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रविवार, 22 जनवरी 2017

अंधेरे में....



अंधेरे में....

तलाशता रहा
अंधेरे में खुद को
अंधेरे में वक्त को
अंधेरे में किस्मत को
मगर
कोई उत्तर न मिल पाया
अंधेरे से
गुफ्तगू करने की ठान
हिम्मत जुटा पुकारने लगा
आँखे बड़ी कर
खुद को निपुण समझ
अपना ही वजूद ढूँढने लगा

अँधेरे में
अपना अक्श, अपना ‘प्रतिबिम्ब’
पहचानने से इंकार करने लगा
अपनों की पहचान में
कई नाम लिख डाले
लेकिन भूल गया था
अँधेरे में काली स्याही  
को कौन पढ़ पायेगा
कौन हाथ जला
एक रोशनी
मुझ तक पहुंचा पायेगा

लेकिन यकीन है
एक सुबह तो आयेगी
अँधेरे को चीरती हुई
विशिष्ट रोशनी से
चिन्हांकित करते हुए  
तब वक्त भी
तब किस्मत भी
नहीं रोक पायेगी
सुबह को आने से
उन किरणों को
मुझसे मिलने से  

-      प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २२/०१/२०१७

शनिवार, 21 जनवरी 2017

दो शब्द





दो शब्द  ....

एक रास्ता
दो राहें 
अनजानी सी

पग भरती
खामोश कशिश
मंजिल ढूंढती

बेरुखी संजोये
दर्द समेटे
जड़े विलुप्त

चलते चलते
सुन सका
केवल बेबसी 

रुखा प्रेम
उबलती नफ़रत
खाली गाँव

रोते पहाड़
रीती नदियाँ
दुश्मन पहाड़ी

दुश्मन भाषा
अपने पराये
भूमि शापित

भूलती बिरासत
लुप्त संस्कृति
भस्म संस्कार

नीति दूषित
खंडित राजनीति
पहाड़ पहचान


-         प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २१/०१/२०१७

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

मेरा पहाड़ ......



~मेरा पहाड़ ......~

पहाड़ो से
मेरा रिश्ता कायम है
जन्मभूमि की खुशबू
रची बसी है रोम रोम में
इसलिए उसकी पीड़ा भी
महसूस कर पाता हूँ
विकास के लिए हो या
किसी आपदा का शिकार हो
पहाड़ ने विनाश झेला हो
मेरे पहाड़ ने
जब - तब जख्म खाए है
सहनशीलता का
पर्यायवाची है मेरा पहाड़
और ऊंचाई
उसका मान सम्मान है
कठोरता और अडिगता
ही उसकी पहचान है
लेकिन मेरा पहाड़
संवेद्नाओं से भरपूर है

पहाड़ को पहाड़ में रह कर देखा
पहाड़ को नजदीक से देखा
पहाड़ को दूर से देखा
पहाड़ को दूर रहकर महसूस किया
पहाड़ से प्यार जस का तस है
पहाड़ी पहचान पा गौरंविंत हूँ  

पहाड़ कोई भी हो
अपना सा लगता है
मेरे अंदर भी एक पहाड़ है
भूले बिसरे ही सही
पहाड़ जिन्दा हो उठता है
अपनी कहता अपनी सुनाता है
दूर रहकर भी मुझमे बसता है
और मुझमे बसे पहाड़ को
कभी मरने नहीं देता........

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १०/०१/२०१७

रविवार, 1 जनवरी 2017

इंतज़ार में है ...




इंतज़ार में है ... 

शून्य को साक्षी मान 
जीवन के पथ पर 
निडरता से कदम रखते हुए 
चल तो दिया था

वक्त और किस्मत से बेख़ौफ़
अपनों में सुरक्षित समझ
लम्बी यात्रा का साजो सामान रख
चल तो पड़ा था

सत्य और ईमान की गठरी बाँध
कर्तव्य की पहचान कर
संसार में अपनी पहचान बनाने
चल तो रहा था

यूं चलते चलते न जाने कब
शून्य से डरने लगा
डर से कदम पीछे खींच कर
मैं रुक गया था

वक्त दुश्मन, किस्मत रोड़ा बने
अपनों में असुरक्षित महसूस कर
यात्रा का साजो सामान बिखरते ही
मैं रुक गया था

झूठ फरेब के जाल में उलझ
कर्तव्य से विमुख हो कर
अपनी ही पहचान खोकर
मैं रुक गया था

अस्तित्व की जंग जारी है
गिर कर उठना आदत हमारी है
नया सृजन, नई मंजिल 'प्रतिबिम्ब'
अभी भी मेरे इंतजार में है
-
 प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ०१/०१/२०१७

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

अंतिम रचना



अंतिम रचना....

