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सोमवार, 11 अप्रैल 2016

मन को सबक ...




जोड़ कर मधुर पल,
आशियाना बना लिया
प्रेम का एक आवरण,
अनजाने ओढ़ लिया
हर एक लम्हे को,
मोहब्बत से जोड़ लिया 
किस्मत ने किया अन्याय,
घरौंदा छीन लिया

वक्त बेवक्त याद आया कोई,
शायद यही प्यार
लिख डाले यूं ही कुछ शब्द,
एहसास दिखे लाचार
बेवजह हुई बाते दुश्मनी सी,
बेनतीजा रही तकरार
कर्म से किया न कभी इंकार,
बना नसीब इंतजार

वक्त ने मुझे बार - बार,
हर बार समझाया
लेकिन नियति का मैं मारा,
समझ न पाया
देर सुबेर करता रहा मनमानी,
खुद को सताया
दूर हुई किस्मत 'प्रतिबिंब',
जीवन व्यर्थ गंवाया  

-      प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ११/४/२०१६

मैं और मेरी परछाई




आगे पीछे डोलता मेरा वजूद
कभी लम्बी कभी छोटी
होती मेरी अपनी परछाई
शब्द नही हैं उसके पास
लेकिन सवाल बहुत है
भीड़ में खो जाती है
अकेले में मुझसे
बहुत बात करती है 
मेरी  परछाई
रोते दर्पण सी
अपने प्रतिबिम्ब को
छलती है
अस्तित्व की तलाश में
कभी रुसवा होती है
कभी मौन होती है
कभी हंसती खिलखिलाती
तन्हाई से मोहब्बत करती है
या फिर
अँधेरे में गुम हो जाती है  

आज मुझे आवाज दे गई
मेरी अपनी ही परछाई
और
सवालों की अनंत धाराएँ
बह निकली होकर दिशाहीन
धैर्य पहचान खोकर
आक्रोश से सांठ गांठ कर बैठा
कड़वी आवाज बार बार
गर्जन कर रही
मानवता होकर तिरस्कृत
आँचल बेहूदी का ओढ़कर
जहरीले स्वर में
अभिनन्दन कर रही

रिवाज शहर का
ऊँची इमारतों ने
बदल दिया है
झुकना, अदब की रीत
आज दरवाजो में बंद है
भूख सडक पर
बदहवास घूमती है
गरीबी का नग्न तांडव
कैमरों की सुर्खियों में
लम्बी साँसे लेकर
दम तोड़ने को मजबूर

बेखौफ घूमता अपराध
छुपती छुपाती इंसानियत
उजाले में भी अँधेरे जैसा डर
लडखडाता तंत्र
एक दूजे पर अंगुली उठाते
एक दूजे के बने दुश्मन लोग
वजूद मिटाने पर तुले लोग
संस्कृति और संस्कार
को ठेंगा दिखाते स्वतंत्र नागरिक
प्रकृति का चेहरा पोतते लोग
खुद के लिए कब्र खोदते लोग

शांति का शील भंग हुआ
माँ का अपमान आम हुआ
जाति धर्म से लदे
कूड़े के ढेर पर
रोटियां राजनीति की
पक रही है
देश की अखंडता पर
जलती लकड़ियाँ फैंकने वाले
आग सेक रहे है
आग पर घी डालती
नामर्दों की एक लम्बी कतार

कांपने लगी मेरी परछाई
पूछ कर कई सवाल
साथ चलने से इंकार करती
लेकिन उसको कोई पहचानता नही
रोती बिलखती
मेरे साथ चलने को मजबूर
मैं और मेरी परछाई

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १०/४/२०१६ 

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

आ.....




छोड़ पुरानी बात सारी, आ फिर से नई शुरुआत करें
मोहब्बत थी जो दरमियाँ, आ उसे पुन: स्थापित करें
 
माना गलती किसी की, आ उस त्रुटि को हम क्षमा करें
जो मार्ग हम भटक गये, आ उसका भी परिशोधन करें

जो था अनुचित, आ उसे उचित राह हम प्रदान करें
विश्वास का जो बुझा दिया, आ उसे पुन: प्रज्वलित करें

छाये हैं खामोशी के बादल जो, आ उन्हें हम दूर करें
चलना हमे प्रेम संग, आ उस एहसास का आभास करें

मुरझा गए थे जो एहसास, आ उन्हें फिर सजीव करें
बाकी रह गए जो अरमान, आ उन्हें हम लक्षित करें

बिछड़ कर पाया जो दर्द, आ उसका हम उपचार करें
बन जाये हम मिसाल, आ ऐसा एक दूजे को प्यार करें

चाह तन मन बसने की, आ वो भाव फिर संगठित करें
प्यार एक दूजे का बनकर, आ हम प्रेम का श्रीगणेश करें 


-    प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

तेरा नाम




तेरा नाम ही मन को झंकृत करता है
एहसास में ही तन मन झूम उठता है

कहाँ छोडू एहसास, बैचेनी और इंतजार
पल पल याद करता है तुम्हे मेरा प्यार

बंधक हूँ तेरी सांसो का, तेरी महक का
क्या मिलेगा मुझे, उपहार मेरे प्यार का

प्यार में रचा-बसा, रोम-रोम तन मन का
आस है जिंदा, भरोसा मुझे मेरे प्यार का
 
जब जब दूर हुई, तब दिल बहुत तडपा है
लौटने तक ये, आख़िरी सांस सा अटका है

मिलते ही गिला न, कोई शिकवा रहता है
मन प्रफुल्लित, तन सुगन्धित सा लगता है

सिखाई प्रेम की भाषा, उस में ही बात करो
रह जाता जो अनकहा सा, तुम उसे पूरा करो

सुनो, तुम्हारे हाथो में है अब मोहब्बत मेरी 
प्यार को प्यार करो तुम, यही है आरजू मेरी


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ४/४/२०१६

रविवार, 27 मार्च 2016

लेकिन.....




