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गुरुवार, 9 सितंबर 2010

आओ सोचे..



रोटी रोटी करता है हर गरीब का पेट
स्वाभिमान से नही भरता गरीब का पेट
ईमानदारी से नही भरता गरीब का पेट
सांतवना से नही भरता गरीब का पेट

एक रोटी मिल जाये अगर
पेट शायद उसका भर जाये
जीने की आस शायद
आज उसे फिर मिल जाये

पेट पर हाथ फेरता है
हर कोई खाने के बाद
गरीब पेट पकड कर सोता है
हर शाम ढल जाने के बाद

खा पी कर मस्त है
जनता हो नेता हो या अभिनेता
गरीब तो बस सोचता है
काश एक रोटी का इंतज़ाम कर लेता

चित्र मे दिखता है
लेखो मे नज़र आता है
कविता मे नज़र आता है
क्या गरीब का पेट इस से भर जाता है

खा पी के सोचे हम
गरीब का खाली है क्यो पेट  
बस लिख कर वाह वाही बटोर कर
क्या भर पाते है हम इनका पेट

आओ अब मिल कर सोचे
अब तो भर चुके हम अपना पेट
बस एक सोच जगानी है
कैसे भरे अब हम उनका पेट

प्रतिबिम्ब बडथ्वाल, अबु धाबी, यूएई
[यह कविता मात्र रचना के लिये नही है आप एक हल भी लिखे]

बुधवार, 1 सितंबर 2010

रास्ते मे...



रास्ते मे...
अनगिनत लोगो से मुलाकात हुई

कोशिश थी कि सभी
हमराही बन कर साथ चले
उनके कदम के साथ मेरे कदम चले
मालूम न था कि
दो कदम साथ चल कर
वे रास्ता बदल लेगे
किसी और के साथ अब
कदमताल करने लगेगे
दो कदम चलने मे
आशा और विश्वास का
जो दीप जलाया था
उसे ही बुझा कर चले गये

एक दूजे को देख हाथ बढाया
लेकिन शायद फिर इरादा छोड दिया
वह खुद ब खुद खडे रह गये
और हम आगे निकलते रहे
सोचा था कि हम भी रुक जाये उनके साथ
लेकिन इशारा उन्होने कुछ येसा किया
कि हम चलने को मजबूर हो गये
अकेले ही इस राह मे चलने लगे
फिर कुछ अज़नबी अपने हो गये
साथ चलने का भरोसा फिर देने लगे

रास्ते मे
अनगिनत लोगो से फिर मुलाकात हुई
कुछ गिनती मे शामिल हुये
कुछ अपनो मे शामिल हुये
कुछ दिलो तक पहुंच गये
कुछ ने दिल मे जगह बनाई

वैसे अब भी नही मालूम
ये भी कब मुझसे अज़नबी
सा व्यवहार करेगे
साथ चलेगे या फिर या
राह मे ही साथ छोड़ देंगे

रास्ते मे
अनगिनत लोगो से मुलाकात हुई

-प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, अबु धाबी, यु ए ई

सोमवार, 30 अगस्त 2010

नई सुबह का आगाज़ हुआ



कल की सुबह
शायद मेरी नही थी
उसमे वो बात नही थी
सूर्य की लालिमा भी
मेरे अहसास को निगल रही थी
मेरा मन झुलस रहा था
अनगिनत बातो से
जो मैने स्वयं संजोये थे
शायद कांटे थे जो खुद ही बोये थे
कल की रात भी काली थी
हर शख्स ने बुरी नज़र डाली थी
मेरे ज़ख्मो को हरा करने की ठानी थी
हर भाव में उलझी मेरी कहानी थी
चांद ने भी सौतेला व्यवहार किया
चांदनी ने भी मुझे शर्मसार किया
सुबह, दिन और रात का काला साया सा
मेरे जड़ चेतन को निगल चुका था
रह रह कर हर बात खंज़र चुभोती थी
दर्द और दर्द ही बस मेरी कहानी थी

लेकिन अब हर बीता कल याद नही
क्योकि नई सुबह ने दिखाई राह सही
एक नई सुबह का आगाज़ हुआ
रात का अंधियारा अब दूर हुआ
चलना है मुझे इस नई रोशनी मे
रास्ता तय करना है इस उज़ाले मे
मंजिल का अभी पता नही
लेकिन मंजिल अब मुझसे दूर नही
मन  में अब बोध हुआ
मस्तिषक मे अब शोध हुआ
संवेदना को पीछे अब छोडा
गैरो से अब मैने नाता तोडा
सीख पाया जो मै कल से
विश्वास पाया है मैने खुद से
वादा किया है अब रब से
सच को अपनाया है फिर से
आज सुबह ने फिर घूंघट खोला है
मेरी मुस्कान को फिर वापिस भेजा है
नया गीत लिखने का अब मन हुआ है
क्योकि एक नई सुबह का आगाज़ हुआ है।

