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गुरुवार, 19 नवंबर 2020

भूल न पाये उनको



समय अपना दिया हमने जिनको

समय ने न जाने कब से बदल दिया उनको

सच कहूँ भूल न पाये हैं हम उनको

 

ख्यालों में भी ख्याल था जिनका

इस राह में हमारा ख्याल भी न आया उनको

सच कहूँ भूल न पाये हैं हम उनको

 

तोड़कर रिश्ता मुस्कराते हैं वो

नम आँखों में उभरा दर्द मेरा न दिखा उनको

सच कहूँ भूल न पाये हैं हम उनको

 

न मिलते वो तो अच्छा होता

अब प्यार से इतनी नफरत न होती हमको

सच कहूँ भूल न पाये हैं हम उनको

 

टूट कर चाहना हसरत थी

इस राह में चाहा भी हमने और टूटे भी हम

सच कहूँ भूल न पाये हैं हम उनको

 

ढूंढते हैं सब में हमको ही

यह पैमाना मोहब्बत का हमने दिया है उनको

सच कहूँ भूल न पाये हैं हम उनको

 

कभी मुस्करा जाते है हम 'प्रतिबिंब'

दर्द छुपा-छुपा कर भूल न पाये हैं हम उनको

सच कहूँ भूल न पाये हैं हम उनको

 

-         प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १९/११/२०२०


शनिवार, 14 नवंबर 2020

आपकी ये दिवाली, हर दिवाली – शुभ हो

 



आपकी ये दिवाली, हर दिवाली – शुभ हो

 

सबके मन मंदिर में आध्यात्म का – वास हो

सफलता, स्वस्थता व खुशियों का – साथ हो

प्रकाश का ये पवित्र संस्कृति पर्व - शुभ हो

कर्म - धर्म हम सब के जीवन का – सार हो  

राम के भाव का हमारे हृदय में - आगमन हो

बुराई के रावण का मस्तिष्क से – गमन हो

आपकी ये दिवाली, हर दिवाली – शुभ हो

 

अराजकता व भारत के दुश्मनों का - नाश हो

हर माँ, बहन, बेटी के सम्मान की – रक्षा हो

शिक्षा भारत का आधार बन – एक प्राण हो

राष्ट्रहित में सभी विचारधाराएँ – एक साथ हों

भारत में गरीबी का जड़ से  – उन्मूलन हो

नागरिकों में संस्कारो का पुन: - जागरण हो

आपकी ये दिवाली, हर दिवाली – शुभ हो

 

मेरे तिरंगे का सबके दिल में – गौरव हो 

सबसे अलग मेरे भारत का - वैभव हो

मेरे देश के सभी जवानों का – मान हो

दुनियाँभर में राष्ट्र का मेरे – सम्मान हो

मेरे भारत की संस्कृति का – प्रसार हो

भारत विश्व गुरु बने व जग में - शांति हो   

आपकी ये दिवाली, हर दिवाली – शुभ हो

 

आपकी ये दिवाली, हर दिवाली – शुभ हो

 

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल / १४/११/२०२०


गुरुवार, 12 नवंबर 2020

बूझो तो जाने ?

 



सबसे बात करता हूँ, मैं बातचीत नहीं करता हूँ

मैं खूब लिखता हूँ, पर पढ़ता किसी को नहीं हूँ

अपनी सुनाता सबको हूँ, मैं सुनता बिल्कुल नहीं हूँ

रखता हूँ अपना रुतबा, समझता किसी को नहीं हूँ

 

अपना ढिंढोरा पीटता हूँ, नाम किसी का भाता नहीं

सोच अपनी ही रखता हूँ, किसी का मैं सोचता नहीं

शब्दों का बना ठेकेदार हूँ, शब्द किसी के चुनता नहीं

सबका बनना चाहता हूँ, किसी को अपना बनाता नहीं

 

