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गुरुवार, 26 जुलाई 2012

लहू का ये रंग




[एक पुरानी रचना  - आज विजय दिवस पर शहीदो को समर्पित ]

लहू के दो रंग एक गम है तो एक खुशी
वतन पर कुर्बान होते है शहीद खुशी खुशी
दुख झेलकर हमे देते रहे वो सारी खुशी
आज़ादी को खून से सीचा उन्होने खुशी खुशी

हमारा खून अभी सस्ता नही हुआ है
उस मां से पुछो जिसने बेटा खोया है
समेट दुख के आंसू अर्थी पर फूल चढाये है
देश की खातिर आंचल को अपने कफन बनाया है

इतिहास गवाह है, पन्ने खून से है रंगे हुये
हमे आज़ादी देकर खुद है धरती मे सोये हुये
धन्य है येसे वीर जो शहीद हुये वतन के लिये
जिसकी खातिर कुर्बानी दी उसी मे है लिपटे हुये

धर्म और कर्म की खातिर भी खून बहाया है
दे लहू इन वीरो ने धर्म और समाज को बचाया है
बहा खून इतिहास मे नया अध्याय बनाया है
होकर फ़ना हमें जीने का नया रास्ता दिखाया है

जय हिंद !!!!! नमन शहीदो को
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
 

बुधवार, 18 जुलाई 2012

मैं सीता मैं द्रौपदी ...... जरा सुन लों





क्यों आज तुम हमे इतना याद करते हो
जो हुआ भी नही वो भी तुम सोच लेते हो
तुम को सिखलाने हमने कितने रूप धारे थे
सीखे तो कुछ नही पर हमे बदनाम करते हो

हमने तब भी नारी शक्ति का परिचय दिया था
सिखलाने तुमको हाँ हमने कुछ अपमान सहा था
क्यों, कैसे ये हुआ इसका कारण भी बतलाया था
सीख न सके न सही, गलतियो का न दुष्प्रचार करो

त्याग, ममता, स्नेह और आदर का ताना - बाना था
सत्य - असत्य का भेद तुम्हें हमने तब समझाया था
कभी सीता कभी द्रौपदी बन स्त्री का हर रूप दिखाया था
अपमान जब भी हुआ, उस भाव का हमने संहार किया था

हर पात्र एक मर्यादा था उस पर ही जीता - मरता था
पर उसे ढाल बना तुम आज अपमानों का बाज़ार सजाते हो
जानते हो तुम, आज वो युग बीत गया और तुम बदल गए हो
लेकिन केवल आज अपनी खातिर हमे ही क्यों मोहरा बनाते हो

हम उस वक्त भी कमजोर नही थे और आज भी तुम लाचार नही
नर - नारी अलग नही,  त्याग - ममता मे हम थोड़ा बेहतर सही
हमने कुछ किया और कुछ सहा केवल तुम्हें बतलाने की खातिर
आज तुम अपने बल कुछ कर जाओ अपनी अगली पीढ़ी की खातिर

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

शनिवार, 14 जुलाई 2012

मेरा आज का परिचय




मैं तो अपने घर मे सकुशल रहता हूँ 
आस - पास जो होता है देखता रहता हूँ
कभी गुस्सा तो,  कभी प्रेम जतला देता हूँ
तर्क - वितर्क भी अब मैं अच्छा कर लेता हूँ 
सबको कर्तव्य पाठ पढ़ा,वहाँ हिस्सा बन जाता हूँ
कभी तो कुतर्क का सहारा भी ले बात कह देता हूँ
कभी हाँ मे हाँ मिला, कभी ना मे ना मिला लेता हूँ
कभी अपने समाज को कभी एक वर्ग को कोस लेता हूँ
कभी आज़ादी के नाम पर जो मन मे आए वो करता जाता हूँ
कभी बदलाव के नाम जो आज़ादी दे वो सभ्यता अपना लेता हूँ
खुद कुछ कर नही पाता इसलिए उम्मीद व आशा दूसरों से रखता हूँ
अपने संस्कार और संस्कृति को कोस मैं अब 'लिबरल' कहलाता हूँ
कुछ बाते अपने फायदे की यहाँ वहाँ से उठा तोड़ मोड लेता हूँ
सीखा कुछ नही उनसे पर अपवाद को ढाल बना जी लेता हूँ
अत्याचार सहन नही लेकिन हो तो गूंगा-बहरा बन जाता हूँ
सरकार, राजनीति व नेताओं को मौका मिले कोस लेता हूँ
भ्रष्टाचार से खफा पर अपना काम करवाने रिश्वत देता हूँ
देश मे बढ़ रहे अपराधो को देख, मैं चिंता कर लेता हूँ
अपना काम निकाल कर फिर मैं सभ्य बन जाता हूँ
बिन सच जाने मैं केवल भीड़ बन तमाशा देखता हूँ
आज मित्रों मैं खुद से खुद का परिचय दे रहा हूँ

