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शनिवार, 12 दिसंबर 2009

१३ दिसम्बर याद आये डा. पीताम्बर दत्त बडथ्वाल (हिन्दी के प्रथम डी लिट)













डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल (१३ दिसंबर,१९०१ - २४ जुलाई,१९४४)

पाली ग्राम (उत्तराखंड) में हिन्दी का जन्मा लाल
कर शोध हिन्दी में पहली बार सबको दिखाई नई राह
बने प्रथम भारतीय् जिन्होने डी.लिट हिन्दी में पाई
नाम इस साहित्य्कार का था डा.पीताम्बर दत्त बडथ्वाल

हिन्दी काव्य मे निर्गुणवाद पर कर गये वो शोध
संस्कृत,अवधी,ब्रजभाषा अरबी व फारसी का था उनको बोध
संत,सिद्ध,नाथ और भक्ति का किया उन्होने विश्लेषण
दूर दृष्टि के थे वे परिचायक,निबंधकार और थे वे समी़क्षक

हिन्दी को नया आयाम दे गया ये हिन्दी का सेवक
कर गया दुनिया मे नाम हिन्दी का ये लेखक
छात्र करते है शोध आज भी पढ उनकी रचनाये
कह गये जो वो उसे लोग आज भी अपनाये

अल्प आयु मे कह गया अलविदा वो हिन्दी का नायक
दे गया धरोहर हमे गोरखबाणी और नाथ सिद्धो की रचनाओ का
आज भले ही भूल चुका है उन्हे हिन्दी का साहित्य समाज
हिन्दी का सम्मान करे, कर याद इस लेखक को आज.


- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
(पुरानी पोस्ट भी देख सकते है आप लोग डा.पीताम्बर दत्त बड्थ्वाल जी पर http://merachintan.blogspot.com/2009/09/blog-post_30.html

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

उनकी याद्

उनकी याद्…………

क्षितिज की ओर निहारती नज़रे
शांत समुन्दर की मस्त लहरे
बरबस ही उनकी याद दिला जाती है
उनको भूलने की नाकाम कोशिश

फ़िर मन में एक आस जगा जाती है
मन फ़िर मन नहीं रहता
प्रेम में वशीभूत हो जाता है
आसमान की उँचाईया छूने लगता है
प्यार कि खुशबू महकने लगती है
सांसे कुछ तेज चलने लगती है
बंद आँखे प्यार का लम्हा जीने लगती है
होंठ उनके नाम से कंपकपाने लगते है
अहसास फिर से मचलने लगते है

उनकी याद आज भी
अपने करीब ले जाती है.


- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
अबु धाबी,यूएई
(एक पुरानी रचना)

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

26/11 - क्या सीख पाये हम कुछ ?


मुंबई हमले की आज बरसी है. तमाम चैनलो और प्रिंट मीडिया में "अपने सच" की खूब बिक्री हो रही है.सभी किसी न किसी रुप में किसी को दोषी ठहरा रहे है या फ़िर प्रशन खडे कर रहे है. आज भी पाकिस्तान को दोषी और शहीदो को याद कर रहे हैं. यही होता आया है पहले भी और आज भी. सरकार की नाकामायाबी और राज्य की निष्क्रियता पर राजनीति होती आ रही है और होती रहेगी.

तो केवल इतना है कि आंतक का डर उसी रुप में बरकरार है. कई दावे सुरक्षा के मध्य नज़र हर घटना के बाद किये जाते है, आयोगो का गठन तो आम बात है. मानव अधिकारो के नाम पर दोषियो के प्रति सख्त कार्वाही करने से हिचकते है या कहे वोट बैंक की रजनीति हावी रहती है. केवल लोगो को गुमराह किया जाता है धर्म, मज़हब या फ़िर अल्पसंखय्को के नाम पर.

