पृष्ठ

बुधवार, 7 अगस्त 2013

जिन्दगी कभी यूं भी ....




तूफ़ान से की थी दोस्ती, वो रोशनी बुझा गया
खौला था जो खून, अरमान सारे झुलसा गया
चला जब अंगारों पर, सपनो को जलाता गया
फूलो की ख्वाइश में, कांटो से छलनी हो गया

माना था जिसे दोस्त,  वो दुश्मनी निभा गया
समझा जिसे अपना,  वो आज पराया हो गया
वफ़ा की थी जिससे उम्मीद, वो बेवफा हो गया
दस्तूर दुनिया का, जिसे चाहा वो दूर हो गया

किया जुर्म दिलो ने, लम्हो से शिकायत हो गई
माँगा मशविरा अपनों से, बात अपनी आम हो गई
दुश्मन की चाल 'प्रतिबिंब' काम अपना कर गई
धोखा दे गई किस्मत और बदनाम हमें कर गई  

शनिवार, 27 जुलाई 2013

सलाम टेलीग्राम


फेसबुक समूह 'तस्वीर क्या बोले' में लिखे गए भाव 


~सलाम टेलीग्राम~


सेम्यूल मोर्श की सोच ने विश्व को दी थी ये नई सौगात
दूर संचार में हुई क्रांति, जब टेलीग्राम का हुआ अविष्कार
२४ मई १८४४ को पहला टेलीग्राम वासिंगटन से बाल्टीमोर
संक्षिप्त में हर खबर पहुँचाने का फिर देश में हुआ विस्तार

छुट्टी आना हो, नौकरी मिलना हो या फिर हो कोई भी अवसर
टेलीग्राम से ही मिलता था तुरंत ही खुशी गम का हर समाचार
१६३ साल की संस्कृति को अब सदा के लिए लग गया विराम
इतिहास हुए अब मशीन की वो टूक-टूक-ट्रा, तारबाबू और तारघर

नई तकनीक का आना और फिर उसका यूं हमें विदा कहना
समझा गया हमें, जिन्दगी और रिश्तो का भी हाल यही होगा
चला गया उसे जाना था 'प्रतिबिंब', नई सोच को स्थान दे गया
अब म्यूजियम की शान बनेगा, टेलीग्राम तू हमें सदा याद रहेगा

[ https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/ ]

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

चलो जश्न मनाये .....



मैं आज गरीब नही हूँ
किसी को रहम आया
जलेबी ब्रेड मेरे नसीब में आया
आज मैं खुश हूँ
देश की ६५ सालो की गरीबी दूर हुई
गरीब का मूल्य ३० रुपये ठहराया
और गरीबी को आंकड़ो से दूर भगाया

चलो आओ खुशियाँ मनाये
दाल रोटी हम १२ रुपये में खाएं
अरे सरकारी नेताओ
फ़ूड सिक्योरिटी बिल पर क्यों करोडो लगाते?
जब ५ और १२ में खाना मिल जाता
गरीब और अल्पसंख्यंक आज भी वही खड़ा है
तुम्हारे वादों के अहसान तले ज्यों का त्यों दबा पड़ा है

पर अब मजाक करने की भी हद होती है
मार रहे हो हमें दिन प्रतिदिन महंगाई से
जलता है रोज कलेजा
उस पर नमक छिड़क रहे हो
उड़ा लो हमारी तुम खूब खिल्ली
चलो मान ली आपकी दरिया दिली
५ रुपये में मिलेगा भर पेट खाना
लेकिन ५ या १२ रुपये मैं कहाँ से लाऊं ???


