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गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

श्री गदाधर बड़थ्वाल जी - एक परिचय

 

(३१ दिसम्बर १९१५ - २८ अगस्त २००८ )



उत्तराखंड के पौड़ी जिले  में कंडोलिया के निकट 'बुडोली' गाँव में ३१ दिसम्बर १९१५ को जन्मे श्री गदाधर बड़थ्वाल जी साधु, सात्त्विक, पूर्णतः आध्यात्मिक वृत्ति के मित्भुक्, सहज और नेक व्यक्ति थे.

श्री गदाधर जी के माता-पिता अल्पायु में चल बसे. उनकी फूफू ने उनका लालन-पालन किया. समय उनके साथ न था और जल्द ही फूफू भी उन्हें छोड़कर चल बसीं. गरीबी इतनी थी कि संस्कार के लिए साधन न होने पर श्रीनगर के निकट गंगा में ही उन्हें विसर्जित करना पड़ा.

वे बाल्यकाल से कर्मठ, जुझारू व खुद्दार थे। इसका अंदाजा इस एक घटना से लगाया जा सकता है. जब गांव में पेयजल टैंक की मरम्मत के लिए सीमेंट आदि मंगवाने के लिए दुगड्डा जाने को कोई तैयार नहीं था तो वे अकेले ही (करीब 25 मील एक ओर) पैदल चल पड़े. उन दिनों यही चलन था, और रात तक लौट भी आए. इस साहसिक कार्य के लिए प्रशासन ने उन्हें टैंक चालू होने के समारोह में शील्ड से सम्मानित किया था.

आरंभिक शिक्षा से वंचित श्री गदाधर ने अपने जुझारू व्यक्तित्व व् कुछ करने के हौसले से ज्योतिष का अनौपचारिक किंतु प्रकांड ज्ञान अर्जित कर ख्याति पाई. जन्मपत्री की सटीक विवेचना तथा भविष्यवाणियां सही उतरने पर उनके अनेक शिष्य और भक्त हो गए थे.

करीब ३५ वर्ष की आयु में, उच्च चरित्र के प0 गदाधर ने अन्न को तिलांजलि दे दी. उसके पश्चात् उनका अतिसीमित दैनिक आहार सिर्फ दो-ढ़ाई सौ ग्राम उबली पालक या अन्य पत्तेदार सब्जी, थोड़ा दूध या कोई एक फल ही रहा. अपने जीवन काल मे कभी भी औषधि का प्रयोग नहीं किया था, यहाँ तक कि सर्प दंश के बावजूद भी वह स्वस्थ रहे. इसका एक मात्र कारण उनका ४२ साल तक नमक़ का सेवन न करना था.

अंतकाल तक स्वस्थ रहना पोषण विज्ञानियों के लिए अवश्य ही कौतूहल का विषय होगा. उनकी आवश्यकताएं अंत तक नाम मात्र ही थीं. धोती, दो जूट के लंगोट, साफा, कंबल, एक जोड़ी खड़ाऊं और चश्मा उनके व्यक्तित्व की गवाही देने लगा. लंबी दूरियां पैदल तय करना उन्हें सुहाता था. उन्होंने जीवन के अधिकांश वर्ष हिमाचल के धर्मशाला और पठानकोट के आश्रमों में साधना व् अपने भक्तो के साथ बिताए।

पंडित गदाधर अंतकाल के परिवार में उनके तीन पुत्र हैं: सर्वश्री गिरिश, श्री रमेश, और श्री सुरेश। पहले पठानकोट में, शेष दो दिल्ली एनसीआर में। अंतिम दौर ( २८ अगस्त २००८ तक ) में उनका अधिकांश समय कनिष्ठ पुत्र श्री सुरेश के साथ बीता। उनके अनेक शिष्य व परिजन उनके निर्भीक, संयत आचरण और ज्ञान का गुणगान आज भी करते हैं।

हम सभी पं गदाधर जी की स्मृति में उन्हें प्रणाम व् पुष्पांजलि अर्पित करते है.