प्रतिबम्ब बड़थ्वाल 

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

सुनो !! अतीत कुछ कह रहा


हे मानव
तू मुझे छोड़
दौड़ता जा रहा है
बस अपनी ही धुन में

ये सच है की
मैं ही तुम्हें आगे बढ़ाता हूँ
पर तुम तो
मुझे धकेलकर
आगे दौड़ रहे हो

जानता हूँ
रुकना तेरी नियत नही
मुड़ कर देखना फितरत नही
पर तुम तो
स्नेह आदर संस्कृति संस्कार
का तिरस्कार कर चुके हो
इंसानियत का गला घोट चुके हो
बस अपने नाम के लिए
मुझे ही बदनाम कर रहे हो
स्वार्थ और धोखे की चढ़ सीढ़ी
खुद को ऊंचा समझ मुस्कराते हो

सिखलाने तुमको जीवन सत्य
सिखलाने तुमको जीवन मूल्य
परंपराओ का लिया सहारा था
आज सफल हुये जो जीवन मे
तब भी मुझ पर अंगुली उठाते हो
खुद कारण बने असफलता का
अब कारण मुझे बताकर कोसते हो

वैसे तुम पर एतबार कैसा ?
ममता का झूठा ढोंग करते हो
ममता की मूरत कन्या को
तुम जीवन से पहले मौत देते हो
जंन्म देकर पाला पोसा जिसने
तुम उन्ही को तिरस्कृत करते हो
हर सुख त्याग, प्यार और खुशी दी जिसने
अपने सुख की खातिर दुखी उनको करते हो
फिर भी निवेदन है तुमसे
कन्या को जीवन दे लक्ष्मी घर आने दो
माँ - पिता को हर पल खुद मे जिंदा रखो
इन रिश्तो की डोर को अतीत मत बनने दो

मैंने चलने से, कब तुमको रोका है
तुम्हारे आगे बढ्ने से तो, मैं वजूद मे रहता हूँ
अतीत बनकर, जिंदा रहूंगा सदा
बस एक विनती है, धीरे चलना
इस आज को भी, तो अतीत बनना है
जो मैंने सिखाया, तुम उसे भूलना नही
प्यार और सम्मान का हक, तुम सबको देना
परंपराओ को अपनी, अपवाद मत बनने देना
अपनी संस्कृति संस्कार का परिहास करना नही
जीवन मूल्यो को अपनाना, उनसे खेल खेलना नही
अच्छे बुरे का स्मरण कर लेना, सच को बस अपना लेना
अतीत हूँ, पर याद रखना आज भी तुम्हें कुछ सिखला जाऊंगा

- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल

गुरुवार, 28 जून 2012

ॐ साईं



ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ॐ साईं 
तेरी महिमा सबने हर रूप में गाई ॐ साईं
तेरी भक्ति मे सबने खुशी अपनी पाई ॐ साईं
जो बन पड़ता तुझसे देता तू सबको ॐ साईं 
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ॐ साईं

कोई गाता तेरी आरती  ॐ साईं 
कोई तुझ पर पुष्प चढ़ाये ॐ साईं 
कोई धन का दान करता ॐ साईं 
मैं तुझे बस मन मे रखता ॐ साईं  
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ॐ साईं

हर पल तू सबको राह दिखाता ॐ साईं
किसी भी रूप मे दर्शन दे जाता ॐ साईं
हर पंथ का बंदा है तेरा अनुयायी ॐ साईं 
सबके मन की आवाज तू सुन लेता ॐ साईं
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ॐ साईं

