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गुरुवार, 10 मार्च 2011

~ कल की सुबह ~



~ कल की सुबह ~

आज समुन्द्र फिर सूखा सा लगा
जिससे आस थी प्यास बुझाने की
वक्त भी मुझसे मुँह छिपाने लगा
देखा था जिसकी तरफ उम्मीद से

बगिया के फूलों से दोस्ती कर बैठा
आज कुछ काँटो ने छलनी कर दिया
बदन मे घाव भी अनेक उभर आये
अपनों से कैसे लड़ू, छूटे अस्त्र हाथो से

कठिन है राह अगर आज मंजिल की, तो भी क्या
कदम लड़खड़ाये मंजिल आने से पहले, तो भी क्या
रात के अँधियारे से रोशन होगी अपनी सुबह
उम्मीद का सूरज आज फिर उगेगा क्षितिज से

तस्वीर अभी बना रहा हूँ कल के लिए
कुछ रंग अभी इसमे बेरंग से दिखते है
रंग और भी समेटे है मैंने 'प्रतिबिम्ब'
बस अब इन रंगों का मिलना बाकी है

-    प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

जिंदगी सज़ा या मज़ा




एक है जो उपर बैठा
तय करता है
मुक्कदर मेरा
जीना मेरा
या उम्र मेरी

वक्त का चाबुक
कुछ येसा चलता है
काम येसा कर जाता हूँ
जो तकदीर बन जाता है
कभी संवर जाती है
कभी बिगड़ जाती है

जीता हूँ अपनी धुन में
सोचू मेरे कर्मो का नतीज़ा
या भुगत रहा प्रारब्धो को
चलो जो भी हो
फायदा मेरा ही है
चाहे इस जन्म मे या
फिर अगले जन्म मे

कर्म प्राथकमिता है
प्रेम मेरा अस्त्र है
मन मेरा शस्त्र है
जंग रोज जारी है
देख ले हे मेरे ईश्वर
तू तो सर्वत्र है

उपर वाले अब जो तेरी रज़ा है
मै तो बस इतना ही जानता हूँ
मिल जाये जो चाहा तो मज़ा है
ना मिल पाये तो सोचूं सज़ा है

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

कंहा है अब तू भगवान….



[एक विनती ]

पूजते तुझे सब, फूल चढाता तुझ पर हर कोई
किसी को मिलता भरपेट,सोये यंहा भूखा कोई

पैसे और स्वार्थ की खातिर कितना बदल गया इंसान
कुछ तो बदल तू आकर यहाँ, कंहा है अब तू भगवान

एक तेरे बच्चे सब, फिर क्यो देख कर तू बनता अंजान
कोई धनवान,कोई बेईमान, पर ना बन सका कोई इंसान

अपने सुख की खातिर याद करते है सब तुझे भगवान
प्रेम जिन्हे आता नही, फिर तू कैसे उन्हे मिले भगवान

कोई कहता अल्लाह,कोई जीसस,कोई कहता तुझको भगवान
एक तू, नाम अनेक, फिर भी क्यो तेरे नाम से लडते सब इंसान

तू सब्को देने वाला, फिर भी तुझे ही चढाते सोना और पैसा
दे उनको सदबुद्धी तू, समाज का भला हो काम करे कुछ येसा

भ्रष्टाचार, आंतक, स्वार्थ का आज केवल दिखता है यंहा  शोर
मन में तू आकर बैठ, ले चल इन सबको तू इंसानियत की ओर

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

यथा राजा तथा प्रजा




यथा राजा तथा प्रजा, सुनी थी कभी ये कहावत
आज देख रहे है सरकार और प्रजा की हकीकत
भ्रष्टता, घूसखोरी का दामन थामे गुजरता दिन
वादो की झडी लगती रोज, बीत जाता हर दिन

संसद बंद काम ठप्प, एक दूजे पर करते रहते वार
जनता की सोचे कौन, जब फले फूले अपना परिवार
खेल,खाद्दय,सूचना-प्रौद्योगिकी या सेना जैसे विभाग
कोई भी मंत्रालय नही जिस पर करे हम अभिमान

