मन बहुत उतावला होता है। इसमे न जाने कितने सवाल उठते है या जबाब मिलते है। चाहे उनमे मै स्वयं ही घिरा हूं या फ़िर समाज या देश के प्रति मेरी उदासीनता या फ़िर जिम्मेदारी। आप भी मेरी इस कशमकश के साथी बनिये, साथ चलकर या अपनी प्रतिक्रिया,विचार और राय के साथ्। तेरे मन मे आज क्या है लिख दे "चिन्तन मेरे मन का" के पटल पर यार, हर पल तेरी कशिश का फ़साना हो या फ़िर तेरी यादो का सफ़र मेरे यार।
सोमवार, 11 जनवरी 2010
यूएई कौथिग 2010
शनिवार, 12 दिसंबर 2009
१३ दिसम्बर याद आये डा. पीताम्बर दत्त बडथ्वाल (हिन्दी के प्रथम डी लिट)

डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल (१३ दिसंबर,१९०१ - २४ जुलाई,१९४४)
शनिवार, 5 दिसंबर 2009
उनकी याद्
क्षितिज की ओर निहारती नज़रे
शांत समुन्दर की मस्त लहरे
बरबस ही उनकी याद दिला जाती है
उनको भूलने की नाकाम कोशिश
फ़िर मन में एक आस जगा जाती है
मन फ़िर मन नहीं रहता
प्रेम में वशीभूत हो जाता है
आसमान की उँचाईया छूने लगता है
प्यार कि खुशबू महकने लगती है
सांसे कुछ तेज चलने लगती है
बंद आँखे प्यार का लम्हा जीने लगती है
होंठ उनके नाम से कंपकपाने लगते है
अहसास फिर से मचलने लगते है
उनकी याद आज भी
अपने करीब ले जाती है.
गुरुवार, 26 नवंबर 2009
26/11 - क्या सीख पाये हम कुछ ?

मुंबई हमले की आज बरसी है. तमाम चैनलो और प्रिंट मीडिया में "अपने सच" की खूब बिक्री हो रही है.सभी किसी न किसी रुप में किसी को दोषी ठहरा रहे है या फ़िर प्रशन खडे कर रहे है. आज भी पाकिस्तान को दोषी और शहीदो को याद कर रहे हैं. यही होता आया है पहले भी और आज भी. सरकार की नाकामायाबी और राज्य की निष्क्रियता पर राजनीति होती आ रही है और होती रहेगी.
सच तो केवल इतना है कि आंतक का डर उसी रुप में बरकरार है. कई दावे सुरक्षा के मध्य नज़र हर घटना के बाद किये जाते है, आयोगो का गठन तो आम बात है. मानव अधिकारो के नाम पर दोषियो के प्रति सख्त कार्वाही करने से हिचकते है या कहे वोट बैंक की रजनीति हावी रहती है. केवल लोगो को गुमराह किया जाता है धर्म, मज़हब या फ़िर अल्पसंखय्को के नाम पर.
आज जरुरत है अपनी सुरक्षा संगठनो को और सशक्त बनाने की, गुप्त्चर विभाग को और जागरुकता बरतने की और आम नागरिक को और चौकस रहने की. इन तीनो को केवल राष्ट्र से जोड कर देखा जाना चाहिये ना कि जाति, धर्म और राजनीति से. भरस्क प्रयास होने चाहिये हर राज्य की ओर से चाहे सरकारे किसी भी राजनीतिक दल की हो या केन्द्र मे किसी की भी सरकार हो.पक्ष या विप़क्ष को राजनितिक फ़ायदे की लालसा को दर किनार कर देश की अखंडता के लिये साथ कदम उठाने की जरुरत है. कानून का पालन सख्ती से और दोषियो की सुन्वाई जल्द से जल्द और कडी सज़ा जिससे आंतक फ़ैलाने वाले इस तरह के कदम उठाने से पहले १०० बार सोचे. उन सभी लोगो को भी जो आंतकियो को शरण देते है उन्हे भी आंतकी समझ कर ही सज़ा देना जरुरी है. सविधान/कानून मे भी संशोधन की जरुरत है जिससे अपराधी इसका फ़ायदा उठा कर बच ना सके. सभी पुलिस महकमो मे शिक्षा और आधुनिकरण को स्थान देना होगा तथा उनकी उपयुक्तता को बढाना होगा. बेरोज़गारी और गरीबी जैसे मुद्दो की ओर भी देखना होगा जिससे युवाओ को सही दिशा मिल सके और उनका ध्यान देश विरोधी गतिविधियो या अपराधो की ओर ना जाये.
सभी कार्यो को अंज़ाम देने के लिये इच्छाशक्ति की अहम जरुरत है. फ़िर देश से बडा क्या है. यदि हम सभी इस भावना से कार्य करे तो आंतक जैसे दानव से छुटकारा पा सकते है.
एक गीत जो १५ अगस्त २००९ को लिखा था उसे पुन: लिख रहा हूं. शहिदो को नमन करते हुये.
- सुनो वतन के रखवालो -
हे माटी के मतवालो, गीत हिंद के गा लो,
हर धर्म का है मान यहां, प्रेम जहां की भाषा है,
मां यही है,शक्ति यही है, सुनो वतन के रखवालो
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
इस माटी मे हम जन्मे हैं, इस माटी से प्यार करो,
प्यार हमारी शक्ति है, इसी में छुपी देश भक्ति है,
तिरंगे ध्वज की गरिमा को, आंच कभी ना आने देंगे।
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
आजादी कही छिन ना जाये, भारत को हमें बचाना है
वतन पर मरने वालो की, हमे यही तो दीक्षा है,
उठो स्वयं को तैयार करो, माटी का कर्ज चुकाना है,
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
भारत में रहनेवाला , हर एक इंसा हिन्दुस्तानी है,
धर्म कहीं लुटने ना पाये, करनी इसकी निगरानी है,
मां की लाज बचानी है, यही एक हमारा नारा हो।
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
सब युवाओ के कंधो पर, बागडोर है भारत की,
अब घडी है परीक्षा की, इसके लिये हर पल तैयार रहो,
गर्व है तुम पर भारत मां को, उसका पूरा सम्मान करो।
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
यह देव्य भूमि है,यह पुण्य भूमि है,इस पर कितने अवतार हुये,
हम स्वयं अंश है इस भूमि के, फिर क्यो कोई अपमान सहे,
दे देंगे जीवन अपना भी, लेकिन मां को कुछ ना होने देगे।
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
आज वचन ले हम सब, इसकी रक्षा करने का,
मर जायेंगे, मिट जायेंगे, सेवा मे अपने वतन की,
धर्म यही है कर्म यही है, हम तिरंगे के मतवालो का।
सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।
- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, आबू धाबी, य़ू ए ई
सोमवार, 2 नवंबर 2009
चाँद फिर निकला Written By: Kamlesh Chauhan Copyright@ July 9th, 2008
मुहबत का जिक्र हो शायद हाथो की लकीरों मे
याद दिलाता है मुझे एक अनजान राही की
याद दिलाता है उन मुहबत भरी बातो की
टूट कर चाहा इक रात दिल ने एक बेगाने को
कबूल कर लिया था उसकी रस भरी बातो को
वोह पास हो कर भी दूर है मुझ से
दूर होकर भी कितने करीब है दिल के
उनको देखने के लिये ये नैन कितने प्यासे थे
उनको देखने की चाह मे हम दूर तक गए थे
डूब जाते है चश्मे नाज़ मे उनका कहना था
जिंदगी कर दी हमारे नाम उनका ये दावा था
आज चाँद फिर निकला बन ठन कर
चांदनी का नूर छलका हो यु ज़मीं पर
याद आयी नाखुदा आज फिर शब्-ए-गम की
मदभरी,मदहोश,रिश्ता-ए-उल्फ़ते,शबे दराज की
नैनो मे खो गए थे नैन कुछ ऐसे उस रात
छु लिया यूँ करीब हो कर खुल गया हर राज़
२
आज पूरण माशी का चाँद फिर निकला
सवाल करता है आपसे आज दिल मेरा
मेरे चाँद
तोड़ कर खिलोनो की तरह यह दिल
किसके सहारे छोड़ देते हो यह दिल
अगर वायदे निभा नहीं सकते थे तुम
जिंदगी का सफ़र न कर सकते थे तुम
कियों आवाज दी इस मासूम दिल को
कियों कर दस्तक देते हो इस दिल को
मत खेलो इस दिल से मेरे हजूर
मत छीनो मेरी आँखों का नूर
हमारा तो पहला पहला प्यार है
आँखों मे तुम्हारा ही खुमार है
हर रोज तुम्हारा ही इंतजार है
दिन रात दिल रोये जार जार है
या तो हमें सफ़र मे साथ लेलो
या फिर अपनी तरह
हमें भी खुद को भुलाना सीखा दो
जीना सिखा दो मरना सिखा दो
अभी तो ज़िन्दगी एक इल्जाम है
बिन तुम्हारे सुनी दुनिया
हमारा तो संसार ही बेजार है
all rights reserved with Kamlesh Chauhan none of the lines and words are allowed to manipulate and changed. Thanks
रविवार, 1 नवंबर 2009
स्वयं का पहला कदम