-    -  प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

रविवार, 21 जुलाई 2013

हैल्लो जिन्दगी



नमस्कार जिन्दगी !
न जाने तुम कब आगे निकल गई
सुप्रभात, नमस्कार को छोड़ पीछे
अब तुम 'हैल्लो जिन्दगी' हो गई

अपनाया था अपना समझ
आज तुम पराई हो गई
खेल रही हाथो में उनकी
दौड़ पूर्व से पश्चिम की हो गई

खो दिया अपनी अमानत को
भारतीयता अब 'इन्डियन' हो गई
संस्कार और संस्कृति हमारी
शायद अब कोई भूली कहानी हो गई

सोचा था विरासत अपनी सौंप देंगे
पर ये पीढी खुद में सिमट कर रह गई
देखे थे सपने बहुतेरे पर जागे नही
जब जागे तो उम्मीदे सब स्वाहा हो गई

नमस्कार जिन्दगी !
अब तुम 'हैल्लो जिन्दगी' हो गई

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

बुधवार, 17 जुलाई 2013

मेरा पहाड़ (त्रासदी के एक महीने बाद )




आज
एक महीना हुआ
पहाड़ में हुई उस तबाही को
उस मंजर की तस्वीरे
उस त्रासदी के वीडियो
उस विपदा पर बहस
उस राहत पर राजनीति
शायद कुछ दिनों में बंद हो जाए

लेकिन
मेरे पहाड़ पर आपदा
मेरे पहाड़ ने जो सहा
मेरे पहाड़ ने जो देखा
वर्षो वर्षो तक इसका दर्द
दर्द बनकर ही रहेगा
अपनी जमीन अपने लोग
अपने जंगल अपने रास्ते
अपने गाँव अपनी विरासत
जिन्हें हम खो चुके है
मेरा पहाड़ कैसे भूल पायेगा

हाँ
वक्त के साथ फिर निर्माण होगा
मेरा पहाड़ फिर चार धाम होगा
पर्यटकों का फिर आवागमन होगा
मेरे पहाड़ के लोग फिर खड़े होंगे
भूलो को सुधार फिर जीना सीखेंगे
अपनी गलती से सीख फिर
खूबसूरत पहाड़ का निर्माण करेंगे

हाँ
आज श्रधांजलि उन्हें
जो लौट कर न आये
भगवान की शरण गए
और उनके ही हो गए

हे प्रभु
था तो कठोर तुम्हारा निर्णय
किया अपनों को अपने में विलय
बस अब तुम रक्षा करना
कुछ गलत न हो अब ध्यान रखना
सद्बुद्धि दे  हमें आशीर्वाद बनाये रखना

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

सोमवार, 8 जुलाई 2013

मेरा पहाड़




मेरा पहाड़
है भूमि देवो की
मेरा पहाड़
है विरासत संस्कृति की,
मेरा पहाड़
है कहानी संस्कार की
मेरा पहाड़
है मिसाल मानवता की

मेरा पहाड़ और उसका दिल
आज रोता है
मेरा पहाड़ और उसका हौसला
टूटा है
मेरा पहाड़ और उसका सम्मान
गिरा है
मेरा पहाड़ और उसका भगवान
रुष्ट है

मेरे पहाड़ को
अपनों ने तोडा और मरोड़ा है
देख लिया नतीजा
अब शमशान बना कर छोड़ा है
राजनीति का खेल
इंसानियत ने यहाँ दम तोडा है
डूब गए ख्वाब
लेकिन अभी जीना नही छोड़ा है

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

शनिवार, 29 जून 2013

मैं पहाड़



मैं पहाड़


हाँ मैं पहाड़ !!
यूं तो पहाड़
हर जगह  विद्दमान है
मेरी खूबसूरती और मौसम
मनुष्य के मन को
शांति और सुकून देती है
शायद इसलिए
तुम्हारी आस्था के भगवान भी
सदियों से यहाँ विराजमान है ......

