बृहस्पतिवार, 24 मई 2012

सरकार की चाहत




पेट्रोल के दाम बढ़ने से जनता आहत है
तिल तिल कर मारना सरकार की चाहत है
शायद है यकीन उन्हे इस बार दुबारा सत्ता न पाएगी
इसलिए जनता को रुलाने सरकार यही चाल अपनाएगी

समय है कम अब अगले चुनावों मे, तो कैसे जाए पैसा ज़ेबो मे
सोच रही सरकार किंसकों हम फायदा दे, जो फायदा दे अगले चुनावो मे
जनता को तो हर बार बकरा बनना है जब खेल रहा सारा तंत्र इनके हाथो मे
बतला दिया तेल माफिया से प्यार दिखला कर, खोट कितना है इनके नेक इरादों मे

महंगाई से हमे डर लगता नही साहब, डर लगता है इनकी बढ़ती  इच्छाओ से
वोट पाकर जिनका सत्ता की कुर्सी पाते है, खेल रही सरकार फिर उन्ही के जज़बातो से
कोई पूछे तो ये इक्नॉमिक्स समझाने लगते है, महंगाई और जनता तो जाए उनके ठेंगे से
भीख मांगने आने वाले है अगले चुनावो मे, औकात दिखा दो तुम इनको अपनी वोट की ताकत से

(प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल)

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

प्यार में ........ कोई




प्रेम का क्या मोल दे सकता है  कोई
इस में तो बेदाम बिकता है हर कोई

इश्क़ में आसानी से गिरफ्तार हुआ कोई
करके सैकड़ो जतन, तब पाता इसे कोई

प्यार संग दुनिया की परवाह नही करता कोई
अपनों को ले संग, प्यार की राह चलता कोई

शौक से अब सजने सँवरने लगता है कोई
ये पल यहीं थम जाये दुआ करता है कोई

ख्याल उसके इर्द - गिर्द बुनता कोई
शोर में भी उसकी आहट सुनता कोई

प्यार को कई  नाम दे देता है कोई
एक ही नाम से खुश रहता है कोई

इंकार  इकरार का लुत्फ लेता है कोई
खुशी - गम का हिसाब रखता है कोई

तनहाई में बेसब्र हुआ जाता है कोई
आंखे मूँदकर यादों में खोया है कोई

उससे मिलन की आस बढ़ा जाता है कोई
बिछुड़ने के डर से ही घबरा जाता है कोई

कानो में पायल की झन्कार सुनता है कोई
महक हर पल उसकी महसूस करता है कोई

दूर रहकर भी पास उसे अपने पाता है कोई
पास रहकर भी उसी के ख्याल में गुम है कोई

संदेश लिखकर इंतज़ार फिर करता है कोई
इंतज़ार में उसके प्रेम गीत लिखता है कोई

मोहब्बत को इबादत समझ पूजता है कोई
पाकर प्यार को, खुद पर इठलाता है कोई

बारिश में भीग तन मन भिगो रहा है कोई
हर मौसम में मोहब्बत को जी रहा है कोई  

नाम संग तब्बसुम बिखेर देता है कोई
छू लेने भर से ही पिघल जाता है कोई

खामोशी में भी उसे गुदगुदा जाता है कोई
छेड़ कर, गालो को लाल कर जाता है कोई

प्रेम के प्याले आंखो से पिलाता है कोई
झील सागर कह इनमे डूब जाता है कोई

चाँद से बात व शिकायत करता है कोई
सितारो को भी हमसफर बनाता है कोई

दिन में भी ख्वाब सजाने लगता है कोई
रातों को ख्वाब पूरे करने लगता है कोई

बैठ बगिया में, बाहें  डाल  बतिया रहा कोई
हाथो में ले हाथ, अपनों से वादा ले रहा कोई

