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रविवार, 15 मई 2011

फिर भी तेरा इंतज़ार ........





मै कोई ख्वाब तो नही
तू एक ख्वाब ही सही

मानता हूँ
तू मेरा प्यार है
जानता हूँ
मै तेरा प्यार नही
मानता हूँ
मै तेरा नसीब नही
जानता हूँ
तू मेरे नसीब मे नही

पलो को समेटने का मन
तेरे करीब लाता है
तुझे पास ना पाकर
वापिस लौट आता है
याद कुछ और भी आता है
फिर अकेला मै हो जाता हूँ

तू सितारा है उस आसमान का
जिसमे साथ है और सितारो का
मै तो धरती पर खडा
देखता हूँ नम आंखो से
जानता हूँ तुझ तक
पहुंचना मुमकिन नही
फिर भी आस है मन की,
दूर जाती नही

मौसम बदलते है जब
आसमां भी रंग बदले
छुप जाते है सितारे
मन मेरा बस तुझे पुकारे

आप को चाँद से है प्यार
हम को आपसे है प्यार
चांद से बाते होंगी
शरारते भी होंगी
शायद एक दिन
मिलन भी होगा
हम कुछ न कहेंगे
सिर्फ तुझे देखते रहेंगे  

हम फिर भी रहेगे
तेरे ही इंतजार में
शायद फिर देख पाऊँ
अपने प्यार को
एक नज़र भर
एक नज़र भर

-          प्रतिबिंब बड़थ्वाल 

शनिवार, 14 मई 2011

फेसबुक में ‘टैग’




फेसबुक तू और तेरा हर रूप लगे हैं हमें महान
कभी देता हमें खुशी, कभी कर देता हमें हैरान
चित्रो, नोट्स व वीडियो का करते आदान प्रदान
अपने ग्रुप व  पेज से कराते  एक दूजे को पहचान

फेसबुक  ‘टैग’ का तूने किया है इनमें सुंदर प्रयोग
हमने  भी जब चाहा, किया इसका खूब  उपयोग  
बेझिझक कर देते हैं, हम सब में शामिल उनको
जिन्हें समझा मित्र या समझा है अपना जिनको

कुछ मित्र तो झाँकते भी नहीं चाहे कर लो कितने टैग
कुछ मन से, कुछ बेमन से लगा जाते हैं पंसद का भोग
कुछ मित्र ‘टैग’ से झुँझला कर देते हैं लिस्ट से हमें दफा
सेटिंग वो बदल सकते नहीं लेकिन हम से हो जाये खफा
  
सीमा है ‘टैग’ की वरना कितने हो जाते इससे परेशान
फिर भी ‘’टैग’ करो बिंदास, कर जाते स्नेही मित्र ऐलान
अपना जान कई मित्र कर जाये हमें खुश देकर प्रोत्साहन
कुछ मन से प्रतिक्रिया देते,करते नहीं इसका वो कोई गुमान

वैसे सच कहूँ, मेरे लिए ‘टैग’ तो एक बहाना है
असल में बस कुछ पल आपसे यूँ रूबरू होना है
कुछ अपनी कहनी है और कुछ आपकी भी सुननी है
आज फिर टैग होंगे आप, ये कविता भी तो पढ़वानी है ।

   -     -   प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

शुक्रवार, 13 मई 2011

मेरी कविता




इसमें मै भी हूँ
इसमे तुम भी हो
इसमे घर भी है
इसमे परिवार भी है
इसमे समाज भी है
इसमे देश भी है
और विश्व भी है

मेरी कविता मे सब बतिया है

एकांत मे
कलम लिखती जाती है
कभी इसमे
प्रेम जागृत होता है
कभी इसमें
आक्रोश दिखता है
कभी इसमें
कुछ् सवाल होते है
कभी इसमे
खुद उत्तर बन जाता हूँ
कभी इसमे
एक टीस उठती है
कभी इसमें
असहाय नज़र आता हूँ
कभी इसमे
खुशी है तो कभी गम है