न्याय व्यवस्था लचर है, मिलने मे लगते सालो साल
इसका फायदा उठाते है आंतकी, खूनी और सारे चंडाल
कोसो इनको,कोई नाम दो,चाहे करो स्टिंग आपरेशन
सारे जतन करते, फिर भी नही रेंगती जूँ इनके कान

किसान तडप रहा, जनता का निकला दिवाला है
वादे करते है जैसे आज ही सब बदलने वाला है
चाहे जितना लिखो करो कितने भी व्यंग्य बाण
सुनते सब समझते सब है फिर भी अचेत प्राण

अब तो कोई दवा येसी निज़ाद होनी चाहिये
जितनी जरुरत उतनी ही चाह उत्पन्न होनी चाहिये
ना भर सके एक तिजोरी दूसरे का हक ना छीने कोई
प्रेम बस उपजे इससे, खाली पेट ना सोये कोई.....

- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

बुधवार, 26 जनवरी 2011

आज गणतंत्र दिवस है .....





आज   61 का हुआ अपना गणतंत्र
सोचो क्यों भ्रष्ट हुये इसके कुछ तंत्र

तिंरगा लहराना  हमारी देशभक्ति का बोध है
तिंरंगा फहराना  बना आज क्यों अपराध है

आज तिंरगा भारत में फिर लहरायेगा
सबको भारत आज खूब याद आयेगा

आज तिरेंगे की कहेगे सब एक नई कहानी
कभी कहेंगे अपनी तो कभी दूजे की जुबानी

बहुत पुराना है तिरंगे का इतिहास
ये रंग हैं शान्ति, प्रेम और साहस

भारत की सीमाओ का ये प्रहरी है
इससे प्रेम व सम्मान देना जरुरी है

राजनीति इसका मक्सद ना बन पाये
आओ देश हित मे सब एक हो जाये

जय हिंद !!!!!!

- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल

सोमवार, 24 जनवरी 2011

तेरा जिक्र




हर बात पर तेरा जिक्र जरुरी है
वरना मेरी कही हर बात अधूरी है

अगर शब्द बन कर तेरा नाम ले पाऊँ
लिखते हुये मन में तेरा जिक्र कर जाऊँ

तेरी दूरी का अहसास कभी होने नही देता
तेरा जिक्र मुझे कभी तन्हा होने नही  देता

कुछ ख्याल उनका कुछ जिक्र उनका
वक्त जब तब याद दिलाता है उनका

तेरा जिक्र किया तो हाज़िर जबाबी कहलाये
समझने वाले इसे भी  लाज़बाब कह गये

जिक्र करता हूँ तेरा चेहरा आंखो में आता है
तेरे अहसास से चेहरा फूल सा खिलने लगता है

मेरी दुआओ मे भी तेरा जिक्र आता है
ख्यालो मे भी पहले तेरा नाम आता है

खुश हो जाता हूँ जब साथ तेरा होता है
वंहा भी हर बात में जिक्र तेरा होता है

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

अंबु से...




अंबु से निर्मित हुआ इस धरती पर
अंकुरित हुआ इस पावन धरती पर

अंबर में अंकित जैसा एक सितारा
अंलकार सा सजा बना जैसा अंगवारा

अंशु सा चमकता, अंशुमान का पदार्पण हुआ हो जैसे 
फूल अंकटक सा खिल मेरे तन से लिपटा हो अब जैसे

अंचित है सब प्रियजन, तुम भी अंबक में बसते हो
अंजौरी बन मेरे जीवन में, अंतर्मन मे तुम रहते हो

अंचल सरकता है, टखने में अंदुक सज़ते है
देख तुझे अंतरपट मेरे तब खुल जाते है

अंजन बन किसी की नयनो में बसता हूँ
अंगार बन किसी की नयनो में खटकता हूँ

अंगन्यास किया रिश्तो के बंधन में बंधने के लिये
इंसानियत एक अंगत्राण है समाज मे जीने के लिये

अंतर्दाह कभी गिरा देता है कभी उठाता है
हमारा कर्म कभी हमें अंतकारी बनाता है

जीवन मृ्त्यु का अंतराल जीना है हमें
सत्य है अंतगति, सामना करना है हमें

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
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