सहला कर बाल, अंगुलियाँ फेर रहा है कोई
मिटा कर नाम बार - बार लिख रहा है कोई

अहसास संग अपनी नीद उड़ा रहा है कोई
पाकर साथ नींद में भी मुस्करा रहा है कोई

कभी चैट तो कभी फोन पर  इश्क लड़ा रहा कोई
करके मीठी मीठी बातें मोहब्बत समझा रहा कोई  

छोटे बड़े तौहफ़े देकर प्यार जता रहा है कोई
देकर  गुलाब दिल से दिल मिला रहा है कोई  

अपनों से ही सब बातें छिपाने लगा है कोई
हो  कर मगन गीत  गुनगुनाने लगा है कोई

कुछ याद आते ही अंगड़ाई लेता है कोई
कुछ  सोच  कर ही शरमा जाता है कोई

तन से  मिलन के साज छेड़ता है कोई
साज पर मिलन की धुन गाता है कोई

अहसास एक होने का पल समेटता है कोई
तृप्त हुआ तन - मन लबों से बताता है कोई

प्रेम रंग में रंग अपने रंग भर देता कोई
इस रंग मे रंग कर भी छुपा लेता है कोई

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

एक सिपाही



मेरी रूह में भी बैठा एक सिपाही है
बस जरुरत थोडा उसे जगाने की है
ये अलग बात है की मैंने उसे खुद सुलाया है
देख रहा सब आँखे मूँद दिल को समझाया है
देश से ज्यादा खुद से नाता मैंने जोड़ा है
हर नियम कायदे को मैंने तो बस तोड़ा है
हो कोई भी अपराध घटना या दुर्घटना कही
खुद को छिपाकर चुप रहने को ही माना सही
खून खौलता है मेरा देख दुश्मन की तिरछी नज़र
कुछ छण सोचकर फिर चल पड़ता हूँ अपनी डगर
ये भी नहीं की मैं येसा कुछ कर सकता नहीं
पर क्या करूँ मुसीबत सोच गले लगाता नहीं
अपनों के दुःख पर जब तड़प उठता हूँ
फिर क्यों देश समाज से यूँ दूर रहता हूँ
आज सोच और कलम में आत्मा जिन्दा है मेरी
बस एक सिपाही का दिल मिले ये जरुरत है मेरी

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

बृहस्पतिवार, 22 मार्च 2012

निमज्जन हो सुन ....



नि:शब्द होता हूँ जब देखता हूँ नि:प्रभ तुझे
नि:सत्व है जीवन, नि:संकोच कहता हूँ तुझे
नि:स्पंद है चाह, नि:स्पृह है जीवन तेरा
नि:स्व सा हो गया है नवल सा मन तेरा 

नक्तक सा दिखता है, नाचार क्यों विश्वास तेरा 
नि:शस्त्र लगता है तू, नि:सार हर आक्रमण तेरा
नि:प्रयोजन कर्मो से नि:क्षिप्त होता है मान तेरा
नकबानी से डरता है तू, नि:कारण है ये डर तेरा

नि:शल्य नहीं जीवन, बस निर्भय हो पथ पर चल
निकषण से न अधीर हो, नि:क्षोभ हो कर्म करता चल
नि:शोध्य नही कुछ जीवन मे, नि:संकोच मान कर चल
निकुंज सा है ये तेरा संसार, इसे तू निकेत मान कर चल

नकबजन कर देता है नंश जीवन ,इसका तू ध्यान कर
नवागत है हर पल, नगावास सा नाच तू उसके आने पर
नास्तिक नही नि:कपट बन, नि:छल भाव से प्रेम कर
नंदित होगा मन तेरा, नर्मवत मुस्कान ला तू चेहरे पर

नि:स्वार्थ स्नेह को अपना, छोड़ दुश्मनी नि:शेष जीवन में
नि:सीम है मंजिल तेरी, नि:सहाय न समझ इस दुनिया में
ले हाथों मे नवतिका, अब तू नानावर्ण जोड़ इस जीवन में
नवीभूत कर भाव अपने, नलिनी सा खिल इस बगिया में
                                                                            प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
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