ज जरुरत है अपनी सुरक्षा संगठनो को और सशक्त बनाने की, गुप्त्चर विभाग को और जागरुकता बरतने की और आम नागरिक को और चौकस रहने की. इन तीनो को केवल राष्ट्र से जोड कर देखा जाना चाहिये ना कि जाति, धर्म और राजनीति से. भरस्क प्रयास होने चाहिये हर राज्य की ओर से चाहे सरकारे किसी भी राजनीतिक दल की हो या केन्द्र मे किसी की भी सरकार हो.पक्ष या विप़क्ष को राजनितिक फ़ायदे की लालसा को दर किनार कर देश की अखंडता के लिये साथ कदम उठाने की जरुरत है. कानून का पालन सख्ती से और दोषियो की सुन्वाई जल्द से जल्द और कडी सज़ा जिससे आंतक फ़ैलाने वाले इस तरह के कदम उठाने से पहले १०० बार सोचे. उन सभी लोगो को भी जो आंतकियो को शरण देते है उन्हे भी आंतकी समझ कर ही सज़ा देना जरुरी है. सविधान/कानून मे भी संशोधन की जरुरत है जिससे अपराधी इसका फ़ायदा उठा कर बच ना सके. सभी पुलिस महकमो मे शिक्षा और आधुनिकरण को स्थान देना होगा तथा उनकी उपयुक्तता को बढाना होगा. बेरोज़गारी और गरीबी जैसे मुद्दो की ओर भी देखना होगा जिससे युवाओ को सही दिशा मिल सके और उनका ध्यान देश विरोधी गतिविधियो या अपराधो की ओर ना जाये.

भी कार्यो को अंज़ाम देने के लिये इच्छाशक्ति की अहम जरुरत है. फ़िर देश से बडा क्या है. यदि हम सभी इस भावना से कार्य करे तो आंतक जैसे दानव से छुटकारा पा सकते है.

एक गीत जो १५ अगस्त २००९ को लिखा था उसे पुन: लिख रहा हूं. शहिदो को नमन करते हुये.