किस को जोड़ना किसे छोडना, जांच परख कर लेता हूँ

खुद्गर्जी से रखता हूँ नाता, अपना भला मैं देख लेता हूँ  

प्रेम का बनकर अनुयायी, प्रेम जाल अक्सर बुन लेता हूँ  

करे कोई अगर मेरी निंदा, उससे मैं किनारा कर लेता हूँ

 

मुझे यहाँ - वहाँ तुम ढूंढो, मैं अपनी कहते दिख जाता हूँ

कहो कोई काम तुम मुझे, बहाने तब हज़ार बना लेता हूँ

समय का रखता ख्याल, किसी को मैं समय नहीं देता हूँ

समझ तुम गए हो मुझे अब तक, तुम्हीं बताओ मैं कौन हूँ

 

बताओ मैं कौन?

(खुद में झांकना जरूरी)

 

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल – १२/११/२०२०


बुधवार, 11 नवंबर 2020

भीड़

 


भीड़

 


भीड़ भी न, भीड़ को ही

आकर्षित करती है और

पढ़ा लिखा इंसान भी

जाने अंजाने ही सही

इस भीड़ का हिस्सा बन जाता है

और बिना सिर पैर के

मुद्दे को भी मुद्दा बना देता है

संवेदनशीलता और शर्म का

उड़ता मज़ाक, व्यंग्य के नाम पर।

और खारिज हो जाती है

सारी मर्यादाएं। 

भीड़ में वो संजीदा इंसान

बेहूदा बात में भी खुद को

चर्चा मे शामिल कर लेता है।

 

आवश्यक बातों पर भी

उस भीड़ को

खींचना मुश्किल होता है

क्योंकि भीड़ अभी भी

उस भीड़ का ही

अनुसरण कर रही है

गलत सही की

परवाह किए बिना 

हाँ, वहाँ

प्रत्युतर भी दे रही है

शायद पहचान बना रही है

भीड़ कहो या भेड़ चाल

यहां सबका यही हाल।

 

खास हो या आम

सब गिन रहे

गुठलियों के दाम

कहीं बिक रहा नाम

कोई हो रहा बदनाम

और तो और

चाहे अनचाहे

भीड़ में ही, स्वयं को पाया

इसलिए दोस्तों चला आया

इस भीड़ का संदेश,

इस भीड़ के ही नाम देने।

 

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ११/११/२०२०

मंगलवार, 10 नवंबर 2020

कोरोना से पहले कोरोना के बाद

 