मेरी कविता मे सब बतिया है

जहां तक मेरी नज़र जाती है
जहां तक मेरी सीमा दिखती है  
जहां तक मेरी सोच ले जाती है
जहां तक जबाब मिल जाते है

मेरी कविता मे सब बतिया है

मेरी कविता तो मौसम है भावो की
मेरी कविता तो प्रतिबिंब है भावो की
मेरी कविता तो अहसास है भावो की
मेरी कविता तो खुशबू है भावो की

मेरी कविता मे सबकी बतिया है


-       प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शुक्रवार, 6 मई 2011

~ मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है ~




[फेसबुक के पन्ने ' शेर-ओ-शायरी' के सदस्यो ने एक रचना साथ मिलकर लिखी,साथ देने वाले मित्रो के नाम नीचे लिखे है ]

तेरे वादे अब झूठे लगने लगे है 
वक्त बेवक्त हम उलझने लगे है 
प्यार के रंग क्यो उतरने लगे है 
मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है [१]

ख्वाब निगाहों में नए सजाने लगें हो 
दिल मे किसी और को बुलाने लगे  हो
क्यो अहसास हम से छिपाने लगे  हो,
मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है [२]

तेरी खुशबू से हम महकने लगे थे  
दीवानों की तरह तुझे ढूँढने लगे थे  
अब क्यों तुम हम से छिपने लगे हो 
मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है [३]

तेरी आंखों मे अक्श बदलने लगा है 
प्यार  के माने अब कम होने लगे है 
क्यों हम अब इतने बुरे लगने लगे है 
मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है [४]

तेरी बाते हमे अब सताने लगी है 
करके वादे क्यों भूल जाने लगे हो 
देख कर हमे क्यों मुँह मोड़ने लगे हो 
मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है [५]

तेरे लिए दिल मे मुकाम बनने लगा था 
तेरे लिए ही अब ये सर झुकने लगा था 
क्यों इस दिल से अब खेलेने लगे हो
मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है [६]

करीब होकर भी कही खोने लगे हो
हर बात पर झुंझलाने से लगे हो 
तुम पराये से क्यों लगने लगे हो
मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है [७]

ख्वाब हमारे अब जुदा होने लगे है 
वफा के रंग अब शायद मिटने लगे है 
क्यो फासले अब दरमियाँ बढ़ने लगे है 
मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है [८]

अपनों के बीच अकेले लगने लगे है 
पूछे कोई तो अब हम हँसने लगे है
दिल पर जख्म क्यो करने लगे हो 
मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है [९]

तुम वही हो जिसे हम चाहने लगे थे..
अब तेरे इंतज़ार में लब सूखने लगे है 
बीते लम्हे क्यों  सवाल करने लगे है 
मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है १०]

आज क्यो  इतना इतराने लगे हो
गैर का साया साथ दिखने लगा है  
देख दुनिया,क्यों तुम बदलने लगे हो 
मेरे अहसास तुझसे ये पूछने लगे है [१]
*************************************************
सहयोग देने वाले सदस्य :

१. प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
२. राकेश देशवाल 
३. सन्नी कश्यप 
४. मिर्ज़ा आज़ाद 
५. रेनू मेहरा 
६. निधी गुप्ता 
७. सपना [Dream Lady]
८. रश्मी शर्मा 
९. ज़ेहरा आली 
१०. सचिन पाराशर 

-  प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

रात ने कहा


जाती हुई रात ने पूछा
कैसी थी रात 'प्रतिबिंब'
हमने भी कह दिया
रात गई बात गई
अब तो उगते सूरज
को सलाम किया है

अब अपनों से
रूबरू हो सकूँगा
जो सपना देखा
उसे सजाने के लिए
कर्म तो करना होगा
बस शर्त इतनी रखी है
स्वयं से वादा किया है
जो करूंगा दिल से करूंगा
ईमानदारी से करूंगा
अपनी मुस्कराहट के लिए
दूसरों के चेहरे पर
मुस्कराहट लाऊँगा।