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल, अबु धाबी, यूएई


शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

अकेला


मेरे चारो ओर है
सुन्दरता की चादर ओढे
धरती और आकाश
मै फिर भी अकेला

पहले
मै भी इस सुंदरता
का प्रतीक था
सावन का रंग
मुझ पर भी चढता था
हर कोई मेरी
बात भी करता था
मेरे फुलो और पत्तियो
को अपना बनाता था
बंसत भी
मुझ से शरमाता था
छांव का आसरा
पथिक मुझमे
ढूढा करता था



अब
समय बदल गया
मै वह नही रहा
मेरी खुशिया
मेरी उम्र के साथ
कुछ मैने
कुछ अपनो ने
छीन ली
अब मै
निसहाय मौन
खडा हूँ
सूख गई है काया
ना मोह ना माया
अब किसी को
मै न भाया
फिर भी अपनी
पहचान छोडे जा रहा हूँ
जब तक आप
रखना चाहते है
नही तो उखाड फैंकना
हर उस तस्वीर से
जिसमे मेरा
अभी कुछ अंश बाकी है

अकेला था
अकेला हूँ
फिर भी
आपके सामने हूं
जब तक रख सको
सहेज सको
संवार सको
या फिर
अलविदा कह दो!!!!

- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, अबु धाबी यूएई

बुधवार, 25 अगस्त 2010

अक्षर अगर शब्द बन जाये

अक्षर अगर .....
लफ्ज़ो से कुछ कहना चाहा उनसे, लफ्ज़ो ने साथ छोड दिया
हमने उनको चाहा "प्रतिबिम्ब"  उन्होने हमारा साथ छोड दिया


अक्षर ....
अक्षर कुछ नही बस अक्षर है
अक्षरो से कुछ होता नही असर है
बिखरे अक्षर समझा नही पाते है
जुड जाये तो बात बना देते है
भावो के लिये अक्षरो का मिलना जरुरी है
फिर अक्षरो का भावो मे ढलना जरुरी है

अक्षर अगर...
अक्षर अगर शब्द बन जाये
शब्द अगर भाव बन जाये
शब्द अगर प्यार बन जाये
शब्द अगर इज़ज्त बन जाये
शब्द अगर इंसानियत बन जाये
शब्द अगर देशभक्ति जगाये
शब्द अगर दोस्त बन जाये
शब्द अगर रिश्ते बन जाये
शब्द अगर समाज बन जाये
शब्द अगर दुशमन बन जाये
शब्द अगर तक्दीर बन जाये

अक्षर अगर शब्द.....
शब्द फिर भी अधूरे है
जब तक इनमे मन से विश्वास ना हो
जब तक इसमे मन से समर्पण ना हो
जब तक इसमे मन से  आदर ना हो
जब तक इसमे मन से  काम न हो
जब तक इसमे मन से  भाव न हो

अक्षर तब  शब्द बन ....
अक्षर तब  शब्द बन जाते है
जब आपकी बातो से सोच बदलने लगे
जब आपकी बातो से समाज जुडने लगे
जब आपकी बातो से ज़ज़्बात उभरने लगे
जब आपकी बातो से परिवर्तन आने लगे
जब आपकी बातो से महक फैलने लगे

अक्षर तब  शब्द बन जाते है!!!!!!!!

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल, अबु धाबी, यूएई

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

पागल कहती है ये दुनिया


पागल कहती है ये दुनिया
बूझे ना कोई मेरी बतिया
काटे नही कटती ये रतियाँ
बस जमाना बढाये दूरियाँ

पागल कहती है मुझे ये दुनिया

दिल मे बसे मेरे कुछ सपने
चाहू बस कुछ दिल से अपने
रट लगाये तो लोग लगे कहने
पागल है ये और इसके सपने

पागल कहते है मुझे मेरे अपने 

टूट कर चाहना भी पागलपन मेरा
इसमे लुट जाना भी पागलपन मेरा
भरोसा किया, था पागलपन मेरा
अहसास जताया,था पागलपन मेरा

ले डूबा मुझे ये पागलपन मेरा

दोस्त समझा, था पागलपन मेरा
अपना समझा, था पागलपन मेरा
समझाना अपनो को, था पागलपन मेरा
जगाना सबको चाहा, था पागलपन मेरा

आप को अपना बनाया, था पागलपन मेरा

आज मेरा सीधापन बन गया मेरा पागलपन
आज मेरा स्नेह बन गया मेरा पागलपन
आज मेरा कुछ कहना बन गया मेरा पागलपन
आज मेरा अनुभव बन गया मेरा पागलपन

फिर भी सबसे अलग है मेरा पागलपन


- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल, अबु धाबी, यूएई




रविवार, 22 अगस्त 2010

रेखा सीमा की......