लेकिन समय के साथ
विकास के नाम पर
मेरे सीने पर इन्सान ने
विनाश की इबारत बना दी है
भगवान के नाम पर
न जाने कितने भगवान
मुझ पर बेहिसाब लाद दिए
पर्यटन के नाम पर
बेहिसाब दुकान और होटल
मुझे खोखला कर रहे है

जंगल और पेड़ मेरा अस्तित्व
आज विकास की भेंट चढ़ गए
नदियों से मेरा जीवन
जिसके किनारो को तुमने हड़प लिया
हे मानव !! अपने जीने के लिए
तुम क्यों मेरा जीना दुश्वार कर रहे


उत्तराखंड !! हाँ ये देव भूमि है
मैंने सैकड़ो देवी देवताओं को
अपने में है  स्थान दिया
शांति पहाड़ो का आचरण है
शोर से तुमने खलल डाला है
हे मानव !! तुम्हारे स्वार्थ ने
मुझे आज फिर छलनी किया
बना कर पाप का भोगी मुझे
देवी - देवताओ को रुष्ट किया
नदियों के प्रवाह से खेलना महंगा पड़ा
कई गाँव, घर और जानो को समां दिया  

ना चाहते हुए भी, कई बार तुम्हे
तुम्हारी गलती का अहसास कराया था
तुमने न सबक लिया न कोई प्रयास किया
बार बार फिर वही काम और बेहिसाब  किया
दुःख है मुझे कि तुम्हे इस बार सबक सिखाने
निर्दोष भी, भक्त भी मेरे गुस्से का शिकार हुए
शायद यह नुकसान तुम्हे याद दिलाता रहे
और तुम खुद को  और मुझे अब जीने दोगे.....




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शनिवार, 22 जून 2013

बाबा विनती तुझसे ....



बाबा इस कहर में भी, तेरा अस्तित्व आज यूं ही कायम है
जता दिया तूने आज भगवान और इंसान में अंतर क्या है
गलती जिसने भी की, दंड उसका तूने सबको दे ही दिया है
ली तूने बलि हजारो की, तेरे सिवाय वहां अब बचा क्या है

मंदाकनी के क्रुध प्रवाह को रोक तूने खुद को बचा लिया
खुद के मान सम्मान को तूने हमारी श्रद्दा से तोल दिया
कुछ को दी जिंदगी, कुछ को तूने अपनों से छीन लिया
लाखो करोडो भक्तो का तूने, श्रद्धा-विश्वास हिला दिया

श्रद्धा में शायद कमी हुई, दिखावा क्योंकि अब ज्यादा है
पवित्र स्थलों में प्रदूषण और चोर बाजारी अब ज्यादा है
प्रकृति व् पर्यायवरण को रख ताक, तेरा नाम भुनाया है
जंगल नदियों से खिलवाड़ का सबको सबक सिखाया है

अब रहम करना और इस कहर से तू सबको बचा लेना
हुई जो गलतियाँ हमसे, सुधार उन्हें तू रास्ता दिखा देना
प्रकृति व् भगवान का रिश्ता समझे अब तू शरण में लेना
अब रूठना नहीं यूं , हर विपदा से बाबा तू हमें बचा लेना

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

शुक्रवार, 14 जून 2013

ताजा खबर - आम आदमी



मोदी की जय जयकार से आडवाणी जी को चढा बुखार
नितीश को लगा झटका, न सुनी भाजपा ने उसकी पुकार
मोदी है वो कदम जो सत्ता तक ले जाये, ये हुआ संचार
सोचा गठ बंधन में पहले मजबूत करे हम अपना आधार

मान गए थोड़ा आडवाणी, भाजपा को कुछ राहत हुई
मान मनोवल से मना लिया, पर साख कुछ आहत हुई
जदयू ने कुछ गणित किया, तेवर दिखलाने शुरू किए
देश की नही सोच अभी भी, विपक्ष को सबने शस्त्र दिए

अल्पसंख्यंक के नाम पर संप्रदायिकया को भुनाते हैं सब
इतने वर्षो में अल्पसंख्यंकों का उद्दार किस ने किया कब
वोट बैंक है गरीब और अल्पसंख्यंक, इंका भला होगा कब
इसे भुनाने और जीतने की खातिर ख्याल आता है जब तब

साख लिपटी घोटालो मे, मुंह काला किया कोयले की दलाली मे
सीना चौड़ा, मुंह मे कडवे बोल, हुये बेशर्म राजनीति के खेल मे
भाजपा का भी कांग्रेसी करण हुआ आज निजी स्वार्थ के क्षेत्र मे
देश की सोच कहीं पीछे छूटी, लड़ते हैं अपना अस्तित्व बचाने में

