पृष्ठ

सोमवार, 20 जुलाई 2009

कौन है रचनाकर (मेरी पहली रचना मेरे सब्से पहले ब्लाग पर)



जीवन की संरचना में,
कौन है रचनाकर ?
कैसे इस रचना को
रच देता है रचियेता ।
हर रंग से वशीभूत होकर,
भर देता है रंग रचियेता

हर एक भिन्न - भिन्न है,
रंगो का मिश्रण भी अलग है,
सबके जीवन में रंग अलग है,
हर रंग का आकर्षण अलग है,
जीवन की संरचना में,
कौन है रचनाकर ?



रचियेता की रचना में
रंग की अखरता में,
रंग की सरलता में,
रंग की सहजता में,
रंग की विभिन्नता में,
रंग की एकता में,
रंग की भावना में,
रंग की ताकत में,
बदल जाता है,
हर रंग का मतलब
जीवन की संरचना में,
कौन है रचनाकर ?


धूप छांव के रंगो में,
इन्द्रधनुष बन जाते है ।
रंग से रंग मिल जाते है,
जीवन से जीवन मिल जाते है ।
रचनेवाला छोड़ जाता है,
हर रंग का रंग जीवन भर ।
जीवन की संरचना में,
कौन है रचनाकर ?



- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

(मेरी प्रथम रचना मेरे प्रथम ब्लाग पर आपके लिये प्रस्तुत 23/11/2007)

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

मेरा वतन


कश्मीर से कन्याकुमारी को पहचान ले
बंगाल से गुजरात की ताकत जान ले
अपना कर्तव्य अब हम समझ ले
कमजोर नहीं हम दुश्मन अब जान ले

अहिंसा के पुजारी बसते है यहाँ
वीर सेनानी जन्म लेते है यहाँ
अतिथि का आदर करते है यहाँ
दुश्मनों को सबक सिखाते है यहाँ

आंतक यहाँ कोई न फ़ैलाने पाये
बुरी नज़र ना कोई लगने पाये
राजनीति ना हम को बांट पाये
आओ देशहित में हम साथ हो -जाये
-प्रतिबिम्ब बडथ्वाल्
( पहले की एक रचना)
प्र्

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

मुश्किल है अपने से दूर करना


आसान है तुमको गले लगाना

मुश्किल है अपने से दूर करना

आसान है प्यार का इजहार करना

मुश्किल है तुम बिन इंतज़ार करना

आसान है तुम से नज़रे मिलाना

मुश्किल है तुम से नज़रे चुराना

आसान है तुमसे प्यारी बाते करना

मुश्किल है तुम से रुठ कर बैठना

आसान है तुम से दोस्ती करना

मुश्किल है तुम से बेवफाई करना

आसान है तुम पर अहसान जताना

मुश्किल है तुम से अहसास छुपाना

आसान है तुम रुठो तो मनाना

मुश्किल है तुम से फासले बनाना

आसान है तुमको नज़रो में बसाना

मुश्किल है अपने से दूर करना


- प्रतिबिम्ब बडथ्वाल

(यह भी एक पुरानी रचना है)

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

तुमसे बिछड़ा तो ऐसा लगा


तुमसे बिछड़ा तो ऐसा लगा
रेगिस्तान सा आभास लगा
होश अपने खोने लगा
जोश मेरा हिलने लगा

रेत का असहाय टीला
चारो ओर फ़िर भी गी्ला
रेत के बिखरते कण
दर्द के बिलखते क्षण

यादों का बहता सैलाब
फ़िर भी ना मिलते जबाब
पल-पल उखड़ती सांस
सहारा ढूँढती रही आस

इस मरुस्थल में जाना
प्यार का अपना फंसाना
तुमसे दूरी का अहसास
और पास होने का आभास
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
( यह भी एक पुरानी रचना )

बुधवार, 1 जुलाई 2009

फ़िर क्या बदला?


नई सुबह, नया दिन
बीत गये कुछ लमहे
अब रात होने को आई
क्या अलग था कल से
सोचने लगा इस शाम से


कुछ भी नहीं बदला
क्या बदला मैं ?
क्या बदले तुम ?
क्या बदल गये वो ?
बदला तो क्या बदला ?


दिन वही, रात वही
फिर क्या बदला ?
तुम वही, मैं वही
फिर क्या बदला ?
भूख वही, प्यास वही
फ़िर क्या बदला ?
हँसी वही, आँसू वही,
फ़िर क्या बदला ?
ईर्ष्या वही, प्यार वही
फिर क्या बदला ?
रिश्ते वही, नाते वही
फिर क्या बदला ?
दर्द वही, पीड़ा वही
फिर क्या बदला ?