सीमा क्या होती है
जो हद मे रहना सिखाती है
पहले मालूम न था
सोचता था मै
रिश्तो की सीमा 
उसके नाम से शुरु होती है
उस नाम के साथ रहती है
हर पल उसमे जीना
आदत सी थी

लेकिन अब समझ पाया
सीमाये दोस्ती की 
सीमाये प्यार की 
सीमाये मर्यादा की
सीमाये रिश्तो की 
सीमाये हक की
सीमाये अपनो की

इन सीमाओ पर 
अब रेखा खिंच चुकी है
एक रेखा 
जो आप को आपका 
स्थान दिखाती है
आप कौन है
आपका चेहरा दिखाती है
आपको जिदंगी की हकीकत से 
रुबरु करवाती है लेकिन 
भावो से दूर ले जाती है

अब एक रेखा सीमा तय करती है
आप कितने पास कितने दूर है
अब एक रेखा सीमा तय करती है
आप की बातो की इज़ज्त कितनी है
अब एक  रेखा  सीमा  तय करती  है
आप के सच्चे ज़ज़्बात कितने झूठे है
अब  एक  रेखा  सीमा  तय करती है
आप उस रिश्ते की मर्यादा से बाहर है

रेखा सीमा की आज फिर खिंच चुकी है

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल , अबु धाबी, युएई

मुझसे पूछ लेना ....


जिंदगी मे.....

दोस्त और दोस्ती की कहानी
मुझसे पूछ लेना
वफा और बेफाई का सबब
मुझसे पूछ लेना

कल और आज की कहानी
मुझ से पूछ लेना
आज और कल की तन्हाई
मुझ से पूछ लेना

विश्वास और अविश्वास की कहानी
मुझ से पूछ लेना
प्यार और नफरत की दास्तां
मुझ से पूछ लेना

चेहरे और नकाब की कहानी
मुझसे पूछ लेना
फूल और कांटे की जुबानी
मुझ से पूछ लेना

दोस्त और दुशमन की कहानी
मुझ से पूछ लेना
सांस और आस की रवानगी
मुझसे पूछ लेना

दिल जुडने और टूटने की कहानी
मुझ से पूछ लेना
आंसू और दर्द की रिश्ता
मुझ से पूछ लेना

ख्वाबो और हकीकत की ये कहानी
मुझसे मत पूछ लेना
लिखे को पढना और समझना
मुझसे मत पूछ लेना

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल, अबु धाबी, यूएई

रविवार, 15 अगस्त 2010

खुद को सच्चा हिन्दुस्तानी कहलाये

14 अगस्त 2008 को लिखी एक रचना इस ब्लाग मे लिख रहा हूँ 




तिरंगा हमारी आन है बान है
हर हिंदुस्तानी की ये शान है

शहीदों की कुर्बानी की अलग कहानी
कुछ गोली खाकर शहीद कहलाये
कुछ फ़ासी के फ़ंदे पर झूल गये
कुछ ने देश के लिये किया समर्पण
कुछ ने किया सब कुछ अपना अर्पण

आज हम हर माने में स्वतंत्र है
लेकिन फ़िर भी बिगड़े सारे तंत्र है
गरीबी अमीरी की खाई बढती जा रही
आंतक की बू हर दिन फैल रही
राजनीति भी खूनी - खेल खेल रही

आजादी के जशन हम हर साल मनाते है
लेकिन मानवता को हर पल भूलते जा रहे है
देश और लोग उन्नति की ओर अग्रसर है
आम जिदगी फ़िर भी इससे बेअसर है
ढूँढते रहते ये सब किसका कसूर है?

आओ आज तिरंगा फ़िर लहराये
अमीरी गरीबी का ये भेद मिटाये
राजनीति से हटकर प्रेम फैलाये
जाति - भाषा का ये जाल हटाये
खुद को सच्चा हिन्दुस्तानी कहलाये

वन्दे मातरम!

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल, आबूधाबी
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