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सोमवार, 29 अगस्त 2016

तुम मेरा गौरव







क्षितिज पर
लालिमा का बिखराव होते ही 
नयनों के
सपन लोक से बाहर आते ही
हकीकत से
सामना होते ही वो आ जाती है
सूरज की किरणें
उसे सुनहरी ओढ़नी में सजा देती है

और फिर .....
तन मन पर
उसका प्रभाव स्वत: ही नज़र आता है
खिला सा चेहरा उसका
आँखों के आगे तितली बन मंडराता रहता है
हर रंग से सजी
उसकी अदा आस पास रहने को मजबूर करती है
छू लेने की चाह
तमन्ना बन आगोश में भरने को मचल जाती है

देखो न ....
शब्दकोश के सारे शब्द
यहाँ - वहाँ अपनी छाप छोड़ने को व्याकुल है
अर्थ और भाव भी
सब के हृदय पटल पर प्रभावित करने को तैयार है
अमर प्रेम सी प्रियसी बन
तुम मेरे दिन - प्रतिदिन और रोम रोम में व्याप्त हो

हाँ तुम मेरा गौरव, मेरा प्रेम "हिन्दी" हो .......


-      प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

शनिवार, 9 जुलाई 2016

वक्त का गणित कभी.....




कभी वक्त
चुपचाप रहकर
अघोषित
घोषणा करता हुआ
दबे पाँव
जीवन में दखल देता है
आहट सुनने की हर कोशिश
नाकाम होकर
अचंभित कर देती है
जब वक्त का ही
भयानक रूप
खुली आँखों से देखने पर
हम मजबूर हो जाते है

शून्य से शून्य
गुणा होता जाता है
खुशियां तब
विभाजित होकर
यहाँ वहां बिखर जाती है
हौसला और चाह
घटते हुए
शून्य तक पहुँच जाती है
दुःख जमा हो कर
पीड़ा के साथ
दर्द बेहिसाब देते है

वक्त का ये गणित
जीवन का उत्तर
गलत ही समझाता है
समाधान के तमाम
सिद्धांत, नियम और सूत्र
आत्मसमर्पण करते नज़र आते है
इंसान जीता जागता
एक लाश बनने को मजबूर

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

मंगलवार, 17 मई 2016

कब तक




प्यास से पानी तक
भावो से शब्दों तक 
अर्थ से भावार्थ तक, 
रूप से शृंगार तक 
चाह से मंजिल तक
हृदय से मस्तिष्क तक
कल्पना से वास्तविकता तक
बिम्ब से 'प्रतिबिम्ब' तक
स्पर्श से मिलन तक 
तुम दूर रहोगे कब तक

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

रविवार, 8 मई 2016

बच्चा हो जाना चाहता हूँ .....






यूं तो माँ के लिए हर दिन कम है हर शब्द कम है फिर भी कुछ कहना चाहता हूँ 

रख कर सर गोदी में, कुछ पल मैं सोना चाहता हूँ
पाने आशीर्वाद तेरा, चरणों में सर झुकाना चाहता हूँ 
पास रह कर, हर पल वही वात्सल्य पाना चाहता हूँ
उम्र की परवाह नही, पास तेरे बच्चा होना चाहता हूँ 

बैठकर पास तेरे, बिछड़े पलों का हिसाब देना चाहता हूँ
रूठे थे जो पल मुझसे, उनसे तुझे मिलाना चाहता हूँ
सर पर तेरे हाथो का, वही स्पर्श फिर पाना चाहता हूँ
तोड़ कर खिलौना कोई, तेरे आँचल में छिपना चाहता हूँ

भगवान का रूप तुझमे, आशीर्वाद तेरा पाना चाहता हूँ
भूल हुई जो मुझसे कोई, माफी तुझसे मांगना चाहता हूँ
ममता त्याग की मूरत तू, जीना तुझसे सीखना चाहता हूँ
कर्तव्य बोध का है स्मरण, लिपट तुझसे कहना चाहता हूँ

वक्त की अनजानी दूरी को, तेरे समीप लाना चाहता हूँ
मन के असंख्य पन्नो पर, तेरा नाम लिखना चाहता हूँ
भावो के ‘प्रतिबिंब’ से उभरी, तस्वीर तेरी बनाना चाहता हूँ
देर कितनी हो जाए माँ, लौट कर तेरे पास आना चाहता हूँ     


-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ८/५/२०१६ 
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