मन बहुत उतावला होता है। इसमे न जाने कितने सवाल उठते है या जबाब मिलते है। चाहे उनमे मै स्वयं ही घिरा हूं या फ़िर समाज या देश के प्रति मेरी उदासीनता या फ़िर जिम्मेदारी। आप भी मेरी इस कशमकश के साथी बनिये, साथ चलकर या अपनी प्रतिक्रिया,विचार और राय के साथ्। तेरे मन मे आज क्या है लिख दे "चिन्तन मेरे मन का" के पटल पर यार, हर पल तेरी कशिश का फ़साना हो या फ़िर तेरी यादो का सफ़र मेरे यार।
सोमवार, 8 फ़रवरी 2021
सन्देश
सोमवार, 25 जनवरी 2021
मेरा गणतंत्र, मेरा अधिकार
मनाएं गणतंत्र दिवस, संविधान का सम्मान कर
भारतीय संविधान का हम अपने जाने मूल मंत्र
स्वतंत्र विकास व् जीवनयापन का हमें अधिकार
संविधान के भाग ३ में हैं हमारे मौलिक अधिकार
पहले सात थे, अब हैं हमारे ६ मौलिक अधिकार
कर संशोध ४४वा हटा लिये संपति का अधिकार
बना दिया ३००-क के तहत तब कानूनी अधिकार
१४-१८ अनुच्छेद देता है समता का अधिकार
१९-२२ में मिलता हमें स्वतंत्रता का अधिकार
२३-२४ में उदृत है शोषण के विरुद्ध अधिकार
२५-२८ में मिलता धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
२९-३० देते हमें संस्कृति व शिक्षा का अधिकार
३२ में मिलता है संविधानिक उपचार अधिकार
कर्तव्य ही अधिकार का होता सच्चा स्त्रोत है
कर्तव्यनिष्ठ जीवन शैली को अपना बनाना है
संसाधनों संग देशहित का हमें रखना ध्यान है
नैतिक कर्तव्य को हमें अपने व्यवहार में लाना है
स्वयं में व समाज में जागरूकता को लाना है
अपने शाश्वत मूल्यों का हमें निर्धारण करना है
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल, २५ जनवरी २०२१
रविवार, 3 जनवरी 2021
आज की सुबह
कड़कड़ाती बिजली से
दहलता सा आसमां
ज़ोर से धड़कता
ये मेरा दिल
धरती से मिल
सुगंधित है करती
मन रज को
बारिश की बूंदे
हल्के से उभरते
नर्म अहसासों में
चाहत झंकृत होती
गरम साँसो में
गिन रहा हूँ
गिरती बूंदों को
ख्वाइशों में बढ़ती
तेरी चाहत को
सुबह या रात
सर्द हवा की बात
पुकारती तेरा नाम
बारिश की बूंदे
बरस रहे मेघ
रोमांचक तेरा स्पर्श
तेज होता संवेदन
गरम रक्त स्पंदन
आवाहन श्रवण सुभग
मिलन आस प्रतिबिम्बित
देख प्रवाह पुलकित
बारिश की बूंदे
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ०३\०१\२०२१
शुक्रवार, 1 जनवरी 2021
क्षितिज व्योम पर
क्षितिज व्योम पर
नवजीवन का बन जीवन अमृत
प्रीति रीत का प्रवाह नवनीत
जीवन संगति अनुभूति अतुल
भावना प्रबल, शब्द प्रत्यंचित
दृष्टि आलौकिक, प्रयत निष्ठा
प्रयति आभूषण, वेग प्रहाण
जीवन - धन, प्रहर्षित जीवन
निज मन का स्वाद विमुख है
समर्पण प्रणय बोध सजग है
मोह मंत्र नहीं मुक्ति मार्ग है
संयम व नियम का बंधन है
पर्यवरोध की बन सुरक्षा कवच
प्रगल्भता का तुम प्रणीत संदेश
प्रतीति प्रणय की बन कर श्वास
गूँजती प्रावण सी मुग्ध ध्वनि
आमोद का न होता प्रतिपादन
आत्मीयता का यह गूढ़ दर्शन
अन्तर्मन में होता बस प्रतिनाद
खिलता जलज बन तेरा ‘प्रतिबिंब’
अवचेतन प्राण की चेतना हो
मेरे अस्तित्व का समग्र दर्शन
सींच रही मेरे मन की प्रकृति
अनंत कल्पना की बन साक्षी
क्षितिज व्योम पर रेखांकित
हाँ ! तुम मेरा जीवन हो !!
- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल ०१\०१\२१
शुभम
चलिये आरम्भ करते हैं,
नए साल में नया सफर
शब्दों की इस यात्रा में,
अब मौन संग न होगा
कुछ मेरे मन का होगा,
कुछ तेरे मन का होगा
होगा गवाह अब वर्तमान,
सृजनता होगी अब पहचान
शुभ होगा इसका आगाज,
बुलंद होगी अब हर आवाज़
गूंज उठेगा इसका हर शब्द,
सत्य का होगा अब शंखनाद
मेरा चिंतन, चिंतन मेरे मन का,
प्रतिबिम्बित होगा इस पटल पर
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शुभ हो! जय हो! विजय हो!
शुभम
बुधवार, 30 दिसंबर 2020
जा रे
शनिवार, 5 दिसंबर 2020
ये आँखें देखकर हम सारी दुनिया भूल जाते हैं ....
आंखो की नमी और आँखों की
आग बता देती है मिजाज दिल का। आँखेँ दिल का दर्पण होती हैं और कभी ये आँखेँ
बहुत बोलना चाहती हैं। आँखों का ख्याल आते ही उमराव जान फिल्म का गाना, इन आँखों की मस्ती के मस्ताने रह-रह कर याद आ रहा। आज मन आँखों से मिलकर आँखों
की भाषा से बात करना चाहता है।
सुन लो गाँव वालों, शहर वालों, आँख व कान खोल कर कि आँखों से
नित नए आयाम लिखने में हमारा कोई सानी नहीं। हम आँख लगाते नहीं, हम आँख मिलाने पर विश्वास करते हैं। कभी कोई आँखों में घर कर, बस जाता है तो कभी कोई आंखो से उतर जाता
है। आँखेँ तरेरना हम नहीं जानते इस लिए कुछ की आंखो के तारे हैं हम।
हमारे आस पास कुछ तत्व आदतन दूसरे के घर
पर आँख टिकाये रहते हैं। ऐसे प्राणी हमें फूटी आँख नहीं सुहाते। लोगों
को इस जमाने की हकीकत को बता हमने लोगो की आँखों में पड़े पर्दे को हटाने की
कोशिश बहुत की लेकिन नाकाम रहे। इस कारण आज भी कहीं हम आँख का काँटा बने हुये
हैं।
फिर भी आँखों में चर्बी चढ़े लोग कब
हमारी अहमियत समझते हैं, यकीन है उनकी आँखों में खटकते जरूर होंगे
हम। इस महफिल में भी आंखे मैली करने वाले बहुतेरे है। हमारी हरकतों को आंखे फाड़कर देखने वाले और
आँख लगाने वाले भी बहुत हैं। बहुत लोगो की आदत होती है लेकिन जैसे ही हम आँख
में आँख डालते है उनकी, वे कन्नी काट जाते हैं। लोग जिंदगी
में बहुत आते हैं उसमें कितने तो आँखों मे धूल झोंक कर चल देते है और कुछ आंखे
फेर लेते है पर कुछ हैं जो आँखों ही आँखों में एक रिश्ता कायम कर लेते हैं।
इस भौतिकवाद के युग में आंखे चार होते
ही हमसे आँख चुराने वालों की कमी भी नहीं। पर हम भी कम नहीं उनको जिस पल आँख
भर कर देख लेते है तो वो पल बन जाता है उनका। आंखे भर आती है जब देखता हूँ
कि कुछ लोग आंखे बिछाये हमारा इंतज़ार करते हैं। कम है, पर हैं जिन्हें देखकर आंखे खिल जाती है हमारी। दिल बाग-बाग होता है
यह सोचकर कि कुछ की आंखो में घर बसाया है हमने। अभी भी हम कितनों का दिल लूट
लेते है आखिर आंखो से काजल चुराने में महारत हासिल है हमें।
कातिल बन कर ये
आँखें हमको मरने नहीं जीने का सबब दे जाती हैं। फिलहाल तो दिल आज
उन आँखों की गुस्ताखियों को माफ करने के मूड में है जिनकी आँखों में हमने
अजब सी अदाएं देखी हैं। उन आँखों को
दगाबाजी सिखाने वालों का सजा देने का इरादा
भी रखते है। आँखें काली, कत्थई हो या सुरीली, आँखें मस्त-मस्त हों या चैन लूटने वाली, सब देख हमारी
आँखें हंस देती हैं। दिल की जुबां बनते देर नहीं लगती इन आँखों को फिर। इसमें
कोई शक नहीं की कसूर आँखों का ही होता है जब प्रेम का श्रीगणेश होता है। अब
जब आँख लड़ ही गये तो दिल बेचारा क्या करे? जीवन से भरी
आँखों में आखिर डूब जाना और फिर इसमें गोताखोरी करना कोई जोखिम से कम नहीं।
आँखों से प्रेम जाम पिलाये कोई तो मदहोश होना बनता है न। फिर लगता है कि इन
आँखों के सिवाय दुनियाँ मे रखा क्या है?