कोरोना से पहले कोरोना के बाद


जिंदगी जैसे भी थी

चल रही थी, कट रही थी

चाहे थी स्वार्थ से भरपूर

किस्से कहानी बनती

वास्तविकता से कहीं दूर

सामाजिक वातावरण मे

राजनीति की भयंकर घुसपैठ संग

अल्प और बहु से जुड़ती संख्या

जिनकी ठेकेदारी जताते

और टकराव कराते चिन्हित चेहरे

राष्ट्रवादी और द्रोहियों

के बनते उभरते समीकरण

देश से, व्यवस्था से

दुश्मनी निभाते सत्ता से वंचित लोग

सब के बीच चल रही थी जिंदगी


चीन से कोरोना ने आकर

इस जिंदगी में कर दी टांग अड़ाई

आपस मे दूरी की खाई बढाई

अनगिनत स्वार्थी मुखौटो पर भी

एक मास्क और चढ़ावाया।

मिलना - जुलना हुआ निषेध

व्यक्ति - व्यक्ति में होने लगा भेद

कोरोना ने फिर भी लगाई सेंध


कोरोना से उठाने फाइदा

राजनीति भी खूब परसाई

कुछ राज्यों ने हराने केंद्र को

बीमारी से कर दी हाथ मिलाई

रोजगारो को खुला छोड़कर

राज्य की अपनी विवशता जतलाई

हर आवाहन का उड़ाकर मजाक

नागरिकों का जीवन रख दिया ताक

फिर भी कालर सबने ऊंचे किए

इस जंग से लड़ने के ज्यों गुर सीख लिए

सबको सता रही केवल आमदनी की चिंता

क्या आम, क्या खास सबका लगा पलीता


सेनीटाइजर, मास्क, गल्वस और जांच किट

इन सब कंपनी की हो गई आमदनी लिफ्ट

लॉकडाउन पर उठाकर सवाल करते बवाल

भयंकर बीमारी में भी कुछ हुये मालामाल

अब जीवन मास्क व कोरोना दोनों संग चलेगा

नियमो का पालन, वैक्सीन तक जारी रहेगा

इस कठिन दौर में मानवता का ध्यान रखना

मिलना - जुलना कम पर प्रेम बनाए रखना।


 


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १०/११/२०२०


रविवार, 8 नवंबर 2020

तनिक ठहरो!

 
 
अहसासों के पहाड़
चढ़ने से पहले
वास्तविक धरातल पर
उसका तुम निरक्षण कर लो
तनिक ठहरो!
 
संचित है जो भाव
उनका आत्ममंथन कर लो
मर्यादित है जो शब्द
उन शब्दों की पुष्टि कर लो
तनिक ठहरों!
 
संशय और शंका का
तुम पहले निवारण कर लो
देख वैभव छल का
प्रतिस्पर्धा से तुम दूरी कर लो
तनिक ठहरो!
 
प्रेम है जो उभरा
पुन: उसका परीक्षण कर लो
होगी स्वीकृति या अस्वीकृति
इसका अवलोकन कर लो
तनिक ठहरों!
 
आग्रह है या आज्ञा
भेद तुम थोड़ा समझ लो
समर्पण से पहले
निष्ठा को धारण कर लो
फिर मत ठहरो !!!!
 
 
-    प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ०८/११/२०२०

गुरुवार, 5 नवंबर 2020

मेरी अदालत और फैसला

 


मेरे हृदय और 

मस्तिष्क के पटल पर 

अंकित है 

कई घावों के निशान 

कुछ भरे - भरे से

कुछ अभी भी रिसते हुये 

कुछ नासूर बन 

शिकायत को मजबूर

ना चाहते हुये भी 

पेश कर देता हूँ

कई बार उन्हें

खुद की अदालत में। 

 

खुद की पैरवी करते हुये

दर्जनो केस तारीख पर

लाइन लगाए खड़े है 

निर्णय में कुछ 

आजीवन मुक्ति की सज़ा पा जाते हैं 

कुछ तारीख पा हिस्सा बने रहते हैं  

और कुछ स्मृति से 

मिट जाने की कड़ी सज़ा पा जाते है   

 

स्मृतियों की काल कोठरी में

बंद है इसमें सैकड़ो चेहरे

और

उन चेहरों से सरकते मुखौटे

भावनाओं को कुचलती 

सपनों को तोड़ती हुई

बेजान वेदनाओं और 

यातनाओं की लंबी सूची है

खिलखिलाहट 

और उम्मीद का घुटता गला

छटपटाता तो है पर 

चीख कर भी शोर नहीं कर पाता है 

 

संघर्ष मुझे करना है, जानता हूँ    

वक्त के छिपे प्रहार 

और किस्मत की मार 

करते है मेरे जीवन का शृंगार

यह भी जानता हूँ 

कई चेहरे शामिल है 

मुझे हराने की साजिश में

 

लेकिन उन्हें 

बेनकाब तो करना है

आज नहीं तो कल 

जो खोया है वो पाना है

रुक जाना नहीं, चलना है 

साम, दाम, दंड, भेद 

का कहीं अनुसरण कर 

कर्तव्य, निष्ठा और समर्पण

इस युद्ध में मेरे शस्त्र है 

मंजिल जो मेरी लक्ष्य बनी 

बस मुझे अब वहाँ पहुँचना है 

ये मेरी अपनी अदालत में

दिया गया  

चंद पंक्तियों का फैसला है  

 