- सुनो वतन के रखवालो -

हे माटी के मतवालो, गीत हिंद के गा लो,

हर धर्म का है मान यहां, प्रेम जहां की भाषा है,

मां यही है,शक्ति यही है, सुनो वतन के रखवालो

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

इस माटी मे हम जन्मे हैं, इस माटी से प्यार करो,

प्यार हमारी शक्ति है, इसी में छुपी देश भक्ति है,

तिरंगे ध्वज की गरिमा को, आंच कभी ना आने देंगे।

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

आजादी कही छिन ना जाये, भारत को हमें बचाना है

वतन पर मरने वालो की, हमे यही तो दीक्षा है,

उठो स्वयं को तैयार करो, माटी का कर्ज चुकाना है,

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

भारत में रहनेवाला , हर एक इंसा हिन्दुस्तानी है,

धर्म कहीं लुटने ना पाये, करनी इसकी निगरानी है,

मां की लाज बचानी है, यही एक हमारा नारा हो।

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

सब युवाओ के कंधो पर, बागडोर है भारत की,

अब घडी है परीक्षा की, इसके लिये हर पल तैयार रहो,

गर्व है तुम पर भारत मां को, उसका पूरा सम्मान करो।

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

यह देव्य भूमि है,यह पुण्य भूमि है,इस पर कितने अवतार हुये,

हम स्वयं अंश है इस भूमि के, फिर क्यो कोई अपमान सहे,

दे देंगे जीवन अपना भी, लेकिन मां को कुछ ना होने देगे।

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।

आज वचन ले हम सब, इसकी रक्षा करने का,

मर जायेंगे, मिट जायेंगे, सेवा मे अपने वतन की,

धर्म यही है कर्म यही है, हम तिरंगे के मतवालो का।

सुनो वतन के रखवालो, गीत हिंद के गा लो।


- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, आबू धाबी, य़ू ए ई

सोमवार, 2 नवंबर 2009

चाँद फिर निकला Written By: Kamlesh Chauhan Copyright@ July 9th, 2008

ये चाँद आज फिर निकला है यु सज धज के


मुहबत का जिक्र हो शायद हाथो की लकीरों मे


याद दिलाता है मुझे एक अनजान राही की

याद दिलाता है उन मुहबत भरी बातो की


टूट कर चाहा इक रात दिल ने एक बेगाने को

कबूल कर लिया था उसकी रस भरी बातो को


वोह पास हो कर भी दूर है मुझ से

दूर होकर भी कितने करीब है दिल के

उनको देखने के लिये ये नैन कितने प्यासे थे

उनको देखने की चाह मे हम दूर तक गए थे

डूब जाते है चश्मे नाज़ मे उनका कहना था

जिंदगी कर दी हमारे नाम उनका ये दावा था

आज चाँद फिर निकला बन ठन कर

चांदनी का नूर छलका हो यु ज़मीं पर

याद आयी नाखुदा आज फिर शब्-ए-गम की

मदभरी,मदहोश,रिश्ता-ए-उल्फ़ते,शबे दराज की


नैनो मे खो गए थे नैन कुछ ऐसे उस रात

छु लिया यूँ करीब हो कर खुल गया हर राज़



आज पूरण माशी का चाँद फिर निकला

सवाल करता है आपसे आज दिल मेरा

मेरे चाँद

तोड़ कर खिलोनो की तरह यह दिल

किसके सहारे छोड़ देते हो यह दिल


अगर वायदे निभा नहीं सकते थे तुम

जिंदगी का सफ़र न कर सकते थे तुम


कियों आवाज दी इस मासूम दिल को

कियों कर दस्तक देते हो इस दिल को

मत खेलो इस दिल से मेरे हजूर

मत छीनो मेरी आँखों का नूर

हमारा तो पहला पहला प्यार है

आँखों मे तुम्हारा ही खुमार है

हर रोज तुम्हारा ही इंतजार है

दिन रात दिल रोये जार जार है



या तो हमें सफ़र मे साथ लेलो

या फिर अपनी तरह

हमें भी खुद को भुलाना सीखा दो

जीना सिखा दो मरना सिखा दो

अभी तो ज़िन्दगी एक इल्जाम है

बिन तुम्हारे सुनी दुनिया

हमारा तो संसार ही बेजार है

all rights reserved with Kamlesh Chauhan none of the lines and words are allowed to manipulate and changed. Thanks

रविवार, 1 नवंबर 2009

स्वयं का पहला कदम


आज की बात...

कुछ सोच रहा था तो और उलट पलट कर स्थितियो और परिस्थितियो को देखने लगा. यूएई में २३ सालो से रह रहा हूं, फ़िर सोच क्या खोया क्या पाया के खाते दिमाग पर तांडव करने लगे. ज्यादा इस पर ना सोचू इसलिये आने वाले समय की ओर सोच को मोडा और पाया कि नये साल(दुनियाभर के लोग इसे मानते है) मे कुछ दिन शेष है. फ़िर येसे ही कुछ बाते मन मे उभरने लगी.

नये साल कि सुगबुगाहट के शुरु होते ही वातावरण इसके इर्द-गिर्द घूमने लगता है। चाहे इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या प्रिन्ट मीडिया हो सब मिल जुट कर इसको प्रोत्साहित करते है। हम सब लोग इससे अछूते नही है। शुरु हो जाती है बधाई संदेशों की भरमार अपने ही अंदाज़ में। हिन्दुस्तानी कहीं भी हो भारत में या भारत से बहार, शायद अपने नववर्ष को इतनी अहमियत नही देते है या इस रुप में नही मनाते है। लेकिन पश्चिम की इस रीत को आसानी से अपने जीवन धारा में ढ़ाल चुके हैं। पाश्चात्य संस्कति कई तरह व बातो मे हम अपनाने लगे है और कोई उस पर कटा़क्ष करे तो उसे हम केवल धर्म का नाम देकर चुप करा देते है. लेकिन ये भी कडवा सच है कि वे लोग किस कारण से विमुख है और क्या कारण है कि अपने लोगो को वो नही दे पा रहे है जो दुसरे देश या फ़िर दुसरे देशो की संसकति जिसमे खासकर युवा. कुछ कल की बात करते है और कुछ आने वाले कल की बाते। कुछ लोगो को नसीहत देते हुए कुछ खुद को सुधारने की कसमें खाते हुये। कुछ समाज की बात करते हुये नही थकते तो कुछ समाज की ख़ामियाँ गिनाते हुये देखे जा सकते है।खैर इस बात को एक नये शीर्षक के साथ शुरु किया जा सकता है। अभी तो केवल आज की बात के साथ ही रहना चाहते है।