ये रात चल जाने दे अब
फिर तुझसे मिलना होगा
तुझ से सब कहकर
खुद को समझाऊंगा
फिर तुझ से लिपट कर
मैं  फिर सो जाऊंगा

- प्रतिबिंब बड्थ्वाल

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

अदला बदली


चल खेले खेल
अदला बदली का
तू डाल - डाल
मै पात - पात

तू मै बन जाऊँ
मै तू बन जाऊँ
तेरा गरुर मै ले लूँ
मेरा सरुर तू ले ले

दे दे मुझको
अपना मन
अपना दिल
अपनी  खुशी

मै तुझे देता हुँ
अपना प्यार
अपना इकरार
अपना अंतर्मन

अब देखो जो कहना
कहने से पहले सोच लेना
और जो मै कहूँगा
उसे भी तुम सुन लेना

अरे...
खेल शुरु होते ही
तुमने हार क्यो मान ली
मैने तो तुम बनकर
तुम्हें जीत दे दी
अपनी हार स्वीकार ली

तुमने वही किया
जो मैंने किया
हार कर भी
हम जीत गए
एक दूजे को
शायद
अब समझ गए

अब ना कहना ....... 

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

आज भी जारी है.....


आज भी जारी है.....

लिखने से भी क्रांति आती है
कभी इससे भ्रांति हो जाती है
लिखने से समाज बदल सकता है
इससे देश की सोच बदल सकती है

आज मैने सोचा कि
मै भी कुछ सिखा पाऊँ
या किसी को बदल दूँ
अपने लेखो से
अपने विचारो से
अपनी कविताओ से।

मै शायद अपने में
पूर्ण नही
फिर भी दूसरे को
बदलने का दम भरता हूँ
अपनी सोच को
लोगो पर थोपने
का अथक प्रयास करता हूँ

फिर एक सोच जागृ्त हुई
इंसान कोई हिन्दू है कोई सिख है
कोई इसाई है तो कोई मुस्लिम है
सबके अपने ग्रंथ है,पवित्र पुस्तके है
सभी उसे मानने का दम भरते है
पढे या ना पढे लेकिन अपना कहते है
जब वो सिंद्धांत किसी को बदल ना पाये
वो विचार किसी को मार्ग ना दिखा पाये
उस सत्य को जब कोई पहचान ना पाये
प्रेम और सीख को कोई जब अपना ना पाये
गीता, कुरान, बाईबल और गुरु ग्रंथ
जो ना कर पाये
क्या मेरे ये काले अक्षर उनको बदल पायेगे
क्या मेरे विचार और सोच उनको बदल पायेगे

फिर भी
मेरा प्रयास और लिखना निरंतर जारी है
बुरे और अच्छे को लिखना आज भी जारी है
सिखा तो नही पाऊँगा लेकिन लिखना जारी है
स्वयं को स्वयं का आईना दिखाना अभी जारी है
जीवन के हर मोड पर मेरा सीखना आज भी जारी है

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

अन्ना की आंधी




भ्रष्टाचार को खतम करने के लिए लोकपाल बिल के ड्राफ्ट को तैयार करवाना और फिर उसको पास करवाना इस मुहिम का मुख्य लक्ष्य था। जिसे अन्ना के इस आंदोलन ने जन समर्थन पाकर पहली सीढ़ी चढ़ी है। समर्थन ज्यादा था इसलिए सरकार को झुकना पड़ा। शांति रूप से किया गया ये जन आंदोलन एक मिसाल बना स्वतंत्र भारत मे। इसके बाद विरोध के स्वर भी उभर रहे है लेकिन उन्हे नज़र अंदाज़ किया जा सकता है क्योकि इस मुहिम की सार्थकता मे सच और जनशक्ति का बोलबाला था। आज कई नेता यहाँ तक की जो सरकार की ओर से उस कमेटी मे शामिल है वह भी सवाल उठा रहे है । कारण एक ही है की वे खुद अपने गले मे फांसी का फंदा लटका देख रहे हैं। बस खुशी है की सरकार को कम से कम झुकना पड़ा और आज पैतरा बदलते है तो जनता उन्हे इसका मज़ा जरूर चखायेगी। 

