मन बहुत उतावला होता है। इसमे न जाने कितने सवाल उठते है या जबाब मिलते है। चाहे उनमे मै स्वयं ही घिरा हूं या फ़िर समाज या देश के प्रति मेरी उदासीनता या फ़िर जिम्मेदारी। आप भी मेरी इस कशमकश के साथी बनिये, साथ चलकर या अपनी प्रतिक्रिया,विचार और राय के साथ्। तेरे मन मे आज क्या है लिख दे "चिन्तन मेरे मन का" के पटल पर यार, हर पल तेरी कशिश का फ़साना हो या फ़िर तेरी यादो का सफ़र मेरे यार।
गुरुवार, 16 जुलाई 2009
मेरा वतन
मंगलवार, 14 जुलाई 2009
मुश्किल है अपने से दूर करना

आसान है तुमको गले लगाना
मुश्किल है अपने से दूर करना
आसान है प्यार का इजहार करना
मुश्किल है तुम बिन इंतज़ार करना
आसान है तुम से नज़रे मिलाना
मुश्किल है तुम से नज़रे चुराना
आसान है तुमसे प्यारी बाते करना
मुश्किल है तुम से रुठ कर बैठना
आसान है तुम से दोस्ती करना
मुश्किल है तुम से बेवफाई करना
आसान है तुम पर अहसान जताना
मुश्किल है तुम से अहसास छुपाना
आसान है तुम रुठो तो मनाना
मुश्किल है तुम से फासले बनाना
आसान है तुमको नज़रो में बसाना
मुश्किल है अपने से दूर करना
- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
(यह भी एक पुरानी रचना है)
मंगलवार, 7 जुलाई 2009
तुमसे बिछड़ा तो ऐसा लगा

रेगिस्तान सा आभास लगा
होश अपने खोने लगा
जोश मेरा हिलने लगा
रेत का असहाय टीला
चारो ओर फ़िर भी गी्ला
रेत के बिखरते कण
दर्द के बिलखते क्षण
यादों का बहता सैलाब
फ़िर भी ना मिलते जबाब
पल-पल उखड़ती सांस
सहारा ढूँढती रही आस
इस मरुस्थल में जाना
प्यार का अपना फंसाना
तुमसे दूरी का अहसास
और पास होने का आभास
बुधवार, 1 जुलाई 2009
फ़िर क्या बदला?

बीत गये कुछ लमहे
अब रात होने को आई
क्या अलग था कल से
सोचने लगा इस शाम से
कुछ भी नहीं बदला
क्या बदला मैं ?
क्या बदले तुम ?
क्या बदल गये वो ?
बदला तो क्या बदला ?
फिर क्या बदला ?
तुम वही, मैं वही
फिर क्या बदला ?
भूख वही, प्यास वही
रविवार, 28 जून 2009
कैसे ?

दूरियां दर्मियां होती तो
पास तुम्हारे हो्ता कैसे?
आंखे मिलती नहीं हमारी तो
इन आँखो में बसाता कैसे?
तुमसे अनजान होता तो
अपनी जान बनाता कैसे?
आवाज सुनी ना होती तो
प्यार के स्वर सुनता कैसे?
इंतजार किया न होता तो
मिलने का पल समेटता कैसे?
अहसास रुक जाते तो
सांसे यूं समाती कैसे?
प्रीत तुमसे की न होती तो
गीत मन के लिखता कैसे?
शुक्रवार, 26 जून 2009
इसे क्या कहेंगे आप?

मंगलवार, 23 जून 2009
सिसकियां लेती है मन की वेदना

झुंझलाती रहती है अपनी चेतना
हर मोड़ पर दिखते हैं अब बिखरे कांटे
ना जाने क्यों दिल से दिल को हम बांटे
प्यार का करते रहते है हम सब ढोंग
लेकिन हैं दुश्मन एक दूजे के हम लोग
खून मानवता का अब और सस्ता हुआ
जीना बेसुध दुनिया में और महंगा हुआ
अंगड़ाई जोश की लेती तो है जवानी
स्वार्थ कि खातिर बन जाती नई कहानी
फ़ैशन बन कर अब विलुप्त हो रही खादी
मूक रहकर खुली आंख से देख रहे बर्बादी
कुछ हक़ीकत है, कुछ है फंसाना
फ़िर भी जीने का ढूंढ़े हम बहाना
शुक्रवार, 19 जून 2009
आईना

जिंदगी का आईना
हर वक्त बदलता है
आईने के सामने
बनाते बिगाड़ते चेहरे
कल के चेहरे में
आज का रंग भर देते हैं
कल की पहचान बना देते है
आईना झूठ नहीं कहता
चेहरे का सच हम जानते है
फिर भी कल को छोड़
कल को देखते है
आज की तस्वीर बनाते है
कल को बदलने की चाह में
आइने में आज संवारते है
आईने की सच्चाई
मन में फ़िर भी रहती है
झूठ को कचोटती है
लेकिन सच को छुपाती है
फिर आँखे मूँद सपने सजते है
प्रशन भी आज उठते है
हकीकत किस से छिपा रहे हैं?
मंगलवार, 16 जून 2009
देखता क्या मन

सोचता क्या मन
कुछ खेलता मन
कुछ झेलता मन
हँसता हुआ मन
रोता हुआ मन
कुछ बोलता मन
प्यार करता मन
सवाल मन में
जबाब मन में
तनाव मन में
लगाव मन में
असहाय सा मन
अकेला सा मन
बुदबुदाता मन
गुनगुनाता मन
मन मेरा ना माने
क्या कहे ना जाने
कोई सीमा नहीं मन की
कहानी ये मेरे मन की
शनिवार, 13 जून 2009
सोचता था

सोचता था,
कुछ करूँगा अपने लिए
कुछ समाज के लिए
कुछ देश के लिए
क्या मालूम था
ये टूट जायेंगे शीशे की तरह
कोसा पत्थर को
जिसने मेरे अरमानो के
शीशे को चूर किया
अरे !! ये तो पत्थर है
इसका क्या दोष
जिसने ये पत्थर फेंका
न जाने उसके पास मेरे लिए
क्या अरमान थे
दोष तो मेरा है
जिसने पत्थर को पास आने दिया
सोचा इस शीशे को
जोड़ दूँ जाकर, नया आकर दूँ इसे
परन्तु ये तो बिल्कुल टूट चुका है
सोच रहा हूँ कहीं डाल दूँ जाकर
नही तो ये मुझे , समाज और देश को
दुःख पहुंचाएंगे जिनके लिए
मेरे बहुत से अरमान थे .......
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
( यह रचना भी डायरी के पन्नो में दर्ज थी, आज इसे खुला वातावरण मिला)