सोचने लगा कि अतीत की बातें हमेशा ही कचोटती है जिनसे स्वयं को,मित्रो को,परिवार को या संबधियो को, समाज को या राष्ट्र को हानि पहुँची हो। शायद यही वक्त होता है विचार मंथन का, फिर इससे सबक लेने का या इनसे उबरने का या फिर इसमें संशोधन करने का। सामने होता है लेखा जोखा जिसमे बस रहता है क्या खोया क्या पाया। वक्त के थपेड़े भी आने वाले कल की बुनियाद लिख जाते है, और आईना बन जाते है हमारे भविष्य का।

फ़िर अपने देश और समाज का रुप फ़िर आंखो में मंडराने लगा. कौन गलत कौन सही,राजनीति,खेल,शिक्षा या अन्य क्षेत्र्, संस्कति और साहित्य जैसे शब्द कभी विकराल रुप या कभी सहज़ता से मेरे मन मस्तिष्क पर दौड भाग करने लगे. विचार मंथन भी हुआ तो कुछ निश्कर्ष इस कदर सामने आया इसमे मै और आप दोनो शामिल है.

क्यों ना आज एक ही वादा करें अपने आप से की स्वयं को पहचाने। अपनी संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, साहित्य, शिक्षा और त्यौहारो की ओर सच्चे मन से झुके और जानने की कोशिश करे इसकी शुरुआत और आज हम इसे कंहा देख रहे है. हम खुद ही जान जायेगे कि हम हिन्दुस्तानी कितने धनी है हर क्षेत्र में. बस कमी है तो एक कदम की जो प़क्षपात से दूर हो और "मै" के प्रभाव से कोसो दूर. हम अपने आप को निष्ठापूर्वक अपनी ही नज़रो में सभ्य, सशक्त, और श्रेष्ठ बनाये। आप योग्य तो परिवार समर्थ , परिवार समर्थ तो समाज प्रबल, अगर समाज प्रबल तो राष्ट्र महान। शायद यही देश के प्रति सच्ची भक्ति हो - एक सुनहरे भविष्य की और स्वयं का पहला कदम।

जय हिन्द्!!!!

प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल
अबु धबी. यूएई.

सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

क्या करना तुम शादी के बाद.

(बहुत साल पहले कुछ मित्रो को शादी की मुबारकबाद देते हुये कुछ प़क्तिया)

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एक से दो हुये आप, देता हूँ मुबारकबाद
बता रहा हूँ क्या करना तुम शादी के बाद

रात - दिन का नही, जीवन भर का है साथ
इसे निभाना प्रिय मित्रो , तुम शादी के बाद

एक दूसरे को समझना, ना करना तुम शक
इधर उधर झाँकना नही, तुम शादी के बाद

सुख - दुख जीवन का अंग है, इसमे रहना साथ
एक दूसरे का हाथ बटाना, तुम शादी के बाद

एक दूजे की खुशियों का रख्नना तुम ध्यान
हर कदम फूँक - फूँक रखना तुम शादी के बाद

सुन्दर - सुन्दर फूल खिलाना तुम अपने घर आँगन
छोटा परिवार सुखी परिवार, रखना ध्यान
तुम शादी के बाद

- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल

(1989 मे लिखी हुई - अपने अन्य ब्लाग मे भी प्रेषित की थी)

सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

तुम जब भी मेरे पास आये

तुम जब भी मेरे पास आये,
प्यार की परिभाषा बदलती रही।
जब भी तुमने मुझे छुआ
अहसास हमारे हर पल बदलते रहे।

तुम्हारी आँखों ने जब भी कुछ कहा
सपने मेरी आँखों के बदलते रहे
तुम्हारे दिल ने जब भी मुझे पुकारा
दिल के जज़बात फ़िर तड़पेंगे लगे