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( यह संक्षिप्त विवरण *श्री हरीश बड़थ्वाल* भाई साहब जी व् बाद में उनके पुत्र श्री सुरेश जी द्वारा जानकारी पर आधारित है. - अन्य जानकारी मिलने पर ब्लॉग में जोड़ दूंगा )

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

२९ अप्रैल २०२१


मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

याद रहे !

 


 



 

जीवन रंगमंच, रहे स्मरण
कटु सत्य, जीवन-मरण
 
अंत किसने, अपना देखा
रहेगा केवल, लेखा-जोखा
 
विचलित नहीं, सजग रह
अफवाह नहीं, सत्य कह
 
मन नियंत्रण, प्रथम रख
कठिन दौर, संयम रख   
 
यह विपदा, प्रार्थना कर
रहकर दूर, उपकार कर
 
नहीं जाता, कोई साथ
अपनी सुरक्षा, अपने हाथ
 
प्रतिबिम्ब की, यह बात
याद रख, कर आत्मसात
 
-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल, २७ अप्रैल २०२१

 


शनिवार, 24 अप्रैल 2021

रोमिल बड़थ्वाल - एक परिचय

 

लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बड़थ्वाल (सेवानिवृत्त)

हिंदी, साहित्य, संस्कृति और धर्मनिष्ठा से जुड़े कुछ बड़थ्वालो से आपका परिचय करवाया. आज मुझे एक ऐसे व्यक्तित्व के बारे में जानने का अवसर मिला जो देश की रक्षा से जुड़ते हुए पर्वतारोहण ब एथलीट की दुनियां में आज एक मिसाल है. उत्तराखंड के ग्राम ‘खोला’ पट्टी कंडवालस्यूं के श्री बुद्धि बल्लभ के सुपुत्र लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बड़थ्वाल (सेवानिवृत्त) अपने फौजी पृष्ठभूमि, पारंगत क्षेत्र और व्यवसाय में किसी परिचय के मोहताज नहीं. लेकिन हम सबके लिए इस साहसी व्यक्तित्व को जानना और भी जरुरी हो जाता है कि वे बड़थ्वाल है.

13 पर्वतारोहण अभियान को नेतृत्व प्रदान करने वाले रोमिल बड़थ्वाल ने २२ वर्षो तक सेना में अपना योगदान दिया. अपने पर्वतारोहण अभियान का अंत उन्होंने मई २०१९ में माउन्ट एवरेस्ट पर फतह के साथ पूरा किया.

रोमिल बड़थ्वाल एक ट्रेकर, एक एंड्योरेंस-रनर और सुपररेंडोन्यूर  ब्रेवेट्स (साइकिलिंग) है. वे व्हाईट वाटर राफ्टिंग कोर्स के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ है. विज्ञापन खेलो में भी रोमिल ने कोई कसर नहीं छोड़ी है. बजी जम्पिंग, कयाकिंग, पैरामोटरिंग, पैरासेलिंग, पैराग्लाइडिंग सहित साहसिक खेलों में सक्रिय रूप से प्रतिभागिता की है.

२ अक्टूबर १९७६ में जन्मे रोमिल 18 साल की उम्र में भारतीय सेना में भरती हुए. वे आज की अपनी सारी सफलताओं और माउन्ट एवरेस्ट के पर्वतारोहण अभियान नेतृत्व के पीछे भी सेना को श्रेय देते है. वे आज भारत के शीर्ष पर्वतारोहण कम्पनी “बूट्स & क्रेम्पोन्स” (B&C), के संस्थापक है

रोमिल राष्ट्र रक्षा अकादमी पुणे से स्नातक है. शैक्षणिक प्रदर्शन के दौरान वे कई पर्वतारोहण अभियान में असफल रहे, पेराट्रूपर बनना चाहते थे पर असफल रहे. लेकिन उन्होंने हिम्मत व् हौसला बनाये रखा. एम् टेक ( आई आई टी खडगपुर ) के दौरान उन्होंने खुद को पहचाना, कड़ी मेहनत से स्वयं को तैयार किया. अपने आत्मविश्वास को बनाये रखा. उनके पत्र अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों व् मेग्जींस में प्रकाशित भी हुए. इसी दौरान  रोमिल ने लंबी दूरी की दौड़, 10 किमी, हाफ मैराथन, मैराथन, साइकिलिंग सुपररेंडोन्यूर , हाफ आयरनमैन, राफ्टिंग इत्यादि में महारत हासिल की.