आज की पीढ़ी ने नमक सत्याग्रह या  साइमन वापिस जाओ आदि के बारे मे पढ़ा या सुना था अब तक लेकिन अब उस जज्बे को स्वयं देखा व महसूस किया देशभर मे,जिसमे मैं  भी शामिल हूँ । एक जन सैलाब उमड़ा और लोगो मे एक उत्साह दिखा। आक्रोश लेकिन सयंम से और एक आवाज़ मे पूरे भारत मे देखने सुनने को मिला। अब रास्ता खुल गया है अब स्वयं से वादा ज्यादा सार्थक सिद्ध होगा और अपनी सोच मे परिवर्तन लाना होगा अपने दैनिक जीवन मे 

१  स्वयं  किसी भी प्रकार की रिश्वत नही लेंगे और ना ही देंगे  - यही हमारी कमजोरी है जो येसे लोगो को बढ़ावा देते है। 
२  अगर कहीं आपको लगता है की येसा कुछ हो रहा है तो  उसकी सूचना आर टी आई या इन जैसी संस्थाओं के पास तुरंत दे जो इस मुहिम से जुड़े है ताकि एक सही तरीके से उन लोगो से निपटा जा सके। 

इसके लिए दोनों [रिश्वत लेने और देने वालो ]को सज़ा का भी कानून बने। 

देखा की आर पी आई के लोगो ने तोड़ फोड़ की अनुपम खेर के घर पर..... इन राजनीतिक दलो को अभी भी सबक नही मिला की शांति से बहुत कुछ किया जा सकता है। सब राजनीतिक दलो को इस तरह के आंदोलन द्वारा ही विरोध करना सीखना चाहिए। आंदोलन को क्रमबद्ध तरीके से अपनाना जरूरी है।  
लोकपाल बिल के बाद इन लोगो को भी सबक सिखाना होगा .... इन सब बातो के लिए अपनी सोच को हमें नये सिरे से सोचना होगा। नेताओ और सरकार को सोचना होगा इस बारे मे ....

१ विरोध शांति पूर्ण ढंग से हो 
२ मार्च और उसके रास्तो  इत्यादि की सूचना अग्रिम होनी चाहिए जिससे पहले ही मीडिया अखबार द्वारा लोगो को बदले रास्तो के बारे मे अवगत करा जाये।
३ दुकानों आदि को जबर्दस्ती बंद कराने वाले  को भी  दंड का प्रवधान
४ तोडफोड करने वालो और राष्ट्रीय संपति को नष्ट करने वालो को गैर जमानती वारंट,कड़ा जुर्माना एवं सज़ा होनी आवश्यक है[इस बाबत कानून तो हैं लेकिन इतने कड़े नही की लोग इससे से डरे]
५ प्रदर्शन होनी वाली जगहों के अस्पताल व बैंक  इत्यादि को विशेष सुविधा दी जानी चाहिये। आवश्यक सेवाओ मे अवरोध पैदा करने वालो को कड़ी से कड़ी सज़ा लागू होनी चाहिये। 

इन सभी मे सबसे जरूरी है की इन की सुनवाई फास्ट ट्रेक कोर्ट के द्वारा तय सीमा के अंदर ही हो, यह संभव इसलिए भी है की आजकल मीडिया हर जगह है [उन्हे इसमे अहम माना जाना चाहे जो लाइव इनका प्रसारण कराते है ], गवाहो को सुरक्षा जब तक केस का नतीजा नही निकलता है.... आम जीवन मे तो सुरक्षा मे कितनी तत्पर है हमारी पुलिस या अन्य सुरक्षा कंपनिया  ये हम सब जानते है भुगत रहे है रोज़। 

- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल
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