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ०५/११/२०२०



सोमवार, 19 अक्टूबर 2020

~ये कतरनें~

 










वर्षो पहले

जब तब


कुछ देखा

कुछ सोचा

कुछ भाव

कुछ चाह

कुछ खोया

कुछ पाया

कुछ अनकहा


कोई हार

कोई जीत

कोई निवेदन

कोई अवसर

कोई घटना

कोई दुआ

कोई दवा


कभी प्यार

कभी घृणा

कभी रोष

कभी जोश

कभी अंहकार

कभी स्वीकार

कभी आक्रोश


ये कतरनें

ढ़ोती रही

कलम प्रहार

सहती रही

हर खरोच

फिर भी

मेरा लिखा

बन सखा

बन विश्वास

मेरे संग

चलती रही

ये कतरनें


-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १९\१०\२०२०


रविवार, 11 अक्टूबर 2020

~ कारण ~

 






तुम और मैं

अकारण नहीं हैं

कारण हैं

एक दूसरे के

जीवन में होने का

सहमति, समझौते और

तालमेल के बीच

कारणों की लंबी भूमिका लिए


हाँ

दखलनन्दाजी

की सीमाओ से परे

कुछ उत्तरदायित्वों के साथ

कर्तव्य की कसौटी पर

परीक्षाएँ देते हुये

क्रमागत होते हुये

कर्मण्यता से

परिपक्वता से

कारण को

कारण बनाते हुये


हाँ

तेरा होना, मेरा होना

तेरा मुझ में होना

मेरा तुझ में होना

प्राथित नहीं है

नियति व प्रारब्ध का

संचित फल है

जो

एक दूजे के लिए प्रारक्षित है

स्वीकृत है तन से मन से

हर परिस्थिति में

चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल हो

कारणों की हर भूमिका का

निर्वाहन ही कारण है

तेरे मेरे होने का।


- प्रतीबिम्ब बड़थ्वाल ११/ १०/२०२०


गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

जीने का राग

 





कामनाओं के जल से नहाकर, प्रेम से शृंगार करती है

बिछता आंचल नेह का, तब आकुलता विश्राम करती है

सौन्दर्य वाटिका सा भ्रमित, पल पल विस्मय से भरती है

प्रेमरस की खुशबू से, अब वो जीने का राग सुनाती है


होकर दृढ़ समर्पित, रोम रोम यौवन का भान कराती है

धधकते अनल ज्वार, को अपने प्रेमतप से बुझा जाती है

हो शरणागत प्रार्थना सी, तन मन में व्याप्त हो जाती है

प्रेमरस की खुशबू से, अब वो जीने का राग सुनाती है


बरसा कर प्रीत अपनी, कभी दूर कहीं गुम हो जाती है

गूंजती है सदा उनकी, तब आँखे देखने को तरस जाती है

प्रणय की कविता बन, क्षितिज सी हर पल मुझे लुभाती है

प्रेमरस की खुशबू से, अब वो जीने का राग सुनाती है


विचलित होते हृदय पर, असंख्य प्रेम पुष्प बरसाती है

टूटती हुई उमंगो पर, तपते अधरों से उतर दे जाती है

शून्य हुए अरमानों को, चाहत का प्राण तत्व दे जाती है

प्रेमरस की खुशबू से, अब वो जीने का राग सुनाती है


व्याकुल प्राणों को आश्रय देती, नीरसता को हर लेती है

गर्म लहू से उठती जो चिंगारी, प्रेम सुधा से बुझा देती है

बन छाँव मरूस्थल में मेरे, अपने उरस्थल से लगा देती है

प्रेमरस की खुशबू से, अब वो जीने का राग सुनाती है


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल, २३ अप्रैल २०२० 


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