उपलब्धियां:

·         रोमिल बड़थ्वाल ने 2017 में दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित बोस्टन मैराथन में भागीदारी की.

·         ला अल्ट्रा, सुमुर से लेह तक वाया खारदुंगला पास (3500 मीटर की ऊँचाई पर) से सबसे कठिन उच्च ऊंचाई वाला अल्ट्रामैराथन है। रोमिल ने इसमें 111 किमी दौड़ के लिए गैर-लद्दाखी श्रेणी में टीम कप्तान और रिकॉर्ड धारक हैं।

·        नई दिल्ली स्टेडियम रन में 185 किमी की दूरी तय की

रोमिल पर्वतारोहण अभियानों में एक टीम लीडर के रूप में,  टीम के सदस्यों की सुरक्षा के नाते, पर्यावरण सरंक्षण, राष्ट्र के सम्मान को स्वयं के हितों से पहले रखते है। रोमिल कहते है कि माउंट एवरेस्ट के लिए, अपने मिशन के लिए मैं इस हद तक तैयार था कि अगर मैं उंगलियां या पैर की उंगलियों को खो देता तो भी परवाह न करता. रोमिल आज अपनी कम्पनी के द्वारा अनेको पर्वतारोहण के इच्छुको को ट्रेनिंग देते व् अभियान चलाते हैं. वे अफ्रीका, अर्जेंटीना, रूस, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल और भारत में कई अभियान चलाते हैं।

लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल, मैरून बेरेट वाला पैराट्रूपर, ओपी विजय और कारगिल का हिस्सा थे और कई वर्षों बाद  उन्हें 2019 में साहसिक खेलों में उत्कृष्ट योगदान के लिए 'द ईएमई ब्लू अवार्ड' से अलंकृत किया गया।

दो पुत्रियों ( १० वीं व् ५ वीं की छात्रा) के पिता रोमिल आई आई एम्, लखनऊ से मेनेजमेंट स्नातक है. एक महान प्रेरक वक्ता ( लगभग 100+ सभाए) और कई फिटनेस के लिए एक रोल मॉडल भी है. वे अपने माता पिता के साथ द्वारिका दिल्ली में रहते है. आजकल वे  नेपाल में पर्वतारोहण अभियान के साथ हैं.

हमारी ओर से रोमिल बड़थ्वाल व् परिवार को ढेर सारी शुभकामनायें. 


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रविवार, 18 अप्रैल 2021

तनहा अजमेरी – गुमनाम शायर ( एक परिचय)

बड़थ्वाल – एक शब्द जो मुझे सदा उत्साहित करता है. यही कारण है कि मुझे हर उस व्यक्तित्व से जुड़ना अच्छा लगता है जिसके साथ बड़थ्वाल जुड़ा है क्योंकि वह मेरी जड़ो को मजबूती प्रदान करता है. जब मैं २००७ में बड़थ्वाल बंधुओं की तलाश में था उस वक्त लिखने का शौक भी था और कई लेखको, शायरों व् कवियों को पढता भी था. तभी एक नाम जो मेरी नजरो से गुजरा - तनहा अजमेरी. एक बेहतरीन शायर और शब्दों के जादूगर तनहा अजमेरी को पढ़ा तो जानने का प्रयास किया. मेरी ख़ुशी की सीमा नहीं रही जब मैंने पाया कि उस शख्स का नाम संजय बड़थ्वाल है. आप भी चौंक गए होंगे न ? खैर फिर उनसे परिचय बढाया बड़थ्वाल (Barthwal’s Around the World) समूह में जोड़ा. मेरा तो परिचय है ही उनसे, क्या आप जानते हैं? आइये मिलिए संजय बड़थ्वाल जी उर्फ़ तनहा अजमेरी जी से - कुछ मेरी कलम से कुछ उनकी जुबानी .. 