सच बतायें उनकी आँखों में जहां बसता
है हमारा। उनकी आँखों में सवाल भी होते हैं जबाब भी होते हैं। प्रेम की हर भाषा जानते हैं उनकी आँखें और
जब शब्द कभी आनाकानी करते हैं तो उनकी झुकी आँखें मन में उठ रही तरंगो की जुबां
बन जाते हैं। आँखों में ही निमंत्रण की स्वीकृति का उत्तर पाकर आँखें बंद
कर उस अहसास को जीने के लिए तन मन आतुर होता है। उन आँखों में उभरते अहसासों
की कशिश में ‘प्रतिबिम्ब’ यही
कह पाता है उन्हें कि “ये आँखें देखकर हम सारी दुनिया भूल जाते हैं।“
शुभकामना इतनी कि उनकी आँखों में गम के आँसू न आयें कभी और
मुझे जब भी याद करे तो खुशी संग प्रेम से छलछला उठें उनकी ये आँखें .....
~ प्रेम हाइकु ~
बुधवार, 2 दिसंबर 2020
नमस्कार!
हो गई फिर सुबह
फेसबुक ट्वीटर वाहटसप
पर उपस्थिति दर्ज अनिवार्य है
वरना लोग बड़ी जल्दी भूल जाते है
आपका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है
सबसे अच्छा, प्यारा करीब लगने वाला
कब स्मृति से अन्तर्धान हो जाये
और आप की खुशफहिमी
कब ओंधे मुँह गिर पड़े
पता ही नहीं चलेगा
चलो अब शुरू करते हैं
लोगों को रिझाना
अपना बनाना
अरे भई !
अपना बनाएँगे तो ही
भाव मिलेंगे
वरना इस स्वार्थ की दुनियाँ में
हम किस भरोसे
अपनी पोल पट्टी खोलेंगे
उमड़ रहे भावो को सुनाएँगे
अच्छा - बुरा सुनाकर ही तो
लाइक (गर्व कराती) पा सकेंगे
खुशनसीब हुये तो
टिप्पणियाँ भी स्वागत करेंगी
तंज़ कसे या फिर दिखाये प्यार
कुछ तो करते अपने सपने साकार
गतिविधि की लाइव जानकरी
बटोरो खूब, झूठा या सच्चा प्यार
चलता रहे हम सबका ये व्यापार
इसलिए "प्रतिबिम्ब" करता
आप सबको बारंबार नमस्कार!!!!
सोमवार, 30 नवंबर 2020
मेरे किसान
राजनीति की बिछी बिसात में, फंस गया हमारा किसान
बिचौलियों की इस टेढ़ी चाल में, आ गया हमारा किसान
इस कृषि सुधार नीति को, समझ न पाया हमारा किसान
सर्दी में भी दिल्ली किया कूच, गुमराह हुआ हमारा किसान
सरल भाषा में समझना होगा, किसी की बातों में न आना
राजनीति ने सदा बढ़ाई खाई है, बिल को तुम समझ लेना
ये वक्त महामारी का है, फैसलों पर तुम विचार कर लेना
ऐतिहासिक किसान बिल है, इसको जीवन - रेखा बना लेना
कृषि उपज, व्यापार व वाणिज्य से संबन्धित पहला बिल
जिससे मिलेगी सुविधा, और होगा उत्पादन का संवर्धन
देश की 2,500 एपीसी मंडियां है, राज्यो द्वारा संचलित
सब मंडियों संग, बिन शुल्क देश में मिलेगे तुम्हें विकल्प
कृषक कीमत व कृषि सेवा करार है दूसरा किसान बिल
किसानों का सशक्तिकरण व सरंक्षण है इसका विधान
निजी संस्था, एजेन्सियों संग भी, कर पाएंगे समझौता
कीमत का मिलेगा आश्वासन, अब कर पाएंगे अनुबंधन
आवश्यक वस्तु संशोधन है, सरकार का ये तीसरा बिल
कुछ वस्तु आवश्यक सूची कानून में, अब किए बदलाव
युद्ध, अकाल स्थिति व अप्रत्याशित उछाल पर सरकार
आवश्यक उत्पादन सूची से कर सकती है उनको बाहर
सरकार के व्यक्तव्य को सुनो व समझो, फिर करो ध्यान
न विरोध करो, न करो अन्य राज्यों व लोगों को परेशान
इतने सालों की भ्रष्ट व्यवस्था से, अब निकलो मेरे किसान
अपना हित व आय का सोचो, मत फँसो तुम मेरे किसान
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल / ३० नवंबर, २०२०









