से
ईर्ष्या से
स्वार्थ से
अन्याय से
तनाव से
क्रोध से हिंसा उपजे, बढ जाये नफरत और दरार
अपने तो होते है दूर लेकिन दुश्मन के भी झेले वार
क्रोध से..
ज्ञानी का पतन
साधु का अन्त
शान्ति का नाश
सत्य की मौत
तनाव का संचार
विवेक का पतन
स्वास्थ्य मे गिरावट
रिश्तो मे कड़्वाहट
लगती है हाथ निराशा
मिलती है बस निराशा

गीता में कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया है
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
[अर्थात क्रोध से अविवेक एवं मोह होता है, मोह से स्मृति का भ्रम होता है
तथा बुद्धि के नाश हो जाने से आदमी कहीं का नहीं रह जाता]
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

सोमवार, 15 नवंबर 2010

मैं धरती हूँ


मैं धरती हूँ

सब कहते हैं
मैं माँ हूँ
धरती माँ
धरती माँ

मेरा सीना
भी गर्व से
ऊँचा हो जाता है
जब तुम
कहते हो
धरती माँ

तुम्हारे लिये
कहीं सड़क
कहीं गली
कहीं झोपडी
कहीं महल
कहीं नदी
कहीं तालाब
कहीं जंगल
कहीं शहर
कहीं खेत
कहीं खलिहान
कहीं सागर
कहीं बांध
सबको जगह दी है
अपने में

हर पल
कोई खोदता मुझे
कोई तोड़ता मुझे
कोई चूमता मुझे
कोई रौंदता मुझे
कोई पूजता मुझे
कोई सज़ा देता मुझे
लेकिन मेरा प्यार
सब के लिये
एक है एक रहेगा

मेरे सीने पर
सब चलते है
सब दौड़ते है
अच्छा लगता है
लेकिन
अच्छा नहीं लगता जब
गंदगी फैलाते हो
कहीं थूकते हो
कूडा करकट सब
बिखेर देते हो
इससे वातावरण
दूषित होता है
मैं तो सह लेती हूँ
आखिर माँ हूँ
बस इस बात का
ख्याल रखना सदा
दूसरों पर इसका
असर ना हो या
स्वास्थ्य खराब ना हो

मैंने सब
अपने में समाया है
तुमने दुख दिया या खुशी
फिर भी तुम्हें प्यार दिया
तुम्हारी हर खोज़ में
मैने साथ दिया
दैनिक जीवन में
जो चाहा वो दिया
अपने सुख की खातिर
तुमने मुझे तोड़ा मरोड़ा
फिर भी मैंने
तुम्हारा साथ कभी न छोडा
हाँ मैं धरती माँ हूँ



मैंने
हर धर्म को अपनाया है
हर इंसान से प्यार किया
काल गोरा, छोटा बडा
सब को बस अपना कहा
इस कोने से उस कोने तक
बस मैंने सब से नाता जोड़ा है
सब मेरा ही अंश है
कोई यहाँ तो कोई वहाँ
इसी लिये जब माँ कहते हो
मुझे मान, सम्मान और्
प्यार मिल जाता है


प्रकृ्ति का दोष भी
मैंने समेटा है
माँ बनकर बच्चो का
बहता खून
मृत शरीर
सब अपने सीने में
दफन किया
दिल मेरा भी रोता है
आंसू मेरे भी आते है
फिर भी अपनो की खातिर
फिर से धरती माँ बन जाती हूँ
हाँ मैं तुम सबकी माँ हूँ
धरती माँ!!!!!

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