रात की काली स्याही में
सुबह की उभरती लाली में
शायद सुबह कुछ बदल जाए
इसी आस में कल के इंतजार में

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

( यह भी मेरी पुरानी रचनाओ से ली गई है )

रविवार, 28 जून 2009

कैसे ?



दूरियां दर्मियां होती तो
पास तुम्हारे हो्ता कैसे?
आंखे मिलती नहीं हमारी तो
इन आँखो में बसाता कैसे?
तुमसे अनजान होता तो
अपनी जान बनाता कैसे?
आवाज सुनी ना होती तो
प्यार के स्वर सुनता कैसे?
इंतजार किया न होता तो
मिलने का पल समेटता कैसे?
अहसास रुक जाते तो
सांसे यूं समाती कैसे?
प्रीत तुमसे की न होती तो
गीत मन के लिखता कैसे?
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
(यह भी मेरी पुरानी रचनाओ में से एक है )

शुक्रवार, 26 जून 2009

इसे क्या कहेंगे आप?


शुक्रवार छुटी का दिन, सोचा अपनी कार को ज़रा साफ किया जाए। छोटी सी बाल्टी पानी की और दो तौलिये लेकर पहुँच गया। अभी मैंने कार को गीले तौलिये से साफ करना ही शुरू किया तो एक महाशय मेरे पास आये जो अपनी कार के साथ किसीका इन्तेज़ार कर रहे थे. उन्होंने कहा आपके पास गीला तौलिया है जो आप प्रयोग कर रहे है. क्या आपके पास सुखा तौलिया भी है. मैंने कहा जी हाँ, तो वे थोडी देर के लिए तौलिया मुझसे ले गए.


मै अभी अपनी काको गीला कर ही रहा था की वे वापस आये और कहने लगे इसके बाद आप इसे सूखे तौलिये से साफ करेंगे। मैंने कहा हाँ और ये सुनते ही वे महाशय शुरू हो गए सूखे कपडे से मेरी कर को साफ़ करने। मैंने कितना कहा की रहने दीजिये पर उन्होंने कहा की "मै अपने दोस्त का इन्तेज़ार कर रहा हूँ और आपको मिलकर देखकर आपकी साथ हाथ बांटने का मन कर गया". इतने में उनके दोस्त भी आ गए लेकिन उन महाशय ने पूरी कर साफ़ करके ही दम लिया.


इस दौरान उनसे गुफ्तगू भी हुई और मालूम पड़ा की वे (श्री हरीश जी) सम्मानित बैक में बिजेनेस एड्वाइसर है। और उनके दोस्त (श्रीराम)भी किसी अन्य बैंक में। दोनों चिन्नई से ताल्लुक रखते है. वे लोग मेरी बगल वाली १७ मंजिला ईमारत में रहते है. मै पिछले ८ साल से यहाँ रह रहा हूँ पर पहले कभी मुलकात नहीं हुई।


इस घटना को यहाँ लिखने का मतलब यह है की आज भी इंसानियत किसी न किसी रूप में जिन्दा है। कही न कही वो भाव किसी कोने में छिपा है हम सभी लोगो के. उनके मांगे पर तौलिया देना (कोई बड़ा काम नहीं था) पर शायद उनको अच्छा लगा की न जानते हुए भी मैंने ॥ वो केवल धन्यवाद कह कर भी जा सकते थे लेकिन ये उनका दिल था जिसमे अभी कद्र बाकी है ...थोड़े को ज्यादा कर के लौटना या किसी के किये को हमेशा याद रखना ( कुछ यही सब हमारे बुजर्गो ने भी सिखाया पर कही न कही......)


जीवन में कुछ छोटी छोटी घटनाएं एक सन्देश दे जाती है और एक प्रेरणा भी.

मंगलवार, 23 जून 2009

सिसकियां लेती है मन की वेदना


सिसकियां लेती है मन की वेदना
झुंझलाती रहती है अपनी चेतना

हर मोड़ पर दिखते हैं अब बिखरे कांटे
ना जाने क्यों दिल से दिल को हम बांटे

प्यार का करते रहते है हम सब ढोंग
लेकिन हैं दुश्मन एक दूजे के हम लोग

खून मानवता का अब और सस्ता हुआ
जीना बेसुध दुनिया में और महंगा हुआ

अंगड़ाई जोश की लेती तो है जवानी
स्वार्थ कि खातिर बन जाती नई कहानी

फ़ैशन बन कर अब विलुप्त हो रही खादी
मूक रहकर खुली आंख से देख रहे बर्बादी

कुछ हक़ीकत है, कुछ है फंसाना
फ़िर भी जीने का ढूंढ़े हम बहाना
-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
( पुरानी कुछ रचनाओ में से एक आपके लिए )
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...