आस कुछ थी मुझे, सूर्य की पहली किरण से
लेकिन
ढ़लता दिन और शाम उम्मीदों पर ढलने लगी

मैं सोच रहा था आज, भाव अनुबंध के लिखूं
लेकिन
छंद,  रिसते बंधन के कागज़ पर उभरने लगे

मैं गुनगुना रहा था, गीत मिलन और प्यार के
लेकिन
बोल विरह के गूँज कर, शोर चारों ओर मचाने लगे 

इन्द्रधनुष दूर क्षितिज पर, मन से भी दिखता था
लेकिन
उड़े अब रंग,  रंग काला फिर उस पर चढ़ने लगा

एहसास में, मौसम बसंत का आने को था बैचेन
लेकिन
आकर पतझड़ ने, नियम वो कुदरत का बदल दिया

आस मुलाक़ात की,  सावन के रंगों से स्वागत की
लेकिन
बरसात हुई बेरुखी की,  रंगों को होले से मिटा गई


                                    -प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २७/३/२०१६ 

गुरुवार, 24 मार्च 2016

स्मृति का दिया ...





मेरी स्मृति का एक जला कर दिया
जलती लौ से रोशन खुद को तुम कर लेना
हो पीड़ा मन के किसी कोने पर अगर
चंद पुष्प भावो के महफ़िल में अर्पण कर देना

रंग चटक जीवन के तुम अपनाकर
यादो से मेरी दूरी बना, आज में पनाह ले लेना
चेहरे की नफरत को शृंगार से छिपाकर
दुनियां के लिए तस्वीर मेरी दीवार पर सजा देना

यूं तो यादे किसी मेहमान सी आयेंगी
पहचानती नही हो कहकर तुम उनसे विदा ले लेना
नया वक्त यूं तो फुरसत मिलने की न देगा
साजिश अगर हो भी गई तो आंसू दो चार बहा देना

उम्मीदों का कारवां अंत तक चलता रहा
किसी मोड़ पर नज़र आये तो राह अपनी बदल लेना
गुम एहसास और शिकायत हम सफर थे
आये कोई खबर उनकी तो पता अपना तुम बदल लेना

सुनो प्यार को अब कसमो वादों में न ढूंढना
हिम्मत कर उसे तुम जीने का सलीका बना लेना
साथ 'प्रतिबिंब' तुम्हारा हर ठोकर से बचा लेगा
साथ न भी सही मगर आंसू गम के तेरे चुरा लेगा 


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  २४/३/२०१६ 

मंगलवार, 22 मार्च 2016

हम तुम खेलें ऐसी होली




सज धज कर धानी चुनरी ओढ़ आना  
मगन रह प्रेम रंग में सिंदूरी शाम तक
बंधन तन मन का जन्मों का साथी बना लेना
चल प्रिये हम तुम खेलें ऐसी होली

कर आना अतीत का तुम विसर्जन
निर्विकल्प आनंद का एहसास लिए
होकर समर्पित तन मन तुम मेरा रंग देना
चल प्रिये हम तुम खेलें ऐसी होली

मद भरे नयनो की मस्ती संग
चैत फागुन की तुम शरारत लिए  
प्रीत गुलाल सी तन मन पर सजा लेना
चल प्रिये हम तुम खेलें ऐसी होली

मिलन की चाह लिए व्याकुल मन
अधर संग सांस सांस भी मचल रही
रंग अपना, मेरे तन मन में बिखरा देना   
चल प्रिये हम तुम खेलें ऐसी होली

न टोकना तुम मुझे न टोकूंगा मैं तुम्हे
रंग देना अरमान, अर्पण कर प्रेम सारा
भर पिचकारी प्यार की तन मन रंग देना
चल प्रिये हम तुम खेलें ऐसी होली 

शर्म हया को तुम छोड़कर आना
संकलिप्त होकर रंग में मेरे रंग जाना
प्रेम रंग से तन मन पर हस्ताक्षर कर देना
चल प्रिये हम तुम खेलें ऐसी होली

हृदय सहित अंग अंग भिगो जाना  
पूर्णता का एहसास लिए प्रेमरस पी लेना
मधुर तरंग प्रेम की तन मन में छिपा देना
चल प्रिये हम तुम खेलें ऐसी होली
-        
             प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २२/३/२०१६ 

कुछ भी हो सकता है...





दुनिया में मुश्किल से मिलते है दोस्त
वो दोस्त अगर दुश्मन बन जाए तो समझो
कुछ भी हो सकता है

दुनिया के दिए दर्द से निजात दिलाने के लिए
कोई फ़रिश्ता जिन्दगी में खुद आ जाए तो समझो
कुछ भी हो सकता है

पिला रहे है जाम अपने ही मिलकर
वो जाम ही अगर जहर बन जाए तो समझो
कुछ भी हो सकता है

जो सुकून खोया कुछ पाने के लिए
वो सुकून ही अगर कहर बन जाए तो समझो
कुछ भी हो सकता है

इबादत कर रहा किसी शख्स के लिए  
वो इबादत जब गुनाह लगने लगे तो समझो
कुछ भी हो सकता है

चाहना जुर्म नहीं किसी के लिए
वो चाह किसी और की हो जाए तो समझो
कुछ भी हो सकता है  

मन से दुआ मांग रहा खुद के लिए
वो दुआ अगर कबूल हो जाए तो समझो
कुछ भी हो सकता है

लिखता हूँ भावों को शब्द देने के लिए
वो पढ़ कर पसंद, समझ ले कोई तो समझो
कुछ भी हो सकता है


-      प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  २२/३/२०१६ 
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