रात की खामोशी जब कुछ कहने लगी
हम तुम तब कुछ बहकने से लगे
दूरियां जब कुछ कम होने लगी
प्यार के अंदाज़ फ़िर बदलने लगे।


होंठ जब तुम्हारे कंपकंपाने लगे
जुबां ना जाने मेरी क्यों लड़खड़ाने लगी
सांसे जब तुम्हारी तेज़ चलने लगी
प्यार कि गहराई हर पल बदलती रही।

वक्त और मौसम बस बदलते चले गये
हम और तुम प्यार में बस चलते गये
अहसास फ़िर भी बदलते रहे
प्यार में हम यूं ही निखरते रहे


- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
(पुरानी रचना दुसरे ब्लाग से)

शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

दीपावली की बधाई एवम शुभकामनाये!!



ब्लागवाणी तथा चिट्ठाजगत के पाठको को, तमाम हिन्दी ब्लागरो और भारत वासियो को
दीपावली की बधाई एवम शुभकामनाये!!

II हरि ओम हरि ओम हरी ओम हरि ओम ततसत् हरि ओम शान्ति शान्ति शान्ति II
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आज सज़े है दिये चारो ओर,होगा मिठाई वितरण और आतिशबाजियो का शोर,
शुभ रहे दीपावली आप मित्रो को,स्वीकार करे "प्रतिबिम्ब" का प्यार व नम्स्कार

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

दिवाली फ़िर से आई - शुभकामनाये



दिलो - दिमाग पर रहती, हर त्यौहार की छाप है

बतलाया गया मुझे चोरी और झूठ तो एक पाप है।


सिखलाया करना बड़ो का आदर, रखना प्रेम और भाई चारा,

देश प्रेम का पाठ पढाया और बुलंद किया देशभक्ति का नारा।


आज दिवाली फ़िर से आई सबके चेहरो पर ख़ुशियाँ लाई,

दोस्तों को देने लगे बधाई, सबके घरों में उमंग ले आई।


भूल गये सब कल की बाते, नई राह फ़िर लगे हैं देखने,

आज फ़िर कल बन जायेगा, सभी भरने लगेंगे घर अपने।


आओ दीपावली का त्यौहार हम आज इस तरह मनाये,

रुठे है सपने जिनके, उनके सपनों को आज़ फ़िर संज़ाये।


- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

तुम संग नाचूँ, गीत मिलन के गाऊँ


तुम संग नाचूँ, गीत मिलन के गाऊँ
अपनी धुनों से दीवाना तुमको बनाऊँ
प्यार के खेल में जीत ले हम बाजी
तुम संग नाचूँ, गीत, मिलन के गाऊँ

तुम कहो तो दुनिया से मैं लड़ जाऊँ
धरती क्या अम्बर में तूफान मचाऊँ
सागर की मौजो को गले लगाऊँ
तुम संग नाचूँ, गीत मिलन के गाऊँ

पंछी जैसे साथ तुम्हें ले मैं उड़ जाऊ
नील गगन में प्यार तुम्हें सिखलाऊँ
तराना प्यार का तुमको मैं सुनाऊँ
तुम संग नाचूँ, गीत मिलन के गाऊँ

दिल में अपने मूरत तुम्हारी है बनाई
किया है प्यार तुम्हीं से, ये है सच्चाई
साथ जियेंगे कसम ये है मैंने खाई
तुम संग नाचूँ, गीत मिलन के गाऊँ

-प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

तो क्या बात होती


- तो क्या बात होती-

ख्वाब हकीकत बन जाते तो क्या बात होती
हम - तुम एक हो जाते तो क्या बात होती

तेरा दर्द मैं सह पाता तो क्या बात होती
तेरे आंसू मेरी आंख से आते क्या बात होती

तेरा गम मैं समेट पाता तो क्या बात होती
तेरी परछाई मैं बन पाता तो क्या बात होती

मेरी खुशनसीबी तुम्हें मिल जाती तो क्या बात होती
तुम्हारा प्यार मुझे मिल जाता तो क्या बात होती

मेरा सुख-चैन तुम को मिल जाता तो क्या बात होती
मेरी मुस्कराहट तुम को मिल जाती तो क्या बात होती