ज़िन्दगी सिर्फ वो ही नहीं जिसकी हर वक़्त चर्चा होती रहे
 “तनहा” किसी गोशे में सुकून से खुश रहना भी है ज़िन्दगी 
(गोशे=कोने) 

वैसे तो संजय जी कहते है कि मेरे बारे में जानने लायक, सचमुच, कुछ भी नहीं है। जो थोडा बहुत लिख लेता हूँ, वही मेरा परिचय बनकर रह गया है। लेकिन मैंने जाना है जो जाना है उसकी शुरुआत करता हूँ सन १९३९ की बात है जब पाली तल्ली से संजय जी के दादा जी स्व. मेजर मनीराम बड़थ्वाल जी कोटद्वार आ गए परिवार के साथ. मेजर मनीराम जी ब्रिटिश आर्मी में गढ़वाल के पहले चुने हुए आफिसर में से एक थे. नजीबाबाद रोड पर बडथ्वाल कोलोनी उनके नाम पर ही है. परिवार के लालन पालन हेतु संजय जी के ताउजी, चाचा जी व् पिताजी देश के विभिन स्थान पर रहने लगे. यह उत्तराखंड में पलायन के शुरआती दौर की बात होगी. संजय जी का मानना भी है कि यही वक्त था की हम अपनी जड़ो और पहाड़ से दूर हो गए या कहे - कट गए. 

संजय जी के एक ताऊ जी स्व मेजर सत्य प्रसाद बड़थ्वाल (शहीद १९६२ भारत चाइना वार) और दूसरे ताऊ जी श्री जगदम्बा प्रसाद बड़थ्वाल (एक्स जनरल मेनेजर, केनेडियन इंस्टीटयूट आफ बिजिनेस, ओंटारियो) संजय जी के पिताजी श्री शांति प्रसाद बड़थ्वाल जी अजमेर (राजस्थान) आ गए. वे कहते है कि पहाड़ से रिश्ता क्या टूटा की मरुस्थल से जा मिले. 

संजय जी के पिताजी स्व श्री नरेश ( शांति प्रसाद) सीआर पी ऍफ़ में कमान्डेंट की पोस्ट से रिटायर्ड हुए. संजय जी की दो छोटी बहिने है संगीता बड़थ्वाल खंडूड़ी ( स्कूल प्रिंसिपल, शिलोंग) और दीपाली बड़थ्वाल काला ( डायरेक्टर आफ एडुकेशन, स्ट्रेयर्ष यूनिवर्सिटी यूएसए). 

संजय बड़थ्वाल उर्फ़ तनहा अजमेरी का जन्म ३१ अक्टूबर १९६७ अजमेर में हुआ. प्रारम्भिक शिक्षा उन्होंने यहीं से प्राप्त की. वहीं पर शायरी के बीज चुन अल्फ़ाज़ के तमाम शजर (पेड़) लगाने का सिलसिला शुरु हुआ। अजमेर में पैदा होने कारण ही अपने उपनाम में उन्होंने ‘अजमेरी’ शब्द को जोड़ा. संजय जी की उच्च शिक्षा दिल्ली दिल्ली में सेंट स्टीफन कॉलेज में हुई. तनहा अजमेरी मानते है कि उन्हें नुकसान यह हुआ कि इन ५ वर्षों के दौरान वे धरातल से और दूर हो गए और आलम यह हुआ की न तो वे अंग्रेज बन पाए, न हिन्दुस्तानी रह गए. देश के रहे न परदेश के तो जीवन के भटकाव को ही जीवन बना लिया. कभी इधर कभी उधर, एक बहके हुए परिंदे कि मानिंद शजर से शजर। वे लिखते हैं 