कहने को शिरडी मे है निवास तेरा ॐ साईं 
बसता है तू सब भक्तों के दिल मे ॐ साईं 
हर भक्त से अनूठा है रिश्ता तेरा ॐ साईं  
पर सबसे अलग है नाता मेरा तेरा ॐ साईं
ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ॐ साईं

---- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ----

सोमवार, 25 जून 2012

लम्हा - लम्हा आओ फिर से जी जाएँ




कौन - कौन है अपना यंहा, किस - किस ने दिया साथ
कंहा - कंहा अपना ठिकाना, किस - किस ने थामा हाथ

चुन - चुन कर दोस्त बनाते, बुन - बुन कर रिश्ते संवारते
कण - कण प्रेम का हम सजाते, जन - जन को अपना कहते

आज - कल का भेद ना जाने, कल - परसो के लिये आज बिगाड़े
धर्म - अधर्म का पाठ रोज़ पढते, पल - पल धर्म से हम नाता तोड़े

इधर - उधर की बातों मे कान लगा, जन - मानस की करते बात
सुध - बुध खो बिखर रहे, क्षण - क्षण दुश्मनी की बैठ रही बिसात

तेरा - मेरा बना अब रिश्ता,  उलट - पुलट हुआ देखो सब विधान
अपने - पराये का बस छेडते राग, करते - करते छोड जाते निशान

तन - मन में आओ प्रेम जगाये, घर - घर में देश प्रेम की जोत जलाएँ
जन - जन को अपना हम बनाएँ, लम्हा - लम्हा आओ फिर से जी जाएँ

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

रविवार, 17 जून 2012

वो





मैं इठ्ठला रही थी
वो मुझे शायद देख रहा था
मैं शर्मा रही थी और
वो बस शरारत कर हा था

की बातें
मुझे तरसा रही थी
की अदाये
मुझे बुला रही थी

मैं भी मन
अपना बना चुकी थी
बस के एक इशारे को
हर पल तरस रही थी

दिल की उलझन को
अकेले सुलझा न पा रही थी
वक्त को परख रही थी
प्यार उसके लिए समे रही थी

इशारा मिल ही गया
इंतज़ार को राह मिल ही गई
बसाया जिसे हृदय में
आज उसके हृदय में बस गई ...

[ एक भाव प्रेम की आस से प्रेम के पास तक ]               
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

गुरुवार, 24 मई 2012

सरकार की चाहत




पेट्रोल के दाम बढ़ने से जनता आहत है
तिल तिल कर मारना सरकार की चाहत है
शायद है यकीन उन्हे इस बार दुबारा सत्ता न पाएगी
इसलिए जनता को रुलाने सरकार यही चाल अपनाएगी

समय है कम अब अगले चुनावों मे, तो कैसे जाए पैसा ज़ेबो मे
सोच रही सरकार किंसकों हम फायदा दे, जो फायदा दे अगले चुनावो मे
जनता को तो हर बार बकरा बनना है जब खेल रहा सारा तंत्र इनके हाथो मे
बतला दिया तेल माफिया से प्यार दिखला कर, खोट कितना है इनके नेक इरादों मे

महंगाई से हमे डर लगता नही साहब, डर लगता है इनकी बढ़ती  इच्छाओ से
वोट पाकर जिनका सत्ता की कुर्सी पाते है, खेल रही सरकार फिर उन्ही के जज़बातो से
कोई पूछे तो ये इक्नॉमिक्स समझाने लगते है, महंगाई और जनता तो जाए उनके ठेंगे से
भीख मांगने आने वाले है अगले चुनावो मे, औकात दिखा दो तुम इनको अपनी वोट की ताकत से

(प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल)