मैं आम आदमी, रोटी कपड़ा और मकान के लिए करता काम
सोच रहा हूँ किस दिन कोई नेता, दिल से लेगा हमारा नाम
एमएलए/एमपी का फंड मिलता उन्हे, कब करेंगे हमारे नाम
वोट देते एक आस में, मिले रहने को छत, भूख मिटे सुबह शाम

- प्रतिबिंब बड़थ्वाल 

गुरुवार, 6 जून 2013

डॉ माधुरी बड़थ्वाल और लोक संगीत - एक परिचय

डॉ माधुरी बड़थ्वाल और लोक संगीत - एक परिचय 



ज मुझे आप मित्रो से डॉ माधुरी बड़थ्वाल का परिचय करवाते हुये हर्ष हो रहा है।

ढाई वर्ष की उम्र से संगीत, सुरों और नृत्य से प्रेम करनी वाली छोटी बालिका आज किसी परिचय की मोहताज तो नही लेकिन मेरा प्रयास इस नाम को उन सब लोगो तक पहुँचाने का है जो इस व्यक्तित्व से परिचित नही थे मेरी तरह।

डॉ. माधुरी बड़थ्वाल जी ( जन्म 19 मार्च 1953 ) आल इंडिया रेडियो की प्रथम महिला म्यूज़िक कम्पोजर है। उन्होने बड़े पैमाने पर उत्तराखंड के लोक संगीत (गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी) के प्रचार, पलेखन और सरंक्षण के लिए पिछले 45 सालो से निरंतर कार्य किया है। उन्होने इसके लिए बड़ी मात्रा मे भ्रमण कर उत्तराखंड के हर उम्र के कलाकारो को पहचाना। सैकड़ो विद्यार्थियो को उन्होने सिखाया भी और निर्देशित भी किया। उन्होने उत्तराखंड के दुर्लभ वाद्य यंत्रो को दस्तावेज़ के रूप मे सँजोया भी है और उन्होने परम्पराओ को अपनी सोच के साथ सहेजने का प्रयास किया है। उन्होने लोक संगीत के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत को मिश्रित किया है। डॉ माधुरी ने उत्तराखंड के कई पुराने और अंजान कलाकारों जैसे जमुना देवी, भगीरथी देवी, बसन्ती देवी को भी रिकोर्ड किया है
लोकगायक चन्द्र सिंह राही के साथ           व्      पारंपरिक वेश भूषा मे डॉ माधुरी बड़थ्वाल 

५ साल की उम्र मे ताऊ जी की कही बात को दिल पर लेकर, उनके द्वारा दिये गए एक आने को वहीं रखकर, परिश्रम को हथियार बनाकर ज़िंदगी मे आगे बढ़ने की सोच और भाई बहनो को पढ़ाई के लिए प्रेरित करना उन्होने मकसद बना लिया। प्रकृति के सुरमय सहज व अनुशासित नगर लैन्सडाउन मे अपनी शिक्षा की शुरुआत की। पिता श्री चंद्रमणि उनियाल [गायक व सितारवादक भी] ने समाज की विपरीत टिप्पणियॉ को नज़र अंदाज करते हुये प्रयाग संगीत समिति मे विधिवत संगीत की शिक्षा दिलाई। डॉ माधुरी ने हाई स्कूल करते ही अपनी मेहनत के बलबूते संगीत प्रभाकर की डिग्री हासिल कर ली और फिर  अपने ही विद्यालय राजकीय इंटर कालेज लैंसडाउन मे संगीत अध्यापिका के पद पर कार्य किया। प्रथम गुरु श्री गणेश केलकर, गुरु श्री ज्वाला प्रसाद गुरु श्री मकसूद हुसेन [सारंगी वादक] से संगीत और राग रागिनियों की बारीकियों का अध्ययन किया। उन्नति के मार्ग पर अग्रसर माधुरी जी को आकाशवाणी नजीबाबाद मे प्रथम महिला म्यूज़िक कम्पोजर [ तत्कालीन केंद्र निदेशक श्री एस के शर्मा के अनुसार ] के रूप मे अखिल भारतीय स्तर पर पहचान मिली। इस दौरान माधुरी जी ने सैकड़ो संगीत, नाटको और रूपको का कुशल निर्देशन, लेख्न और निर्माण किया। नानी जी, ताई जी व माता जी से के साथ कई बुज़र्गों के द्वारा गढ़वाली भाषा [मुहावरे, लोकोक्तियाँ, लोकगीतो लोक गाथाओ व कथाओं ] का गूढ ज्ञान विरासत रूप मे प्राप्त किया और वही हिन्दी मे स्नातकोर करने के साथ ही संगीत और साहित्य का अनूठा रिश्ता बनाता चला गया। ।