अपनी धुन में जाने किधर से किधर निकल गए 
हम ऐसे मुसाफिर है जो मंजिलों को भी छल गए 

उन्हें नौकरियां मिलती रही और वे उन्हें छोड़ते रहे. कह सकते हैं कि किसी तरह उनका काम चलता रहा और ज़िन्दगी तमाम होती रही। तनहा अजमेरी जी कहना है कि एक चीज़ जो हमेशा साथ रही वो थी उनकी शायरी। इस पर वो कहते हैं कि ‘तनहा’ घूमते - घूमते हुजूम से अब ताल मेल बिठाना भूल गया हूं और वास्तविक व्यावहारिक गुफ्तगू से बिल्कुल परे हो गया हूं। 

संजय जी बताते है कि जहां तक कार्य का ताल्लुक है बहुत कोशिश की। सरकारी अफसर भी रहा, उकता गया। रोटी जब समस्या बनी तो कई प्राइवेट जॉब्स किए। TIMES OF INDIA, फिर इस्तीफा। अपने खुद के अखबार चलाए - "उत्तराखंड सवेरा" और "VOICE FROM HILLS". उच्च कोटि का काम करने की कोशिश की पर चाटुकारिता न जानने के अभाव के चलते विज्ञापन न मिले और निम्न कोटि के अखबार रसूखदार लोगों के सियासती CONNCETION के आगे अपने अखबार तो पटखनी खा गए। 

 संजय जी का स्वतंत्र रूप से लिखना जारी रहा - स्क्रिप्ट, बोल, कहानियाँ इत्यादि. मगर अंजाम वही- ढाक के तीन पात। मुंबई फिल्म उद्दयोग में जीरो कनेक्शन होने के कारण बात उनकी बात वहां भी नहीं बनी. वे कहते है कि ईर्ष्यालु लोगों ने आगे न बढ़ने दिया और मैं TALENT WITHOUT OPPORTUNITY की मिसाल बनकर रह गया। सो अब घर बैठे - बैठे ही अल्फ़ाज़ की माला पिरों रहा हूं। कहते हैं जंगल में मोर नाचा तो किसने देखा। परवाह नहीं। मोर का मज़ा तो नृत्य में है। मेरे तो यही हाल है... 

ना जाने किसी ओर निगाहें किये बैठा रहा है ज़माना
मेरी तो महज कुदरत के नज़रों में ही ज़िन्दगी रही 
होती होंगी औरों की इबादत देरों - हरम में तनहा 
मेरी तो फकत आशिक़ी ही ताउम्र मेरी बंदगी रही 

संजय बड़थ्वाल जी ने इस दौरान कुछ किताबें लिखी हैं – 
 - दायरों से बाहर(Poems), 
 - अफसाना बयानी(Short Stories), 
 - समंदर (Ghazals), 
-  गीत (Music and lyrics), 
 - अक्कड़ - बक्कड (बच्चों की कविताएं), 
 - हॉलीडे रीडिंग (अंग्रेज़ी में बच्चों के लिए कहानियां), 
 - द लास्ट मैन स्टैंडिंग (पर्सनैलिटी डेवलपमेंट बुक)। 

आप सभी लोग उनके ब्लॉग में उनकी शायरियो का लुत्फ़ ले सकते हैं.
http://tanhaai-pursukun.blogspot.com/?m=1 

संजय जी अपनी जड़ो के साथ जुडा रहना चाहते हैं वे कहते है कि बडथ्वाल नाम से तो प्रेम है पर असमंजस में हूं कि क्या वाकई में इस समूह से जुडा हर शखस संजीदा है भी या नहीं या फिर लोग सिर्फ तफरीह के लिए जुड़ रहे है सिर्फ "GOOD MORNING और GOOD NIGHT" बोलने के लिए... वे एक प्रश्न बड़ी संजीदगी से पूछते है की “क्या इनके जिस्म में शिद्दत से वो लहू बह रहा है जो वाकई में उन्हें बड़थ्वाल होने पर एक नई ऊर्जा से भरता हो ? यह प्रश्न हम सबके लिए भी है और हम ही उत्तर भी है उनके प्रश्नों का. 

वर्तमान में संजय जी अपनी माताजी के साथ देहरादून में रहते है. 