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

प्यार में ........ कोई




प्रेम का क्या मोल दे सकता है  कोई
इस में तो बेदाम बिकता है हर कोई

इश्क़ में आसानी से गिरफ्तार हुआ कोई
करके सैकड़ो जतन, तब पाता इसे कोई

प्यार संग दुनिया की परवाह नही करता कोई
अपनों को ले संग, प्यार की राह चलता कोई

शौक से अब सजने सँवरने लगता है कोई
ये पल यहीं थम जाये दुआ करता है कोई

ख्याल उसके इर्द - गिर्द बुनता कोई
शोर में भी उसकी आहट सुनता कोई

प्यार को कई  नाम दे देता है कोई
एक ही नाम से खुश रहता है कोई

इंकार  इकरार का लुत्फ लेता है कोई
खुशी - गम का हिसाब रखता है कोई

तनहाई में बेसब्र हुआ जाता है कोई
आंखे मूँदकर यादों में खोया है कोई

उससे मिलन की आस बढ़ा जाता है कोई
बिछुड़ने के डर से ही घबरा जाता है कोई

कानो में पायल की झन्कार सुनता है कोई
महक हर पल उसकी महसूस करता है कोई

दूर रहकर भी पास उसे अपने पाता है कोई
पास रहकर भी उसी के ख्याल में गुम है कोई

संदेश लिखकर इंतज़ार फिर करता है कोई
इंतज़ार में उसके प्रेम गीत लिखता है कोई

मोहब्बत को इबादत समझ पूजता है कोई
पाकर प्यार को, खुद पर इठलाता है कोई

बारिश में भीग तन मन भिगो रहा है कोई
हर मौसम में मोहब्बत को जी रहा है कोई  

नाम संग तब्बसुम बिखेर देता है कोई
छू लेने भर से ही पिघल जाता है कोई

खामोशी में भी उसे गुदगुदा जाता है कोई
छेड़ कर, गालो को लाल कर जाता है कोई

प्रेम के प्याले आंखो से पिलाता है कोई
झील सागर कह इनमे डूब जाता है कोई

चाँद से बात व शिकायत करता है कोई
सितारो को भी हमसफर बनाता है कोई

दिन में भी ख्वाब सजाने लगता है कोई
रातों को ख्वाब पूरे करने लगता है कोई

बैठ बगिया में, बाहें  डाल  बतिया रहा कोई
हाथो में ले हाथ, अपनों से वादा ले रहा कोई

सहला कर बाल, अंगुलियाँ फेर रहा है कोई
मिटा कर नाम बार - बार लिख रहा है कोई

अहसास संग अपनी नीद उड़ा रहा है कोई
पाकर साथ नींद में भी मुस्करा रहा है कोई

कभी चैट तो कभी फोन पर  इश्क लड़ा रहा कोई
करके मीठी मीठी बातें मोहब्बत समझा रहा कोई  

छोटे बड़े तौहफ़े देकर प्यार जता रहा है कोई
देकर  गुलाब दिल से दिल मिला रहा है कोई  

अपनों से ही सब बातें छिपाने लगा है कोई
हो  कर मगन गीत  गुनगुनाने लगा है कोई

कुछ याद आते ही अंगड़ाई लेता है कोई
कुछ  सोच  कर ही शरमा जाता है कोई

तन से  मिलन के साज छेड़ता है कोई
साज पर मिलन की धुन गाता है कोई

अहसास एक होने का पल समेटता है कोई
तृप्त हुआ तन - मन लबों से बताता है कोई

प्रेम रंग में रंग अपने रंग भर देता कोई
इस रंग मे रंग कर भी छुपा लेता है कोई

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

एक सिपाही



मेरी रूह में भी बैठा एक सिपाही है
बस जरुरत थोडा उसे जगाने की है
ये अलग बात है की मैंने उसे खुद सुलाया है
देख रहा सब आँखे मूँद दिल को समझाया है
देश से ज्यादा खुद से नाता मैंने जोड़ा है
हर नियम कायदे को मैंने तो बस तोड़ा है
हो कोई भी अपराध घटना या दुर्घटना कही
खुद को छिपाकर चुप रहने को ही माना सही
खून खौलता है मेरा देख दुश्मन की तिरछी नज़र
कुछ छण सोचकर फिर चल पड़ता हूँ अपनी डगर
ये भी नहीं की मैं येसा कुछ कर सकता नहीं
पर क्या करूँ मुसीबत सोच गले लगाता नहीं
अपनों के दुःख पर जब तड़प उठता हूँ
फिर क्यों देश समाज से यूँ दूर रहता हूँ
आज सोच और कलम में आत्मा जिन्दा है मेरी
बस एक सिपाही का दिल मिले ये जरुरत है मेरी

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
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