डॉ मनु राज शर्मा व् डॉ माधुरी बड़थ्वाल 

पति डॉ मनुराज शर्मा [ जो संगीत के मर्मज्ञ थे] गढ़मोला गाँव पौड़ी,  की प्रेरणा से शोध कार्य [उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर] मे स्वयं को तल्लीन कर और पांडुलिप्पी तैयार की।  नजीबाबाद से प्रसारित धारावाहिक 'धरोहर' का सृजनात्मक प्रसारण किया जिसमे उनके द्वारा संग्रहित धरोहर का उपयोग हुआ और पुनमूर्ल्याकन भी हुआ। इसी बीच ३ अक्तूबर २००३ मे डॉ मनुराज ने माधुरी जी का साथ छोड़ परलोक सिधार गए। कठिनतम और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, पति की मृयु के तीन बाद ही स्टुडियो मे बैठ 'धरोहर' का निर्माण किया - डॉ मनुराज का स्नेह और उनकी प्रेरणा ने ही उनमे यह आत्मविश्वास बनाए रखा। परिवार मे ज्येष्ठ सतीश चंद्र बड़थ्वाल जेठानी चन्द्रकला बड़थ्वाल व भतीजी नीरा बड़थ्वाल ने इस वक्त पर उन्हे और परिवार को मनोबल दिया। अपने शोध कार्य के लिए उन्हे बहुत लोगो का साथ मिला जिसमे उनके परिवार के सदस्य ससुर श्री संतन बड़थ्वाल [पूर्व विधायक], पुत्री येन्नी मदालसा, पुत्र मानस मनु और मानवेन्द्र मनु का योगदान सराहनीय है


अब डॉ माधुरी बड़थ्वाल संगीत को अपनी संस्था ' मनु लोक सांस्कृतिक धरोहर संवर्धन संस्थान'  के माध्यम से सँजोये रखने के प्रयास मे कार्यरत है समर्पित है । डॉ माधुरी लोक संगीत पर शोध करने वाले देश और विदेशो के शोध विद्यार्थियों का मार्ग दर्शन करती है। संस्कृति विभाग में लोक कलाकारों को सूचीबद्ध करने में डॉ माधुरी ने निर्णायक भूमिका निभाई। आज भी उन्हें आल इण्डिया रेडियो या उत्तराखंड के कई आयोजनों को मुख्य अतिथि के रूप में निवेदन किया जाता है निमंत्रित किया जाता है। नारी सशक्तिकरणके लिए उनके प्रयास व् कार्य सराहनीय है।


उत्तराखंड के संगीत व लोक संगीत की धरोहर के लिए कार्यरत डॉ माधुरी बड़थ्वाल जी को कोटि कोटि प्रणाम और हमारी शुभकामनायें।
उत्तराखंड के सुर सम्राट नरेंद्र सिंह नेगी जी के साथ [ फोटो सौजन्य डॉ माधुरी बड़थ्वाल]

चलते चलते सुनिए सुर सम्राट नरेंद्र सिंह नेगी जी के साथ गाया डॉ माधुरी जी का ये गीत 'स्याली बसंती'



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...