तेरे दामन में ख़ुशियाँ मैं भर पाता तो क्या बात होती
दुनिया की बुरी नज़र से बचा पाता तो क्या बात होती


- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

(पुरानी रचना दूसरे ब्लाग से)

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

फिर भी ना जाने क्यो-(प्रेम का एक रुप ये भी)


-फिर भी ना जाने क्यो-

प्रेम अर्थ है,
प्रेम समर्थ है,
फिर भी ना जाने क्यो व्यर्थ है॥

प्रेम आरजू है,
प्रेम तपस्या है,
फिर भी ना जाने क्यों निराशा है॥

प्रेम चेष्टा है,
प्रेम निष्ठा है,
फिर भी ना जाने क्यों रुठा है॥

प्रेम शक्ति है,
प्रेम अनुभूति है,
फिर भी ना जाने रुकी अभिव्यक्ति है॥

प्रेम पावन है,
प्रेम नादान है,
फिर भी ना जाने क्यो परेशान है॥

प्रेम शान है,
प्रेम ईमान है,
फिर भी ना जाने बना क्यों हैवान है॥

प्रेम गीत है,
प्रेम जीत है,
फिर भी ना जाने मिलती क्यों हा
र है॥

- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

(पुरानी रचना आप लोगो के लिये दूसरे ब्लाग से)

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

जिन्दगी का चित्रण

- जिंदगी का चित्रण -

बिन्दु-बिन्दु से बनता जिंदगी का चित्रण
सजता उसमें हमारी आशाओं का दर्पण
करती उसमें इच्छायें स्वच्छंद विचरण
रंग जाते उसमें भिन्न- भिन्न प्रकरण

अन्तरात्मा का है जिसमें विवरण
भावों का रहता है जिसमें समर्पण
कर देते है उसमें सब कुछ अर्पण
खूबसूरती का रहता जिसमें आकर्षण

समेटे हुये जो सच का आवरण
करता है खुशियों का वितरण
प्रेम की खुशबू फैलती छ्ण-छ्ण
बोल पड़ता है -जिसमें कण-कण

-प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
(अपने दूसरे ब्लाग से ली गई पोस्ट)
कण

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

ये क्या सिखाया आपने



सो रहा था मां के गर्भ में
सब बातो से अनजान
शायद जानता भी था,
नही कर पाया तब बयान.


खुश था अपनी दुनिया में,
परियो के उस सुंदर संसार में,
सब के चेहरे पर खुशी लाता था,
करता था तब सब से प्यार मैं

ना धर्म की पहचान थी तब मुझे,
ना शत्रुओ का ज्ञान था तब मुझे
आज धर्म ही मेरी पहचान बनी,
ये दुशमनी क्यो सिखाई आपने मुझे?

आंख खुलते ही ये क्या सिखाया आपने,
अपनो से ही बैर सिखाया क्यो आपने ?
हार जीत की कसौटी पर खडा किया,
क्यो अपनो को हराना सिखा दिया आपने?

तब रोता था बस चाह में अपनो की,
ढूढता था अपनो को ललचाई आंखो से
आज हंसना सिखाया आपने अपनो पर,
आज क्यो मै रोडा बनता अपनो के सपनो पर?

कभी सोचता हूं अनजान ही अच्छा था,
दुनिया से जब तक ना ये सब सीखा था,.
आओ शांति - अंहिसा की राह सब चले
द्वेश छोड अब प्रेम की राह हम सब चले


-प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

गुदडी का लाल



~गुदडी का लाल~

निर्धनता के दामन थामे, जिनके बढते रहे कदम,
येसे लाल बहादुर को करते है आज हम सब नमन,

कद के छोटे थे लाल, फ़िर भी ऊंचे थे उनके विचार,
जीवन के हर मोड पर सादगी ही था उनका आधार.

गांधी-नेहरु के संग उन्होने आज़ादी की लडी लडाई,
हर आंदोलनो में कूद भारत को आज़ादी दिलवाई.

कठिन समय मे की उन्होने भारत की अगुवाई,
कुछ निर्णयो को लेकर उन पर अंगुली भी उठाई.