अब समय आ गया है
कलम को विराम देने का
विचारों पर पूर्ण विराम लगाने का
इस वर्ष
कभी थोड़ा, कभी बहुत लिखा
और क्या क्या न लिखा
कभी उसने जो कहा या किया
दिल ने जो समझा लिख डाला
कभी मैंने जो सोचा या समझा
कभी तुमने जो लिखवाया 
अच्छा - बुरा जो देखा
बस लिखता रहा
कही- अनकही समेट कर
शब्दों के तराजू में तोलकर
भावों से मोल भाव कर
खरीद लिए पाठक दो चार 
स्वयं को पढ़
स्वयं की पसंद बन 
चित्रों को उकेरता रहा
बन कर स्याही
कही दर्द, कहीं प्यार
कोरे पन्नों पर परोसता रहा
दौर और बदलाव का साक्षी बन
अपने इन हाथो से गवाही देता रहा
न जाने कितनो को आहत किया
दोस्त दुश्मन का पैमाना बना
कुछ को साथ कुछ को दूर कर दिया
न्याय अन्याय की लेकर अपनी समझ
फैसला
कभी पक्ष, कभी विपक्ष में लिखता रहा 
अंगुली उठाई भी और मोड़ी भी 
किसी को सम्मानित
किसी को अपमानित किया
कलम को कभी हथियार
कभी पतवार बना
सामजिक उतार चढ़ाव
का रेखांकित कर दिया
खुशी और गम को
जिन्दगी के रंगो से रंग दिया
वक्त को बादशाह करार दे
नियति का दामन थाम लिया
हार-जीत की परवाह किये बिना
सफलता असफलता लिखता रहा 
आपको
कितना सच कितना झूठ लगा
कितना पसंद कितना नापसंद किया
कितने करीब कितने दूर हुए
कितने अपने कितने पराये हुए
नहीं जानता 
बस इतना जानता हूँ
हर शब्द हर भाव
दिल से लिखकर
समर्पित कर दिया आपको

लेकिन
इस अंग्रेजी नववर्ष के अंत में
अपने शब्दों को
अंतिम रचना समझ
२०१६ को अर्पित कर
अब अलविदा कहता हूँ
हाँ खट्टा मीठा याद रहेगा
लेकिन विश्वास
नए साल में
नया सृजन, नई सोच
"मेरा चिंतन"
मेरा 'प्रतिबिम्ब' बन
'क्षितिज' की दूरी तक
इन्द्रधनुष सी आभा लिए
हर शब्द और भाव की किरण
मेरे अपनों तक पहुँचती रहेगी
मेरा अस्तित्व
परिणाम का मोहताज़ नहीं
बस लिखूंगा कहूँगा वही
जो लगेगा अंतर्मन को सही
शुभम .....

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  २७/१२/२०१६

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

वक्त का साया









वक्त का साया
स्वर्ग नरक खाई से
भी अलग
कई गुना गहराई तक
दफन कर देता है
हर उम्मीद
हर हौसले
हर जज्बे
की तड़फती चीख को

मानवता
दम तोडती हुई
निवस्त्र कर देती है
इंसानियत के ओढ़े हुए
आवरण को....
धोबी के कुत्ते सा
न घर पर न घाट पर
ला कर पटक देती है
और
बेजुबान कर देते है
वक्त के तीखे ज़ख्म...
झुलसता जाता है
रोम - रोम बिखरता
टूटता - कराहता हुआ
रेंगते हुए
अनिश्चितकाल के आगोश में
दुबक कर बैठ जाता है...