आप सभी के साथ मैं उन्हें उनके उज्जवल भविष्य की कामना सहित शुभकामनायें प्रेषित करता हूँ.

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
 भारत १८/४/२१

रविवार, 7 मार्च 2021

प्रेम उत्सव

 




प्रेम उत्सव

व्योम मंडल हर्षित, मधुर आलिंगन अपेक्षित
अव्यक्त गूँज उठता, स्पर्श होता अभिव्यक्त
तत्क्षण स्वीकार जिसे, उत्कृष्ट होता अनुराग
प्रेम साधना पुरुस्कृत, पुलकित बसंत राग
 
शब्द - शब्द मौन, अंग - अंग सम्मोहित
कामना से अलग, उत्सर्ग जोत प्रज्वलित
प्रेम प्रांगण सुशोभित, गीत संगीत अनुमोदित
अधरो की मनमानी, छंद नव परिभाषित
 
पल - पल उमंग, हृदय आनन्द स्फुटित
हर पल उत्सव, नवोदित यौवन अनुभूति
रोम - रोम परितृप्त, तीव्र सुंगधित श्वास
आंचल में शरणागत, हर पल मधुरमास
 
प्रार्थना सी प्रीत, समर्पण भाव उत्साहित
स्वीकृत प्रेम पीयूष, मदहोश नयन प्रमुदित
स्नेह उपहार मनोहर, चेतना सज्जित तरंगित
स्पन्दन राग कौतुक, प्रेम प्रशस्ति अलंकृत
 
 
-        प्रतिबिम्ब बडथ्वाल, ६ फरवरी २०२१

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

मुझमें एक जोत जला दे माँ

अक्षरावाणी साप्ताहिक पत्रिका के काव्य मंजरी पृष्ठ में प्रषित




मुझमें एक जोत जला दे माँ
 
हे वीणा धारिणी, करता तुझको प्रणाम
हे हंसवाहिनी, करता मैं तेरा ही स्मरण
हे माँ शारदे, ज्ञान का तू कर बीजारोपण
मन तिमिर सा
मुझमें तू एक जोत जला दे माँ
 
मेरे ज्ञान का, तू अब भंडार भर माँ
हो मुझमें संचार, तेरे प्रकाश का माँ
है अर्चना तुझसे, मुझे आशीष दो माँ
मन तिमिर सा
मुझमें तू एक जोत जला दे माँ
 
शरणागत हूँ, तेरा प्रेम वर्षण चाहता हूँ
हूँ अज्ञानी मैं, विद्या वरदान चाहता हूँ
वीणा के तारो से, सुरों का ज्ञान चाहता हूँ
मन तिमिर सा
मुझमें तू एक जोत जला दे माँ
 
इर्ष्या और नफरत को, मुझसे दूर कर माँ
प्रेम और क्षमा बन, मुझमें  वास कर माँ
सत्य और मीठा बोलूँ, ऐसा वरदान दे माँ
मन तिमिर सा
मुझमें तू एक जोत जला दे माँ
 
 
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १६/५/२०२१

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

सन्देश

 




~ सन्देश ~


कोई नहीं धरती पर जो ईश्वर से बड़ा है
मानव घमंड हर बार इसे ले कर उड़ा है
बार - बार यहाँ इंसान प्रकृति से लड़ा है
फिर भी अपनी करतूतों पर वह अड़ा है
प्रकृति ने आज हमें थप्पड़ फिर जड़ा है
तबाही का मंजर फिर दिखाई पड़ा है
रिस रहा जो वो भरा प्रदूषण का घड़ा है
धर्म आस्था सहित "प्रतिबिम्ब" कर्म बड़ा है
पर्यावरण सुरक्षा पर प्रश्न आज भी खड़ा है
सुन लो अभी भी प्रकृति का सन्देश कड़ा है

सोमवार, 25 जनवरी 2021

मेरा गणतंत्र, मेरा अधिकार

 