लाल बहादुर ने देश का बचाया सम्मान,
दे कर नारा "जय जवान - जय किसान".

शांति की खोज़ मे ताशकंद पहुंचा यह लाल,
वही से अलविदा कह गया ये गुदडी का लाल.

-प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

बुधवार, 30 सितंबर 2009

डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल - हिंदी में डी.लिट. की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले शोध विद्यार्थी


डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल ( १३ दिसंबर, १९०१-२४ जुलाई, १९४४) हिंदी में डी.लिट. की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले शोध विद्यार्थी

डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल का जन्म तथा मृ्त्यु दोनो ही पाली ग्राम( पौडी गढवाल),उत्तराखंड, भारत मे हुई. बाल्यकाल मे उन्होने"अंबर" नाम से कविताये लिखी. फिर कहानिया व संपादन ( हिल्मैन नामक अंग्रेजी पत्रिका) किया. डॉ० बड्थ्वाल ने हिन्दी में शोध की परंपरा और गंभीर अधय्यन को एक मजबूत आधार दिया. आचार्य रामचंद्र शुक्ल और बाबू श्यामसुंदर दास जी के विचारो को आगे बढाया और हिन्दी आलोचना को आधार दिया. वे उत्तराखंड की ही नही भारत की शान है जिन्हे देश विदेशो मे सम्मान मिला. उत्तराखंड के लोक -साहित्य(गढवाल)के प्रति भी उनका लगाव था.

डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल भारत के प्रथम शोध छात्र है जिन्हे १९३३ के दीक्षांत समारोह में डी.लिट(हिन्दी) से नवाज़ा गया उनके शोधकार्य " हिन्दी काव्य मे निर्गुणवाद" ('द निर्गुण स्कूल आफ हिंदी पोयट्री'- अंग्रेजी शोध पर आधारित जो उन्होने श्री श्यामप्रसाद जी के निर्देशनमें किया था) के लिये.

उनका आध्यातमिक रचनाओ की तरफ लगाव था जो उनके अध्यन व शोध कार्य मे झलकता है. उन्होंने संस्कृत, अवधी, ब्रजभाषा, अरबी एवं फारसी के शब्दो और बोली को भी अपने कार्य मे प्रयोग किया. उन्होने संत, सिद्घ, नाथ और भक्ति साहित्य की खोज और विश्लेषण में अपनी रुचि दिखाई और अपने गूढ विचारो के साथ इन पर प्रकाश डाला. भक्ति आन्दोलन (शुक्लजी की मान्यता ) को हिन्दू जाति की निराशा का परिणाम नहीं माना लेकिन उसे भक्ति धारा का विकास माना. उनके शोध और लेख उनके गम्भीर अध्ययन और उनकी दूदृष्टि के भी परिचायक हैं. उन्होने कहा था "भाषा फलती फूलती तो है साहित्य में, अंकुरित होती है बोलचाल में, साधारण बोलचाल पर बोली मँज-सुधरकर साहित्यिक भाषा बन जाती है". वे दार्शनिक वयक्तित्व के धनी, शोधकर्ता,निबंधकार व समीक्षक थे. उनके निबंध/शोधकार्य को आज भी शोध विद्दार्थी प्रयोग करते है. उनके निबंध का मूल भाव उसकी भूमिका या शुरुआत में ही मिल जाता है.

निम्नलिखित कृ्तिया डॉ० बडथ्वाल की सोच, अध्यन व शोध को दर्शाती है.

