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शनिवार, 9 जुलाई 2016

वक्त का गणित कभी.....




कभी वक्त
चुपचाप रहकर
अघोषित
घोषणा करता हुआ
दबे पाँव
जीवन में दखल देता है
आहट सुनने की हर कोशिश
नाकाम होकर
अचंभित कर देती है
जब वक्त का ही
भयानक रूप
खुली आँखों से देखने पर
हम मजबूर हो जाते है

शून्य से शून्य
गुणा होता जाता है
खुशियां तब
विभाजित होकर
यहाँ वहां बिखर जाती है
हौसला और चाह
घटते हुए
शून्य तक पहुँच जाती है
दुःख जमा हो कर
पीड़ा के साथ
दर्द बेहिसाब देते है

वक्त का ये गणित
जीवन का उत्तर
गलत ही समझाता है
समाधान के तमाम
सिद्धांत, नियम और सूत्र
आत्मसमर्पण करते नज़र आते है
इंसान जीता जागता
एक लाश बनने को मजबूर

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

मंगलवार, 17 मई 2016

कब तक




प्यास से पानी तक
भावो से शब्दों तक 
अर्थ से भावार्थ तक, 
रूप से शृंगार तक 
चाह से मंजिल तक
हृदय से मस्तिष्क तक
कल्पना से वास्तविकता तक
बिम्ब से 'प्रतिबिम्ब' तक
स्पर्श से मिलन तक 
तुम दूर रहोगे कब तक

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

रविवार, 8 मई 2016

बच्चा हो जाना चाहता हूँ .....






यूं तो माँ के लिए हर दिन कम है हर शब्द कम है फिर भी कुछ कहना चाहता हूँ 

रख कर सर गोदी में, कुछ पल मैं सोना चाहता हूँ
पाने आशीर्वाद तेरा, चरणों में सर झुकाना चाहता हूँ 
पास रह कर, हर पल वही वात्सल्य पाना चाहता हूँ
उम्र की परवाह नही, पास तेरे बच्चा होना चाहता हूँ 

बैठकर पास तेरे, बिछड़े पलों का हिसाब देना चाहता हूँ
रूठे थे जो पल मुझसे, उनसे तुझे मिलाना चाहता हूँ
सर पर तेरे हाथो का, वही स्पर्श फिर पाना चाहता हूँ
तोड़ कर खिलौना कोई, तेरे आँचल में छिपना चाहता हूँ

भगवान का रूप तुझमे, आशीर्वाद तेरा पाना चाहता हूँ
भूल हुई जो मुझसे कोई, माफी तुझसे मांगना चाहता हूँ
ममता त्याग की मूरत तू, जीना तुझसे सीखना चाहता हूँ
कर्तव्य बोध का है स्मरण, लिपट तुझसे कहना चाहता हूँ

वक्त की अनजानी दूरी को, तेरे समीप लाना चाहता हूँ
मन के असंख्य पन्नो पर, तेरा नाम लिखना चाहता हूँ
भावो के ‘प्रतिबिंब’ से उभरी, तस्वीर तेरी बनाना चाहता हूँ
देर कितनी हो जाए माँ, लौट कर तेरे पास आना चाहता हूँ     


-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ८/५/२०१६ 

सोमवार, 2 मई 2016

ये आग






ये आग
सदियों से
चली आ रही कहानी है
जंगल तुमको गर्मियों में
एक दिन झुलसना है
पहाड तुमको
हरियाली से
नाता तोड़ना है
और सूना होना है

एक चिंगारी
सैकड़ो एकड़ वनक्षेत्र को
जलाकर राख कर देती है
जंगल में आग लगती है
या फिर लगाईं जाती है  
आज़ादी से अब तक
आग रोकने और
त्वरित नियंत्रण में
असफल है व्यवस्था
या है ये कोई षड्यंत्र?
जलस्रोत की कमी से
जंगलो में नमी कम है
कार्बनिक पदार्थ का
ज्वलनशील होना तय है
प्रयावरण पर खतरे का भय है  

दावाग्नि में
स्वाहा होती है
अकूत वन सम्पदा और
जैव विविधिता पर
मंडराता है संकट
पारिस्थितिक तंत्र
हो जाता है गड़बड़
विलुप्तप्राय वनस्पतियों और
वन्य जीवो पर होता असर
प्रश्नचिन्ह
लगता इनके अस्तित्व पर
और स्थिति
पहाड़ो के जन जीवन पर
गहरी चोट कर जाती है

इस आग से
उत्पन काला कार्बन
पहुँच हिमालय की निचली श्रृंखलाओं में
विकिरण सोख लेता है   
उत्सर्जन कार्बन डाईआक्साइड
और ग्रीनहॉउस गैस का   
तापक्रम में वृद्धि कर
अवक्षेपण में बदलाव ला सकता है  
और
पिघलते ग्लेशियर खतरा बन
जमी नदियों को प्रभावित कर
परावर्तन क्षमता में बदलाव लाते है

हाँ यह सब सोचकर
हम कितना डरते है
साल दर साल क्षति होती है
फिर भी कुछ नही करते है
पहाड़ और जंगल
मानव रहित हो रहे है
अपने होने की दुहाई दे रहे है
और हम खड़े
सरकार, व्यवस्था को दोषी मान
केवल इंद्र देव को याद् करते है
आज बस इतना ही कहना है
जंगलो से प्रेम करना
हमें फिर से सीखना होगा.
अपनी अगली पीढ़ी की खातिर
वन सम्पदा, वन्य जीवन  
और पहाड़ के

जन जीवन की  खातिर 

प्रतिबिम्ब  बड़थ्वाल  २/५/२०१६ 
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