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009
क्या करना तुम शादी के बाद.

बता रहा हूँ क्या करना तुम शादी के बाद
रात - दिन का नही, जीवन भर का है साथ
इसे निभाना प्रिय मित्रो , तुम शादी के बाद
एक दूसरे को समझना, ना करना तुम शक
इधर उधर झाँकना नही, तुम शादी के बाद
सुख - दुख जीवन का अंग है, इसमे रहना साथ
एक दूसरे का हाथ बटाना, तुम शादी के बाद
एक दूजे की खुशियों का रख्नना तुम ध्यान
हर कदम फूँक - फूँक रखना तुम शादी के बाद
सुन्दर - सुन्दर फूल खिलाना तुम अपने घर आँगन
छोटा परिवार सुखी परिवार, रखना ध्यान तुम शादी के बाद
सोमवार, 19 अक्टूबर 2009
तुम जब भी मेरे पास आये

प्यार की परिभाषा बदलती रही।
जब भी तुमने मुझे छुआ
अहसास हमारे हर पल बदलते रहे।
तुम्हारी आँखों ने जब भी कुछ कहा
सपने मेरी आँखों के बदलते रहे
तुम्हारे दिल ने जब भी मुझे पुकारा
दिल के जज़बात फ़िर तड़पेंगे लगे
रात की खामोशी जब कुछ कहने लगी
हम तुम तब कुछ बहकने से लगे
दूरियां जब कुछ कम होने लगी
प्यार के अंदाज़ फ़िर बदलने लगे।
होंठ जब तुम्हारे कंपकंपाने लगे
जुबां ना जाने मेरी क्यों लड़खड़ाने लगी
सांसे जब तुम्हारी तेज़ चलने लगी
प्यार कि गहराई हर पल बदलती रही।
वक्त और मौसम बस बदलते चले गये
हम और तुम प्यार में बस चलते गये
अहसास फ़िर भी बदलते रहे
प्यार में हम यूं ही निखरते रहे