· रामानन्द की हिन्दी रचनाये ( वारानसी, विक्रम समवत २०१२)

· डॉ० बडथ्वाल के श्रेष्ठ निबंध (. श्री गोबिंद चातक)

· गोरखवाणी(कवि गोरखनाथ की रचनाओ का संकलन व सम्पादन)

· सूरदास जीवन सामग्री

· मकरंद (. डा. भगीरथ मिश्र)

· 'किंग आर्थर एंड नाइट्स आव द राउड टेबल' का हिन्दी अनुवाद(बच्चो के लिये)

· 'कणेरीपाव'

· 'गंगाबाई'

· 'हिंदी साहित्य में उपासना का स्वरूप',

· 'कवि केशवदास'

· 'योग प्रवाह' (. डा. सम्पूर्णानंद)

उनकी बहुत सी रचनाओ मे से कुछ एक पुस्तके "वर्डकेट लाईब्रेरी" के पास सुरक्षित है..हिन्दी साहित्य अकादमी अब भी उनकी पुस्तके प्रकाशित करती है. कबीर,रामानन्द और गोरखवाणी (गोरखबानी, सं. डॉ० पीतांबरदत्त बडथ्वाल, हिंदी साहित्य संमेलन, प्रयाग, द्वि० सं०) पर डॉ०बडथ्वाल ने बहुत कार्य किया और इसे बहुत से साहित्यकारो ने अपने लेखो में और शोध कार्यो में शामिल किया और उनके कहे को पैमाना माना. यह अवश्य ही चिंताजनक है कि सरकार और साहित्यकारो ने उनको वो स्थान नही दिया जिसके वे हकदार थे. प्रयाग विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर डा॰ रानाडे भी कहा कि 'यह केवल हिंदी साहित्य की विवेचना के लिये ही नहीं अपितु रहस्यवाद की दार्शनिक व्याख्या के लिये भी एक महत्त्वपूर्ण देन है.

"नाथ सिद्वो की रचनाये " मे ह्ज़ारीप्रसाद द्विवेदी जी ने भूमिका मे लिखा है

" नाथ सिद्धों की हिन्दी रचनाओं का यह संग्रह कई हस्तलिखित प्रतियों से संकलित हुआ है. इसमें गोरखनाथ की रचनाएँ संकलित नहीं हुईं,क्योंकि स्वर्गीय डॉ० पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ की रचनाओं का संपादन पहले से ही कर दिया है और वे गोरख बानी नाम से प्रकाशित भी हो चुकी हैं (हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग). बड़थ्वाल जी ने अपनी भूमिका में बताया था कि उन्होंने अन्य नाथ सिद्धों की रचनाओं का संग्रह भी कर लिया है, जो इस पुस्तक के दूसरे भाग में प्रकाशित होगा. दूसरा भाग अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है अत्यंत दुःख की बात है कि उसके प्रकाशित होने के पूर्व ही विद्वान् संपादक ने इहलोक त्याग दिया. डॉ० बड़थ्वाल की खोज में 40 पुस्तकों का पता चला था, जिन्हें गोरखनाथ-रचित बताया जाता है. डॉ० बड़थ्वाल ने बहुत छानबीन के बाद इनमें प्रथम 14 ग्रंथों को निसंदिग्ध रूप से प्राचीन माना, क्योंकि इनका उल्लेख प्रायः सभी प्रतियों में मिला.तेरहवीं पुस्तक ग्यान चौंतीसा समय पर न मिल सकने के कारण उनके द्वारा संपादित संग्रह में नहीं आ सकी,परंतु बाकी तेरह को गोरखनाथ की रचनाएँ समझकर उस संग्रह में उन्होंने प्रकाशित कर दिया है".

उन्होने बहुत ही कम आयु में इस संसार से विदा ले ली अन्यथा वे हिन्दी में कई और रचनाओ को जन्म देते जो हिन्दी साहित्य को नया आयाम देते. डॉ० संपूर्णानंद ने भी कहा था यदि आयु ने धोखा न दिया होता तो वे और भी गंभीर रचनाओं का सर्जन करते'

उतराखंड सरकार, हिन्दी साहित्य के रहनुमाओ एवम भारत सरकार से आशा है कि वे इनको उचित स्थान दे.

(आप में से यदि कोई डॉ० बड़थ्वाल जी के बारे में जानकारी रखता हो तो जरुर बताये)



आपका सहयोग - आपके विचारो और राय के माध्यम से मिलता रहेगा येसी आशा है और मुझे मार्गदर्शन भी मिलता रहेगा सभी अनुभवी लेखको के द्वारा. इसी इच्छा के साथ - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
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