दिखाई तो नहीं देती
लेकिन सुनाई देती है
एक चीत्कार
जो खुद से निकल
खुद में ही समाधि लेती है
आस पास भीड़
बहरी हो कर
नपुंसक बन जाती है
उनके मन के कोने में
ताली पीटते एहसास
खुद को राजा
दूसरे को रंक समझ लेते है
जीत का काला झन्डा
आँखों के सामने
तांडव करते हुए
खिलखिलाहट करता हुआ
नस्तर चुभोता जाता है

कौन भागीदार
कौन चौकीदार
कौन अपना
कौन पराया
शतरंज की बिसात पर
चाल चलते...
पाप पुण्य की परिभाषा से अलग
अपने ओहदे की गरिमा का
नाज़ायज प्रदर्शन करते
मुंह में राम बगल में छुरी
मुहावरे को सत्यापित करती
सैंकड़ो बेदर्द आत्माए
वक्त के आगोश में सिमट
मीठे जहर सा फैलता हुआ
मेरे अस्तित्व को ‘प्रतिबिम्ब’
मिटाने की
चेष्टा करता हुआ
वक्त का साया ...

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  १८/१२/२०१६

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

रुक




रुक .....

रुक, जाते कहाँ हो,
माना कि अब
दिल मुझसे भर गया है
लेकिन कुछ तो
अभी भी मेरे लिए होगा
तेरे दिल में
कुछ अधूरा सा प्यार
या पूरी तरह नफ़रत

कुछ पल ही सही
तू ठहर भी जा
न जाने फिर
कब मुलाक़ात होगी
कब तुमसे फिर बात होगी
ज़रा रुक कुछ कहने सुनने से  
शायद तुम समझ पाओगे
या मैं समझ पाऊंगा
टूटते रिश्ते की हकीकत

मुझमें लाख कमी सही
पर तुझमें भी धैर्य नहीं
साथ न सही
आ किनारा बन जाओ
सूखी दरिया को
एहसासों से लबालब भर दे
हमारे रिश्ते को
इन्हीं किनारों में
समेट ले
बाकी हमारी किस्मत


-          प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

रविवार, 20 नवंबर 2016

कर समर्पण



आनंदित मन से
धर्म कर्म का कर अनुसरण
नित्य पढ़ समझ कर 
शब्द भावो का
कर हृदय में अनुकरण
बना कर उसे संस्कार
पहले राम नही हनुमान बन
कर समर्पण ....

गहराई में उतर
लेकर ज्ञान अर्थ का
भावार्थ का कर संज्ञान
स्वयं में कर रूपांतरित
उलझ नही सुलझ कर
सुन कर नही समझ कर
पहले कृष्ण नही अर्जुन बन
कर समर्पण....

प्रेम का अहोभाव लिए
प्रतिरोध का कर विरोध
शून्य कर चित्त को
चैतन्य को प्राप्त कर
गुजर कर अग्नि से
इर्ष्या का कर अंतिम संस्कार
गुरु नही पहले शिष्य बन
कर समर्पण ....

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल २०/११/२०१६

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

भीड़




भीड़ का बोलबाला है 
वरना लगा सब जगह ताला है 
चाहे दुकान हो या रिश्ते 
भीड़ का अनुसरण कर
इंसान बिक जाता है
इंसान बिछ जाता है
इंसान भीड़ का सत्य नही जानता
लेकिन भेड़चाल में कदम मिला
अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है
भीड़ क्या कहती है
भीड़ क्या सुनती है
भीड़ क्या चाहती है
इंसान ने स्वयं को भीड़ के
आकर्षण वाले खूंटे से बाँध लिया है
फिर चाह कर भी मुक्ति नही मिलती
क्योंकि यह खूंटा बाहर ही नही
अंदर भी पेंठ बना लेता है
भीड़ में आप हो,
या भीड़ आपके लिए हो
दोनों ही
एक दूजे के परिचायक नज़र आते है

मैं इसी भीड़ का हिस्सा हूँ
यह जानते हुए भी
कि
भीड़ तो भ्रम है
भीड़ तो मिथ्या है
लेकिन
कल इसी भीड़ को
अपने लिए खड़ा करना चाहता हूँ
अपने साथ देखना चाहता हूँ
बिकता है इंसान
केवल पैसो से नही
भावो और स्वार्थ की
महंगी बोली लगती है यहाँ
टूट जाते है रिश्ते
दल बदलू नेताओं की
आत्मा लिए रिश्ते
बस नेता की तरह
अभिनेता बनना सीख लो
भीड़ को खुद से जोड़ लो .......

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ८/११/२०१६




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