मन बहुत उतावला होता है। इसमे न जाने कितने सवाल उठते है या जबाब मिलते है। चाहे उनमे मै स्वयं ही घिरा हूं या फ़िर समाज या देश के प्रति मेरी उदासीनता या फ़िर जिम्मेदारी। आप भी मेरी इस कशमकश के साथी बनिये, साथ चलकर या अपनी प्रतिक्रिया,विचार और राय के साथ्। तेरे मन मे आज क्या है लिख दे "चिन्तन मेरे मन का" के पटल पर यार, हर पल तेरी कशिश का फ़साना हो या फ़िर तेरी यादो का सफ़र मेरे यार।
शुक्रवार, 24 जुलाई 2009
सोमवार, 20 जुलाई 2009
कौन है रचनाकर (मेरी पहली रचना मेरे सब्से पहले ब्लाग पर)

गुरुवार, 16 जुलाई 2009
मेरा वतन
मंगलवार, 14 जुलाई 2009
मुश्किल है अपने से दूर करना

आसान है तुमको गले लगाना
मुश्किल है अपने से दूर करना
आसान है प्यार का इजहार करना
मुश्किल है तुम बिन इंतज़ार करना
आसान है तुम से नज़रे मिलाना
मुश्किल है तुम से नज़रे चुराना
आसान है तुमसे प्यारी बाते करना
मुश्किल है तुम से रुठ कर बैठना
आसान है तुम से दोस्ती करना
मुश्किल है तुम से बेवफाई करना
आसान है तुम पर अहसान जताना
मुश्किल है तुम से अहसास छुपाना
आसान है तुम रुठो तो मनाना
मुश्किल है तुम से फासले बनाना
आसान है तुमको नज़रो में बसाना
मुश्किल है अपने से दूर करना
- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
(यह भी एक पुरानी रचना है)
मंगलवार, 7 जुलाई 2009
तुमसे बिछड़ा तो ऐसा लगा

रेगिस्तान सा आभास लगा
होश अपने खोने लगा
जोश मेरा हिलने लगा
रेत का असहाय टीला
चारो ओर फ़िर भी गी्ला
रेत के बिखरते कण
दर्द के बिलखते क्षण
यादों का बहता सैलाब
फ़िर भी ना मिलते जबाब
पल-पल उखड़ती सांस
सहारा ढूँढती रही आस
इस मरुस्थल में जाना
प्यार का अपना फंसाना
तुमसे दूरी का अहसास
और पास होने का आभास
बुधवार, 1 जुलाई 2009
फ़िर क्या बदला?

बीत गये कुछ लमहे
अब रात होने को आई
क्या अलग था कल से
सोचने लगा इस शाम से
कुछ भी नहीं बदला
क्या बदला मैं ?
क्या बदले तुम ?
क्या बदल गये वो ?
बदला तो क्या बदला ?
फिर क्या बदला ?
तुम वही, मैं वही
फिर क्या बदला ?
भूख वही, प्यास वही
रविवार, 28 जून 2009
कैसे ?

दूरियां दर्मियां होती तो
पास तुम्हारे हो्ता कैसे?
आंखे मिलती नहीं हमारी तो
इन आँखो में बसाता कैसे?
तुमसे अनजान होता तो
अपनी जान बनाता कैसे?
आवाज सुनी ना होती तो
प्यार के स्वर सुनता कैसे?
इंतजार किया न होता तो
मिलने का पल समेटता कैसे?
अहसास रुक जाते तो
सांसे यूं समाती कैसे?
प्रीत तुमसे की न होती तो
गीत मन के लिखता कैसे?
शुक्रवार, 26 जून 2009
इसे क्या कहेंगे आप?

मंगलवार, 23 जून 2009
सिसकियां लेती है मन की वेदना

झुंझलाती रहती है अपनी चेतना
हर मोड़ पर दिखते हैं अब बिखरे कांटे
ना जाने क्यों दिल से दिल को हम बांटे
प्यार का करते रहते है हम सब ढोंग
लेकिन हैं दुश्मन एक दूजे के हम लोग
खून मानवता का अब और सस्ता हुआ
जीना बेसुध दुनिया में और महंगा हुआ
अंगड़ाई जोश की लेती तो है जवानी
स्वार्थ कि खातिर बन जाती नई कहानी
फ़ैशन बन कर अब विलुप्त हो रही खादी
मूक रहकर खुली आंख से देख रहे बर्बादी
कुछ हक़ीकत है, कुछ है फंसाना
फ़िर भी जीने का ढूंढ़े हम बहाना