मनाएं गणतंत्र दिवस, संविधान का सम्मान कर
भारतीय संविधान का हम अपने जाने मूल मंत्र
स्वतंत्र विकास व् जीवनयापन का हमें अधिकार
संविधान के भाग ३ में हैं हमारे मौलिक अधिकार
पहले सात थे, अब हैं हमारे ६ मौलिक अधिकार
कर संशोध ४४वा हटा लिये संपति का अधिकार
बना दिया ३००-क के तहत तब कानूनी अधिकार
 
१२ से ३५ में चिन्हित है अपने मौलिक अधिकार
१४-१८ अनुच्छेद देता है समता का अधिकार
१९-२२ में मिलता हमें स्वतंत्रता का अधिकार  
२३-२४ में उदृत है शोषण के विरुद्ध अधिकार
२५-२८ में मिलता धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
२९-३० देते हमें संस्कृति व शिक्षा का अधिकार
३२ में मिलता है संविधानिक उपचार अधिकार
 
कर्तव्य के प्रति हमारा समर्पण का  एक मंत्र है
कर्तव्य ही अधिकार का होता सच्चा स्त्रोत है  
कर्तव्यनिष्ठ जीवन शैली को अपना बनाना है
संसाधनों संग देशहित का हमें रखना ध्यान है  
नैतिक कर्तव्य को हमें अपने व्यवहार में लाना है
स्वयं में व समाज में जागरूकता को लाना है  
अपने शाश्वत मूल्यों का हमें निर्धारण करना है
 
७२वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !!!!
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल,  २५ जनवरी २०२१

रविवार, 3 जनवरी 2021

आज की सुबह


 



~आज की सुबह~

पूष माह में
झमाझम बारिश के
मधुर आलिंगन से
भीगती मेरी सुबह


कड़कड़ाती बिजली से
दहलता सा आसमां
ज़ोर से धड़कता
ये मेरा दिल

धरती से मिल
सुगंधित है करती
मन रज को
बारिश की बूंदे

हल्के से उभरते
नर्म अहसासों में
चाहत झंकृत होती
गरम साँसो में

गिन रहा हूँ
गिरती बूंदों को
ख्वाइशों में बढ़ती
तेरी चाहत को

सुबह या रात
सर्द हवा की बात
पुकारती तेरा नाम
बारिश की बूंदे

बरस रहे मेघ
रोमांचक तेरा स्पर्श
तेज होता संवेदन
गरम रक्त स्पंदन

आवाहन श्रवण सुभग
मिलन आस प्रतिबिम्बित
देख प्रवाह पुलकित
बारिश की बूंदे

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ०३\०१\२०२१

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

क्षितिज व्योम पर



क्षितिज व्योम पर 


क्षितिज व्योम पर है रेखांकित
नवजीवन का बन जीवन अमृत 
प्रीति रीत का प्रवाह नवनीत
जीवन संगति अनुभूति अतुल

भावना प्रबल, शब्द प्रत्यंचित
दृष्टि आलौकिक, प्रयत निष्ठा
प्रयति आभूषण, वेग प्रहाण 
जीवन - धन, प्रहर्षित जीवन 

निज मन का स्वाद विमुख है
समर्पण प्रणय बोध सजग है
मोह मंत्र नहीं मुक्ति मार्ग है 
संयम व नियम का बंधन है

पर्यवरोध की बन सुरक्षा कवच
प्रगल्भता का तुम प्रणीत संदेश
प्रतीति प्रणय की बन कर श्वास  
गूँजती प्रावण सी मुग्ध ध्वनि

आमोद का न होता प्रतिपादन 
आत्मीयता का यह गूढ़ दर्शन
अन्तर्मन में होता बस प्रतिनाद  
खिलता जलज बन तेरा ‘प्रतिबिंब’

अवचेतन प्राण की चेतना हो 
मेरे अस्तित्व का समग्र दर्शन 
सींच रही मेरे मन की प्रकृति
अनंत कल्पना की बन साक्षी 

क्षितिज व्योम पर रेखांकित
हाँ ! तुम मेरा जीवन हो !!
- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल ०१\०१\२१
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